“समृद्ध और विकसित झारखंड का परिकल्पना: हमारे सपने और योगदान”*
यह कोई सरकारी परिचर्चा का शीर्षक नहीं,
बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है.
औपचारिकता करने के लिए मेरे पास भी
खनिज संपदा, भूमि संसाधन, मानव बल,
और राजनीतिक अस्थिरता जैसे
भारी-भरकम शब्दों का पूरा संग्रह था.
चाहता तो मैं भी लंबा चौड़ा, तकनीकी भाषण दे देता.
लेकिन—
इस विषय का मूल दो शब्द हैं:
सपने… और योगदान!
और इन्हीं दो शब्दों में
हम सबके लिए एक प्रश्न छिपा है—
“पिछले 25 वर्षों में हमारी भूमिका क्या रही?
हमने अपने झारखंड को समृद्ध बनाने के लिए अब तक क्या किया?”
*झारखंड — एक अनुपम धरोहर*
झारखंड कोई साधारण राज्य नहीं,
यह प्रकृति की गोद है, संस्कृति का आसन है,
और आध्यात्मिकता की जड़ें यहाँ की मिट्टी में घुली हैं.
यहीं बाबा धाम है — द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक,
यहीं शक्तिपीठ हैं,
यहीं पांडवों की यात्राओं के दर्जनों ऐतिहासिक स्थल हैं,
यहीं लोहरदगा में भगवान बजरंगबली की जन्मस्थली अंजनी धाम है,
यहीं पश्चिमी सिंहभूम में बाबा श्याम (बर्बरीक) की जन्मभूमि है,
यहीं गुमला में भगवान परशुराम का टांगीनाथ धाम है,
इतना ही नहीं —
झारखंड की हर नदी, हर पहाड़, हर कण-कण
इतिहास और पवित्रता से भरा हुआ है.
यह राज्य पर्यटन की असीम संभावनाओं से सराबोर है.
*मारवाड़ी समाज की ताक़त — और विकास का सूत्र*
सत्र में चर्चा के दौरान पता चला कि
अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के देशभर में लगभग 65,000 सदस्य हैं.
और यदि मारवाड़ी सम्मेलन, महिला मंच, अग्रवाल सम्मेलन आदि को जोड़ दें,
तो यह संख्या एक लाख से भी ऊपर पहुँच जाती है.
सोचिए…
यदि यही लोग अपने परिवारों और परिचितों को यह बताएँ—
कि झारखंड क्या है,
यहाँ क्या-क्या है,
और उन्हें जीवन में एक बार यहाँ जरूर आना चाहिए…
तो एक वर्ष में 1000 लोग भी यदि झारखंड पर्यटन के लिए आ जाते हैं,
तो यह उस राज्य के लिए वही होगा
जैसे भीषण आग पर
किसी चिड़िया के द्वारा गिराया गया पानी.
जो छोटा दिखता है…
पर दिशा बदल देता है.
यह अभियान हमारी शाखाओं से शुरू हो सकता है.
हर जिले की शाखा अपने पर्यटन स्थलों का सुंदर संकलन तैयार करे—
• स्थलों का इतिहास
• उसका धार्मिक -सांस्कृतिक महत्व
• वहाँ कैसे पहुँचना है
• नजदीकी रेल व विमान मार्ग
• और दर्शनीय स्थलों की तस्वीरें
यह पुस्तिका देशभर के हर मारवाड़ी परिवार तक पहुँचे.
और संदेश हो—
*“पधारो झारखंड
यहाँ सिर्फ सफर नहीं,
अनुभव आपका इंतज़ार कर रहा है.”*
*जमशेदपुर — पर्यटन का नया अध्याय*
कौन कहता है कि छुट्टियाँ सिर्फ गोवा-दिल्ली-मसूरी की हैं?
एक बार झारखंड को देखिए—
• डिमना झील में सुबह का सुकून
• दलमा पहाड़ में हिरण और हाथियों की झलक
• राजनगर का भीमखांदा — जहाँ भीम का चूल्हा है, द्रौपदी की स्मृतियाँ हैं
• घाटशिला का पंच पांडव पहाड़
• जादूगोड़ा का रंकिणी मंदिर
• पाथेर पांचाली के लेखक बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की स्मृतियाँ
और जमशेदपुर—
देश का सबसे साफ-सुथरा औद्योगिक शहर,
जहाँ पर्यटन और सुविधाएँ साथ-साथ मिलती हैं.
यहाँ ताज विवांता, रेडिसन, रामाडा जैसे होटल,
2500 से 10,000 रुपये की रेंज में बेहतरीन ठहराव प्रदान करते हैं.
और भोजन?
दक्षिण भारतीय स्वाद, बंजारा की राजस्थानी थाली,
और जमशेदपुर की शामें—
आपके छुट्टी के हर पल को यादगार बना देंगी.
*तो आज का असली प्रश्न यही है—*
सपने क्या हैं?
और उनमें हमारा व्यक्तिगत योगदान क्या होगा?
झारखंड को समृद्ध बनाना
सरकार का ही काम नहीं—
यह हमारा भी धर्म है,
हमारी ज़िम्मेदारी है,
और हमारी पहचान भी.
सपनों को पूरा करने वाले
कदम सरकारें नहीं उठाती—
उन्हें लोग उठाते हैं,
हम और आप उठाते हैं.
आज की यह चर्चा
झारखंड के लिए
हमारे सामूहिक सपनों का पहला अध्याय बने—
इसी कामना के साथ,
जोहार! धन्यवाद!!
Saturday, 15 November 2025
Sunday, 12 October 2025
कुरु वंशावली में बर्बरीक
कुरु वंशावली में बर्बरीक
(महाभारत के अनुसार)
1. भरत
भरत चक्रवर्ती प्राचीन भारत के सम्राट थे, जिनके नाम पर इस भूभाग को भारतवर्ष कहा गया। भरत से कई पीढ़ियों के उपरांत कुरु का जन्म हुआ।
भरत → कई पीढ़ियाँ → कुरु
2. कुरु
कुरु वंश के संस्थापक, जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र की भूमि प्रसिद्ध हुई।
3. राजा प्रतीप
कुरु वंश के प्रतापी राजा, जिनके तीन पुत्र थे -
• देवापि - ज्येष्ठ पुत्र, जिन्होंने सन्यास ले लिया।
• बाल्हीक - दूसरे पुत्र, जो बाल्हिका राज्य (आधुनिक बल्ख, अफगानिस्तान क्षेत्र) के शासक बने।
• शांतनु - तृतीय पुत्र, जिन्होंने हस्तिनापुर का राजसिंहासन संभाला।
4. राजा शांतनु
प्रथम पत्नी गंगा से पुत्र :
• देवव्रत (भीष्म पितामह), जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया।
द्वितीय पत्नी सत्यवती से दो पुत्र :
• चित्रांगद - कम आयु में निधन
• विचित्रवीर्य – हस्तिनापुर के राजा बने, परंतु अल्पायु में निधन। इनकी दो पत्नियाँ थीं अंबिका और अंबालिका
5. विचित्रवीर्य के निधन के पश्चात् नियोग प्रथा से संतानोत्पत्ति
• अंबिका से पुत्र: धृतराष्ट्र (जन्म से नेत्रहीन)
• अंबालिका से पुत्र : पांडु (पीतवर्ण, श्रापग्रस्त)
• दासी से पुत्र : विदुर (महाज्ञानी, धर्मराज यम का अंशावतार माने जाते हैं)
6 (i). धृतराष्ट्र
पत्नी गांधारी से 100 पुत्र (कौरव) और 1 पुत्री (दुशला)
6 (ii). पांडु (हस्तिनापुर के राजा)
पांडु शापग्रस्त थे, अतः संतानोत्पत्ति असंभव
ऋषि दुर्वासा से मिले वरदान द्वारा देवताओं का आह्वान कर पुत्र प्राप्ति की गई।
पत्नी कुंती :
• युधिष्ठिर (धर्मराज के आह्वान से)
• भीम (वायु देव के आह्वान से)
• अर्जुन (इंद्र देव के आह्वान से)
पत्नी माद्री :
• नकुल व सहदेव (अश्विनीकुमारों के आह्वान से)
यही पाँचों भाई पांडव कहलाए।
7. भीम और घटोत्कच
द्वितीय पांडव भीम का विवाह वनवासी स्त्री हिडिंबा से हुआ। उनसे उत्पन्न पुत्र:
• घटोत्कच – अपराजेय योद्धा, जो महाभारत युद्ध में कर्ण के वज्रास्त्र से वीरगति को प्राप्त हुआ।
8. घटोत्कच की संतान
घटोत्कच का विवाह मोरवी (असम की राजकुमारी) से हुआ। उनसे उत्पन्न तीन पुत्र:
• बर्बरीक (श्याम बाबा) - तीन बाणों के स्वामी, शीशदान के लिए प्रसिद्ध।
• अंजनपर्व - वीर योद्धा, महाभारत युद्ध के चौदहवें दिवस अश्वत्थामा द्वारा वध।
• मेघवर्ण - पराक्रमी, महाभारत युद्धोत्तर अश्वमेध यज्ञ में अर्जुन के नेतृत्व में यज्ञ अश्व की रक्षा में देश भ्रमण किया।
9. पांडवों का अन्य विस्तार
अर्जुन एवं द्रौपदी से पुत्र: प्रतिविंध्य
अर्जुन एवं सुभद्रा से पुत्र : अभिमन्यु
10. अभिमन्यु एवं उत्तरा से पुत्र : परीक्षित
महाभारत युद्ध के बाद कुरु वंश का उत्तराधिकारी
इस प्रकार वंशावली भरत → कुरु → प्रतीप → शांतनु → धृतराष्ट्र-पांडु-विदुर → कौरव-पांडव → घटोत्कच-बर्बरीक
→ अभिमन्यु → परीक्षित तक चलती है।
(महाभारत के अनुसार)
1. भरत
भरत चक्रवर्ती प्राचीन भारत के सम्राट थे, जिनके नाम पर इस भूभाग को भारतवर्ष कहा गया। भरत से कई पीढ़ियों के उपरांत कुरु का जन्म हुआ।
भरत → कई पीढ़ियाँ → कुरु
2. कुरु
कुरु वंश के संस्थापक, जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र की भूमि प्रसिद्ध हुई।
3. राजा प्रतीप
कुरु वंश के प्रतापी राजा, जिनके तीन पुत्र थे -
• देवापि - ज्येष्ठ पुत्र, जिन्होंने सन्यास ले लिया।
• बाल्हीक - दूसरे पुत्र, जो बाल्हिका राज्य (आधुनिक बल्ख, अफगानिस्तान क्षेत्र) के शासक बने।
• शांतनु - तृतीय पुत्र, जिन्होंने हस्तिनापुर का राजसिंहासन संभाला।
4. राजा शांतनु
प्रथम पत्नी गंगा से पुत्र :
• देवव्रत (भीष्म पितामह), जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया।
द्वितीय पत्नी सत्यवती से दो पुत्र :
• चित्रांगद - कम आयु में निधन
• विचित्रवीर्य – हस्तिनापुर के राजा बने, परंतु अल्पायु में निधन। इनकी दो पत्नियाँ थीं अंबिका और अंबालिका
5. विचित्रवीर्य के निधन के पश्चात् नियोग प्रथा से संतानोत्पत्ति
• अंबिका से पुत्र: धृतराष्ट्र (जन्म से नेत्रहीन)
• अंबालिका से पुत्र : पांडु (पीतवर्ण, श्रापग्रस्त)
• दासी से पुत्र : विदुर (महाज्ञानी, धर्मराज यम का अंशावतार माने जाते हैं)
6 (i). धृतराष्ट्र
पत्नी गांधारी से 100 पुत्र (कौरव) और 1 पुत्री (दुशला)
6 (ii). पांडु (हस्तिनापुर के राजा)
पांडु शापग्रस्त थे, अतः संतानोत्पत्ति असंभव
ऋषि दुर्वासा से मिले वरदान द्वारा देवताओं का आह्वान कर पुत्र प्राप्ति की गई।
पत्नी कुंती :
• युधिष्ठिर (धर्मराज के आह्वान से)
• भीम (वायु देव के आह्वान से)
• अर्जुन (इंद्र देव के आह्वान से)
पत्नी माद्री :
• नकुल व सहदेव (अश्विनीकुमारों के आह्वान से)
यही पाँचों भाई पांडव कहलाए।
7. भीम और घटोत्कच
द्वितीय पांडव भीम का विवाह वनवासी स्त्री हिडिंबा से हुआ। उनसे उत्पन्न पुत्र:
• घटोत्कच – अपराजेय योद्धा, जो महाभारत युद्ध में कर्ण के वज्रास्त्र से वीरगति को प्राप्त हुआ।
8. घटोत्कच की संतान
घटोत्कच का विवाह मोरवी (असम की राजकुमारी) से हुआ। उनसे उत्पन्न तीन पुत्र:
• बर्बरीक (श्याम बाबा) - तीन बाणों के स्वामी, शीशदान के लिए प्रसिद्ध।
• अंजनपर्व - वीर योद्धा, महाभारत युद्ध के चौदहवें दिवस अश्वत्थामा द्वारा वध।
• मेघवर्ण - पराक्रमी, महाभारत युद्धोत्तर अश्वमेध यज्ञ में अर्जुन के नेतृत्व में यज्ञ अश्व की रक्षा में देश भ्रमण किया।
9. पांडवों का अन्य विस्तार
अर्जुन एवं द्रौपदी से पुत्र: प्रतिविंध्य
अर्जुन एवं सुभद्रा से पुत्र : अभिमन्यु
10. अभिमन्यु एवं उत्तरा से पुत्र : परीक्षित
महाभारत युद्ध के बाद कुरु वंश का उत्तराधिकारी
इस प्रकार वंशावली भरत → कुरु → प्रतीप → शांतनु → धृतराष्ट्र-पांडु-विदुर → कौरव-पांडव → घटोत्कच-बर्बरीक
→ अभिमन्यु → परीक्षित तक चलती है।
पांडव वन यात्रा मार्ग:
लाक्षागृह (बागपत) → हिंडनपार → यमुनापार (नावद्वारा) → कानपुरदेहात / फतेहपुर → बांदा →
चित्रकूट → करवी / मऊ → अत्रौली / मानिकपुर → मिर्जापुर के दक्षिणी भाग / विंध्याचल की पहाड़ियाँ → रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र जिला मुख्यालय) → रेनुकूट → म्योरपुर → दुद्धी → कनहर नदी पार → झारखंड के पलामू जिला में प्रवेश
चित्रकूट → करवी / मऊ → अत्रौली / मानिकपुर → मिर्जापुर के दक्षिणी भाग / विंध्याचल की पहाड़ियाँ → रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र जिला मुख्यालय) → रेनुकूट → म्योरपुर → दुद्धी → कनहर नदी पार → झारखंड के पलामू जिला में प्रवेश
पलामू मोहम्मदगंज → हुसैनाबाद → पंडवा (भीमचूल्हा) → गढ़वा जिला में प्रवेश→ रमकंडा → कांडी → लातेहार जिला में प्रवेश→ हेरहंज → बालूमाथ → चतरा जिला में प्रवेश → टंडवा → लावालौंग → इटखोरी (कौलेश्वरीधाम)
→ सारठ (देवघर) → ग्राम बाबूपुर → पालोजोरी → रणबहियार → जरमुंडी → शिवपहाड़ी → हंसडीहा → पांडेश्वरनाथ पहाड़ (दुमका) → हंसडीहा → बाँसुरी/बंजाही → देवली → कतरास → गोविंदपुर → निरसा → पांड्रा गांव (निरसा प्रखंड, धनबाद) → बलियापुर → तोपचांची → फुलवारी → भोजूडीह → पोलकीरी → कुम्हरी (चेचकाधाम) → चंदनकियारी (बोकारो)→ बेरमो → जरीडीह → चंद्रपुरा → तेनुघाट → पेटरवार → गोला प्रखंड (जिला रामगढ़) →ओर मांझी → नगड़ी गांव (रांची) → हटिया → नामकुम → तुपुदाना → खलारी/टांगरबसली → खूंटी सीमा → टोरपा → राजनगर → कर्रा → खरसावां सीमा → चक्रधरपुर → गोइलकेरा → महादेवशाल (हिडिंबवन)
लौटने का मार्ग :
महादेवशाल → टेबो (गोइलकेरा) → बहरागोड़ा→धालभूमगढ़ → घाटशिला (पंचपांडवस्थल) → मुसाबनी→ जादूगोड़ा → बराकर नदी के पास
गिरिडीह → लखीसराय → समस्तीपुर → आरा (बिहार)
→ सारठ (देवघर) → ग्राम बाबूपुर → पालोजोरी → रणबहियार → जरमुंडी → शिवपहाड़ी → हंसडीहा → पांडेश्वरनाथ पहाड़ (दुमका) → हंसडीहा → बाँसुरी/बंजाही → देवली → कतरास → गोविंदपुर → निरसा → पांड्रा गांव (निरसा प्रखंड, धनबाद) → बलियापुर → तोपचांची → फुलवारी → भोजूडीह → पोलकीरी → कुम्हरी (चेचकाधाम) → चंदनकियारी (बोकारो)→ बेरमो → जरीडीह → चंद्रपुरा → तेनुघाट → पेटरवार → गोला प्रखंड (जिला रामगढ़) →ओर मांझी → नगड़ी गांव (रांची) → हटिया → नामकुम → तुपुदाना → खलारी/टांगरबसली → खूंटी सीमा → टोरपा → राजनगर → कर्रा → खरसावां सीमा → चक्रधरपुर → गोइलकेरा → महादेवशाल (हिडिंबवन)
लौटने का मार्ग :
महादेवशाल → टेबो (गोइलकेरा) → बहरागोड़ा→धालभूमगढ़ → घाटशिला (पंचपांडवस्थल) → मुसाबनी→ जादूगोड़ा → बराकर नदी के पास
गिरिडीह → लखीसराय → समस्तीपुर → आरा (बिहार)
व्यापार के परे भारत की यात्रा में अग्रवाल समाज का योगदान
विख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा है -
हम बड़े नहीं हैं,
फिर भी बड़े हैं
इसलिए कि लोग जहाँ गिर पड़े हैं
हम वहाँ तने खड़े है.
अग्रवाल मतलब व्यापार ही नहीं, अग्रवाल मतलब सत्ता, साहित्य, संस्कृति, सृजन, खेल और सफलता है.
हालांकि किसी भी देश के इतिहास अथवा उसकी यात्रा को जातिगत योगदान में बाँटना उचित नहीं है. लेकिन अपने समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को अपने समाज के गौरवांवित अवदान से परिचित कराना भी आवश्यक है, ताकि वे जान सकें कि उनके पुरखों ने देश की प्रगति में कितना बड़ा योगदान दिया.
यकीन मानिए, यदि भारत की इतिहास यात्रा से अग्रवालों का अवदान अलग कर दिया जाए – तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अपना देश पचास वर्ष पीछे चला जाएगा.
संविधान निर्माता :
भारत का संविधान – जो हमारे लोकतंत्र की आत्मा है – उसकी प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा भीमराव आंबेडकर को पूरी दुनिया जानती है, किंतु उस समिति में सात सदस्य थे, जिसमें एक थे अग्रवाल समाज के देवी प्रसाद खेतान.
राजनीति :
आजादी के ठीक बाद सन 1947 में बनी संविधान सभा में रामनाथ गोयनका, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, कुसुमकांत जैन, राम बल्लभ विजयवर्गीय, गोपाल कृष्ण विजयवर्गीय जैसे प्रतिनिधियों ने हमारे समाज का मस्तक ऊँचा किया.
पहली लोकसभा में कई अग्रवाल सांसदों के नाम गूंजे, जिनमें मुख्य थे - बनारसी दास झुनझुनवाला, श्रीमन्नारायण धर्मनारायण अग्रवाल, मुकुंद लाल अग्रवाल, रामेश्वर प्रसाद नेवटिया, राधेश्याम मोरारका. समाजवादी आंदोलन के युगद्रष्टा डॉ. राममनोहर लोहिया से लेकर, वर्तमान में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल हों या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग, रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल अथवा भीलवाड़ा के सांसद दामोदर अग्रवाल, ये सभी अग्रवाल समाज के वह चेहरे हैं जिनके बिना भारतीय राजनीति की चर्चा अधूरी है.
बैंकर :
आजादी से पहले देश का सबसे बड़ा बैंक था - इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया – जिसके चेयरमैन थे बद्रीदास गोयनका, वही बैंक बाद में 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' बना. यानी हम अग्रवाल देश के सबसे बड़े बैंक की नींव के पत्थर हैं.
विमल जालान भारतीय रिजर्व बैंक के 21वें गवर्नर रहे हैं.
हाल ही में संजय अग्रवाल ने एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक की नींव रखकर आधुनिक वित्तीय क्षेत्र में नया अध्याय रचा है.
अतुल गोयल का नाम आप सबने सुना होगा, वे गत वर्ष तक पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक थे.
निवेशक :
इंडियन वॉरेन बफेट कहलाने वाले पद्मश्री राकेश झुनझुनवाला, को कौन नहीं जानता होगा, आज उनकी पत्नी रेखा झुनझुनवाला देश की दिग्गज निवेशक है. दिग्गज शेयर बाजार निवेशक मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल हैं. वहीं अवाना कैपिटल की संस्थापक अंजली बंसल है.
धार्मिक साहित्य :
यदि आज घर-घर में गीता, रामचरितमानस और हनुमान चालीसा उपलब्ध हैं, तो इसका श्रेय शंकराचार्यों या धर्म गुरुओं को नहीं जाता, बल्कि सेठ जयदयाल गोयनका और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार को जाता है, जिन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की. हिंदी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी अग्रवाल ही थे.
पत्रकारिता:
जम्मू-कश्मीर में पत्रकारिता की नींव रखने वाले लाला मुल्क राज सराफ अग्रवाल समाज की ही शान थे, जिन्होंने 1924 में “रणवीर” नामक पहला दैनिक निकाला. टाइम्स ऑफ इंडिया को अंग्रेजों से खरीदने वाले रामकृष्ण डालमिया, इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक रामनाथ गोयनका,
दैनिक भास्कर के संस्थापक रमेश चंद्र अग्रवाल से लेकर उदित वाणी के संस्थापक राधेश्याम अग्रवाल तक, सभी अग्रवाल ही तो हैं. पद्मश्री शोभना भरतिया देश की पहली महिला हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह एच टी मीडिया का नेतृत्व किया और पद्मश्री शीला झुनझुनवाला देश की पहली महिला पत्रकार हैं जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिंदुस्तान में संयुक्त संपादक की भूमिका निभाई.
साहित्य एवं शिक्षा :
“धरती धोरां री” जैसे अमर गीत के रचयिता पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया से लेकर वर्तमान समय में मशहूर कवि शैलेश लोढ़ा तक कई अग्रवाल हैं, जिनकी लेखनी अद्वितीय है. साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में कई अग्रवालों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है - पद्म भूषण डॉ. दिनेश नंदिनी डालमिया, पद्मश्री डॉ. बीना अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस, पद्मश्री डॉ. रामवतार पोद्दार 'अरुण'.
फिल्म, रंगमंच, टेलीविजन और कला :
कलाकार पद्मश्री रामगोपाल बजाज, जी टीवी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा, पद्मश्री जगदीश चंद्र मित्तल, पद्मश्री कोमल कोठारी - जैसे नाम बताते हैं कि साहित्य और कला में अग्रवाल समाज की क्या पैठ है. साउथ सिनेमा (तेलुगु, तमिल) की सुपरस्टार काजल अग्रवाल, 1990 की सुपरहिट फिल्म आशिकी से रातों-रात स्टार बनी अनु अग्रवाल, तमिल फिल्मों में बड़ी अभिनेत्री निधि अग्रवाल, स्टैंड अप कॉमेडियन कौस्तुभ अग्रवाल, स्टैंड-अप कॉमिक और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर गुनीत अग्रवाल जैसे कई नाम हैं, जो अग्रवाल समुदाय को नेक्स्ट लेवल पर ले गए हैं.
ई - कॉमर्स :
आधुनिक ई-कॉमर्स के दौर में अग्रवाल समाज ने देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँचाइयों पर पहुँचाया है.लेंसकार्ट के संस्थापक पीयूष बंसल, फ्लिपकार्ट के सचिन और बिन्नी बंसल, मिन्त्रा के मुकेश बंसल, स्नैपडील के रोहित बंसल, इंडियामार्ट के दिनेश अग्रवाल, ओला के भाविश अग्रवाल, ओयो के रितेश अग्रवाल, जोमैटो के दीपेंद्र गोयल, शादी डॉट कॉम के अनुपम मित्तल, येभी के मनमोहन अग्रवाल, सवारी के गौरव अग्रवाल, नापतौल वाले मनु अग्रवाल, सस्ता सुंदर डॉट कॉम के बनवारी लाल मित्तल आज देश की युवा पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं.
खेल और एडवेंचर :
जमशेदपुर की पद्मश्री प्रेमलता अग्रवाल ने ना केवल
एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा लहराया बल्कि विश्व की सातों सर्वोच्च चोटियां फतह कर डाली. एविएशन और एडवेंचर के क्षेत्र में पद्मभूषण विजयपत सिंघानिया, पद्मश्री अजीत बजाज और पद्मश्री देवेंद्र झाझरिया का नाम विश्व विख्यात है.
श्री राम मंदिर, अयोध्या:
अयोध्या के राम मंदिर को ही लीजिये, क्या अग्रवालों के योगदान के बिना इसका निर्माण संभव था? कदापि नहीं!
अयोध्या विवाद से संबंधित मुकदमे में रामलला की ओर से स्व. देवकी नंदन अग्रवाल मित्र रुप में पैरोकार रहे. श्री राम जन्मभूमि क्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या के महासचिव चंपत राय बंसल हैं. दिनांक 5 अगस्त, 2020 को श्री राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी के साथ मुख्य यजमान की भूमिका सलिल सिंघल ने निभाई, जो रामजन्मभूमि आंदोलन के सूत्रधार स्व. अशोक सिंघल के भतीजे हैं. रामलला की नई मूर्ति स्थापना के पूर्व अयोध्या के टैंट में भगवान श्रीराम के अष्टधातु का जो विग्रह था, उसके प्राकट्य के सूत्रधार भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार थे.
विष्णु हरि डालमिया हों या कोठारी बंधु, जय भगवान गोयल हों या विनोद कुमार बंसल अथवा अमर नाथ गोयल, स्व. सीताराम गोयल हों या स्व. रामस्वरूप अग्रवाल, जयपुर के एस के पोद्दार हों या इंदौर के बिनोद गोयल अथवा सूरत का अग्रवाल विकास ट्रस्ट, इन अग्रवाल विभूतियों की चर्चा के बगैर श्री राम मंदिर अयोध्या की स्थापना का इतिहास अधूरा है.
अध्यात्म :
विश्वविख्यात ध्यान गुरु पद्म भूषण सत्यनारायण गोयनका के विश्व भर में करोड़ों अनुयायी हैं. वैसे विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भी अग्रवाल समुदाय से हैं, उनके पिता का नाम रामकृपाल गर्ग और माताजी का नाम सरोज गर्ग है.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ :
अल्पसंख्यक संवाद और राष्ट्रीय एकता पर विशेष कार्य करने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी भी तो अग्रवाल ही हैं.
मेडिकल और इंजिनियरिंग:
चिकित्सा, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में तो कई अग्रवाल विभूतियां हैं, जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया - पद्मभूषण डॉ. सत्य पॉल अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सुदर्शन कुमार अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. के. के. अग्रवाल, डॉ. अशोक पनगढ़िया, पद्मश्री प्रो. पवन राज गोयल, पद्मविभूषण डॉ. बालकृष्ण गोयल, पद्मविभूषण डॉ. दौलत सिंह कोठारी, पद्मश्री डॉ. लोकेश कुमार सिंघल, पद्मश्री प्रेम शंकर गोयल, पद्मश्री डॉ. जय पाल मित्तल और पद्मभूषण रामनारायण अग्रवाल.
समाजसेवा :
समाजिक कार्य के क्षेत्र में तो देश के हर शहर, हर गांव, हर कस्बे में एक विख्यात अग्रवाल मिलेंगे. किंतु यहां चर्चा केवल उन चुनिंदा अग्रवालों की, जिनको समाजसेवा के क्षेत्र में पद्म सम्मान से विभूषित किया गया - पद्मश्री कैलाश चन्द्र अग्रवाल, पद्मश्री मामराज अग्रवाल, पद्मभूषण सीताराम सेकसरिया, पद्मश्री सुलोचना मोदी और पद्मविभूषण जानकीबाई बजाज.
प्रशासनिक सेवा, सार्वजनिक मामले और पर्यावरण :
कोविड 19 महामारी के दौरान भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की मीडिया ब्रीफिंग्स करने वाले प्रतिनिधि के रुप में लव अग्रवाल देश के विख्यात आईएएस हैं. भारतनेट और डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट की मुख्य आर्किटेक्ट अरुणा अग्रवाल दूरसंचार सचिव और बाद में राज्यसभा सदस्य रहीं.
डी. पी. अग्रवाल और विनय मित्तल संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं. सुभाष चंद्र गर्ग वर्ल्ड बैंक में कार्यकारी निदेशक रहे. आई पी एस सीमांत गोयल रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के प्रमुख रहे. केरल कैडर के आई ए एस अधिकारी एल. सी. गोयल केंद्रीय गृह सचिव रहे. प्रशासनिक सेवा और सार्वजनिक मामलों में पद्मश्री सुरजमल अग्रवाल, पद्मभूषण डॉ० लक्ष्मी मल्ल सिंघवी, विख्यात पर्यावरणविद पद्मभूषण अनिल कुमार अग्रवाल का नाम उल्लेखनीय है.
ये उदाहरण साबित करते हैं कि हमारी उड़ान केवल व्यापार तक सीमित नहीं है. कौन सा क्षेत्र है जहां अग्रवालों की धमक नहीं है? व्यापार से परे – राजनीति से साहित्य तक,
माउंट एवरेस्ट से राम मंदिर तक, अग्रवाल समाज ने भारत की यात्रा को गति और गौरव दोनों दिया है.
हम बड़े नहीं हैं,
फिर भी बड़े हैं
इसलिए कि लोग जहाँ गिर पड़े हैं
हम वहाँ तने खड़े है.
अग्रवाल मतलब व्यापार ही नहीं, अग्रवाल मतलब सत्ता, साहित्य, संस्कृति, सृजन, खेल और सफलता है.
हालांकि किसी भी देश के इतिहास अथवा उसकी यात्रा को जातिगत योगदान में बाँटना उचित नहीं है. लेकिन अपने समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को अपने समाज के गौरवांवित अवदान से परिचित कराना भी आवश्यक है, ताकि वे जान सकें कि उनके पुरखों ने देश की प्रगति में कितना बड़ा योगदान दिया.
यकीन मानिए, यदि भारत की इतिहास यात्रा से अग्रवालों का अवदान अलग कर दिया जाए – तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अपना देश पचास वर्ष पीछे चला जाएगा.
संविधान निर्माता :
भारत का संविधान – जो हमारे लोकतंत्र की आत्मा है – उसकी प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा भीमराव आंबेडकर को पूरी दुनिया जानती है, किंतु उस समिति में सात सदस्य थे, जिसमें एक थे अग्रवाल समाज के देवी प्रसाद खेतान.
राजनीति :
आजादी के ठीक बाद सन 1947 में बनी संविधान सभा में रामनाथ गोयनका, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, कुसुमकांत जैन, राम बल्लभ विजयवर्गीय, गोपाल कृष्ण विजयवर्गीय जैसे प्रतिनिधियों ने हमारे समाज का मस्तक ऊँचा किया.
पहली लोकसभा में कई अग्रवाल सांसदों के नाम गूंजे, जिनमें मुख्य थे - बनारसी दास झुनझुनवाला, श्रीमन्नारायण धर्मनारायण अग्रवाल, मुकुंद लाल अग्रवाल, रामेश्वर प्रसाद नेवटिया, राधेश्याम मोरारका. समाजवादी आंदोलन के युगद्रष्टा डॉ. राममनोहर लोहिया से लेकर, वर्तमान में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल हों या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग, रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल अथवा भीलवाड़ा के सांसद दामोदर अग्रवाल, ये सभी अग्रवाल समाज के वह चेहरे हैं जिनके बिना भारतीय राजनीति की चर्चा अधूरी है.
बैंकर :
आजादी से पहले देश का सबसे बड़ा बैंक था - इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया – जिसके चेयरमैन थे बद्रीदास गोयनका, वही बैंक बाद में 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' बना. यानी हम अग्रवाल देश के सबसे बड़े बैंक की नींव के पत्थर हैं.
विमल जालान भारतीय रिजर्व बैंक के 21वें गवर्नर रहे हैं.
हाल ही में संजय अग्रवाल ने एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक की नींव रखकर आधुनिक वित्तीय क्षेत्र में नया अध्याय रचा है.
अतुल गोयल का नाम आप सबने सुना होगा, वे गत वर्ष तक पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक थे.
निवेशक :
इंडियन वॉरेन बफेट कहलाने वाले पद्मश्री राकेश झुनझुनवाला, को कौन नहीं जानता होगा, आज उनकी पत्नी रेखा झुनझुनवाला देश की दिग्गज निवेशक है. दिग्गज शेयर बाजार निवेशक मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल हैं. वहीं अवाना कैपिटल की संस्थापक अंजली बंसल है.
धार्मिक साहित्य :
यदि आज घर-घर में गीता, रामचरितमानस और हनुमान चालीसा उपलब्ध हैं, तो इसका श्रेय शंकराचार्यों या धर्म गुरुओं को नहीं जाता, बल्कि सेठ जयदयाल गोयनका और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार को जाता है, जिन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की. हिंदी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी अग्रवाल ही थे.
पत्रकारिता:
जम्मू-कश्मीर में पत्रकारिता की नींव रखने वाले लाला मुल्क राज सराफ अग्रवाल समाज की ही शान थे, जिन्होंने 1924 में “रणवीर” नामक पहला दैनिक निकाला. टाइम्स ऑफ इंडिया को अंग्रेजों से खरीदने वाले रामकृष्ण डालमिया, इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक रामनाथ गोयनका,
दैनिक भास्कर के संस्थापक रमेश चंद्र अग्रवाल से लेकर उदित वाणी के संस्थापक राधेश्याम अग्रवाल तक, सभी अग्रवाल ही तो हैं. पद्मश्री शोभना भरतिया देश की पहली महिला हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह एच टी मीडिया का नेतृत्व किया और पद्मश्री शीला झुनझुनवाला देश की पहली महिला पत्रकार हैं जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिंदुस्तान में संयुक्त संपादक की भूमिका निभाई.
साहित्य एवं शिक्षा :
“धरती धोरां री” जैसे अमर गीत के रचयिता पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया से लेकर वर्तमान समय में मशहूर कवि शैलेश लोढ़ा तक कई अग्रवाल हैं, जिनकी लेखनी अद्वितीय है. साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में कई अग्रवालों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है - पद्म भूषण डॉ. दिनेश नंदिनी डालमिया, पद्मश्री डॉ. बीना अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस, पद्मश्री डॉ. रामवतार पोद्दार 'अरुण'.
फिल्म, रंगमंच, टेलीविजन और कला :
कलाकार पद्मश्री रामगोपाल बजाज, जी टीवी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा, पद्मश्री जगदीश चंद्र मित्तल, पद्मश्री कोमल कोठारी - जैसे नाम बताते हैं कि साहित्य और कला में अग्रवाल समाज की क्या पैठ है. साउथ सिनेमा (तेलुगु, तमिल) की सुपरस्टार काजल अग्रवाल, 1990 की सुपरहिट फिल्म आशिकी से रातों-रात स्टार बनी अनु अग्रवाल, तमिल फिल्मों में बड़ी अभिनेत्री निधि अग्रवाल, स्टैंड अप कॉमेडियन कौस्तुभ अग्रवाल, स्टैंड-अप कॉमिक और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर गुनीत अग्रवाल जैसे कई नाम हैं, जो अग्रवाल समुदाय को नेक्स्ट लेवल पर ले गए हैं.
ई - कॉमर्स :
आधुनिक ई-कॉमर्स के दौर में अग्रवाल समाज ने देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँचाइयों पर पहुँचाया है.लेंसकार्ट के संस्थापक पीयूष बंसल, फ्लिपकार्ट के सचिन और बिन्नी बंसल, मिन्त्रा के मुकेश बंसल, स्नैपडील के रोहित बंसल, इंडियामार्ट के दिनेश अग्रवाल, ओला के भाविश अग्रवाल, ओयो के रितेश अग्रवाल, जोमैटो के दीपेंद्र गोयल, शादी डॉट कॉम के अनुपम मित्तल, येभी के मनमोहन अग्रवाल, सवारी के गौरव अग्रवाल, नापतौल वाले मनु अग्रवाल, सस्ता सुंदर डॉट कॉम के बनवारी लाल मित्तल आज देश की युवा पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं.
खेल और एडवेंचर :
जमशेदपुर की पद्मश्री प्रेमलता अग्रवाल ने ना केवल
एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा लहराया बल्कि विश्व की सातों सर्वोच्च चोटियां फतह कर डाली. एविएशन और एडवेंचर के क्षेत्र में पद्मभूषण विजयपत सिंघानिया, पद्मश्री अजीत बजाज और पद्मश्री देवेंद्र झाझरिया का नाम विश्व विख्यात है.
श्री राम मंदिर, अयोध्या:
अयोध्या के राम मंदिर को ही लीजिये, क्या अग्रवालों के योगदान के बिना इसका निर्माण संभव था? कदापि नहीं!
अयोध्या विवाद से संबंधित मुकदमे में रामलला की ओर से स्व. देवकी नंदन अग्रवाल मित्र रुप में पैरोकार रहे. श्री राम जन्मभूमि क्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या के महासचिव चंपत राय बंसल हैं. दिनांक 5 अगस्त, 2020 को श्री राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी के साथ मुख्य यजमान की भूमिका सलिल सिंघल ने निभाई, जो रामजन्मभूमि आंदोलन के सूत्रधार स्व. अशोक सिंघल के भतीजे हैं. रामलला की नई मूर्ति स्थापना के पूर्व अयोध्या के टैंट में भगवान श्रीराम के अष्टधातु का जो विग्रह था, उसके प्राकट्य के सूत्रधार भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार थे.
विष्णु हरि डालमिया हों या कोठारी बंधु, जय भगवान गोयल हों या विनोद कुमार बंसल अथवा अमर नाथ गोयल, स्व. सीताराम गोयल हों या स्व. रामस्वरूप अग्रवाल, जयपुर के एस के पोद्दार हों या इंदौर के बिनोद गोयल अथवा सूरत का अग्रवाल विकास ट्रस्ट, इन अग्रवाल विभूतियों की चर्चा के बगैर श्री राम मंदिर अयोध्या की स्थापना का इतिहास अधूरा है.
अध्यात्म :
विश्वविख्यात ध्यान गुरु पद्म भूषण सत्यनारायण गोयनका के विश्व भर में करोड़ों अनुयायी हैं. वैसे विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भी अग्रवाल समुदाय से हैं, उनके पिता का नाम रामकृपाल गर्ग और माताजी का नाम सरोज गर्ग है.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ :
अल्पसंख्यक संवाद और राष्ट्रीय एकता पर विशेष कार्य करने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी भी तो अग्रवाल ही हैं.
मेडिकल और इंजिनियरिंग:
चिकित्सा, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में तो कई अग्रवाल विभूतियां हैं, जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया - पद्मभूषण डॉ. सत्य पॉल अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सुदर्शन कुमार अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. के. के. अग्रवाल, डॉ. अशोक पनगढ़िया, पद्मश्री प्रो. पवन राज गोयल, पद्मविभूषण डॉ. बालकृष्ण गोयल, पद्मविभूषण डॉ. दौलत सिंह कोठारी, पद्मश्री डॉ. लोकेश कुमार सिंघल, पद्मश्री प्रेम शंकर गोयल, पद्मश्री डॉ. जय पाल मित्तल और पद्मभूषण रामनारायण अग्रवाल.
समाजसेवा :
समाजिक कार्य के क्षेत्र में तो देश के हर शहर, हर गांव, हर कस्बे में एक विख्यात अग्रवाल मिलेंगे. किंतु यहां चर्चा केवल उन चुनिंदा अग्रवालों की, जिनको समाजसेवा के क्षेत्र में पद्म सम्मान से विभूषित किया गया - पद्मश्री कैलाश चन्द्र अग्रवाल, पद्मश्री मामराज अग्रवाल, पद्मभूषण सीताराम सेकसरिया, पद्मश्री सुलोचना मोदी और पद्मविभूषण जानकीबाई बजाज.
प्रशासनिक सेवा, सार्वजनिक मामले और पर्यावरण :
कोविड 19 महामारी के दौरान भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की मीडिया ब्रीफिंग्स करने वाले प्रतिनिधि के रुप में लव अग्रवाल देश के विख्यात आईएएस हैं. भारतनेट और डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट की मुख्य आर्किटेक्ट अरुणा अग्रवाल दूरसंचार सचिव और बाद में राज्यसभा सदस्य रहीं.
डी. पी. अग्रवाल और विनय मित्तल संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं. सुभाष चंद्र गर्ग वर्ल्ड बैंक में कार्यकारी निदेशक रहे. आई पी एस सीमांत गोयल रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के प्रमुख रहे. केरल कैडर के आई ए एस अधिकारी एल. सी. गोयल केंद्रीय गृह सचिव रहे. प्रशासनिक सेवा और सार्वजनिक मामलों में पद्मश्री सुरजमल अग्रवाल, पद्मभूषण डॉ० लक्ष्मी मल्ल सिंघवी, विख्यात पर्यावरणविद पद्मभूषण अनिल कुमार अग्रवाल का नाम उल्लेखनीय है.
ये उदाहरण साबित करते हैं कि हमारी उड़ान केवल व्यापार तक सीमित नहीं है. कौन सा क्षेत्र है जहां अग्रवालों की धमक नहीं है? व्यापार से परे – राजनीति से साहित्य तक,
माउंट एवरेस्ट से राम मंदिर तक, अग्रवाल समाज ने भारत की यात्रा को गति और गौरव दोनों दिया है.
Friday, 10 January 2025
साक्षात्कार : संदीप मुरारका
प्रश्न : क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि वर्ग विशेष पर लिखकर आप पुरस्कार विजेताओं का वर्गीकरण कर रहे हैं?
संदीप : फलों के राजा आम की कई किस्में बाजार में उपलब्ध रहती है़- हाफूस, लंगड़ा, सिंदूरी, मालदा, चौसा, बंगनपल्ली, हिमसागर, दशहरी, बादामी, केशर, मनकुराड़ इत्यादि। आम की सभी प्रजातियाँ रसभरी हैं, सभी का अपना अपना स्वाद है़। किंतु किसी को लंगड़ा पसंद है़, तो किसी को सिंदूरी। उसी प्रकार पद्म पुरस्कार प्राप्त हर शख्शियत सम्मानित है़। किंतु बतौर पाठक सबके विषय में पढ़ पाना असंभव है़। अतः वर्गीकरण के आधार पर मैं इन प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनियों का एक नया पाठकवर्ग तैयार करने का प्रयास कर रहा हूँ।
प्रश्न : पद्म पुरस्कार विजेताओं की जीवनियों को लिखने के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है़?
संदीप : अपने देश में हर वर्ष हजारों छात्र छात्राएँ पीएचडी करते हैं। किंतु अधिंकाश के विषय समान हैं। जबकि आदिवासियों की संघर्ष गाथा बहुत कठिन है़, फूस के झोपड़े से निकलकर पुरस्कृत होने के लिए राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने की कहानी को थीसिस में बदला जाए। मैं चाहता हूँ कि आदिवासियों में जो प्रेरक व्यक्तित्व हैं, उनपर शोध हो। इसके लिए जो बुनियादी जानकारी चाहिए, वो मेरी पुस्तकों में उपलब्ध है़। मेरी पुस्तकें शोधार्थियों के लिए नए द्वार खोले एवं संदर्भ पुस्तक बने, यही मेरा उद्देश्य है़।
प्रश्न : आप स्वयं ना डॉक्टरेट हैं, ना एमए, ना प्रोफेसर, ना शिक्षक, फिर भी आप लेखन कार्य कर रहे हैं। ऐसे में आपके लेखन की कितनी स्वीकार्यता होगी?
संदीप : क्या आपने कभी सुना है़ कि डॉ. गोस्वामी तुलसीदास या डॉ. कबीर या प्रो. सूरदास या प्रो. रहीम, नहीं ना। भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली गद्य-साहित्य का जनक माना जाता है, किंतु उन्होंने तो स्कूली शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी। ना प्रेमचंद एमए एमफिल थे और ना ही दिनकर। साहित्य पुरोधा मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी ने तो मैट्रिकुलेशन भी नहीं किया था।
मेरी पुस्तकों को पढें, आप पाएंगे कि कई ऐसे साहित्यकार हुए, जिनको पद्म सम्मान से विभूषित किया गया। किंतु वे ना तो डिग्री होल्डर हैं और ना कभी स्कूल कॉलेज जा पाए। यथा: पद्मश्री भीखुदान गोविंद भाई गढ़वी, पद्मश्री कवि दुला भाया काग, पद्मश्री बेनीचंद्र जमाटिया, पद्मश्री दादूदान गढ़वी, पद्मश्री पूर्णमासी जानी इत्यादि।
प्रश्न : आपको साहित्य सृजन की प्रेरणा कैसे मिली ?
संदीप : मेरे पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था, उनके पास हजारों पुस्तकें थी। गुरुदत्त की तो लगभग सारी पुस्तकें उनके संग्रह का हिस्सा थी। कहा जा सकता है़ कि मुझे पढ़ने की प्रेरणा बचपन में ही अपने पिता से मिली। मेरी प्रारंभिक शिक्षा जमशेदपुर के सबसे पुराने साहित्यिक केंद्र जगतबंधु सेवासदन पुस्तकालय द्वारा संचालित विद्यालय से हुई, सो मेरा जुड़ाव पुस्तकालय व वहाँ की साहित्यिक गतिविधियों से होता चला गया। वर्ष 1993 में मैंने मैट्रिकुलेशन किया, तबतक कविताओं से परिचय हो गया था। आकाशवाणी के विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागिता एवं पत्रकारिता का दौर प्रारंभ हो चुका था।
प्रश्न : पत्रकारिता !
संदीप : जी, पत्रकारिता। वर्ष 1993 -95 में लगभग डेढ़ साल तक मैंने दैनिक आज में बतौर पत्रकार कार्य किया। मेरे विषय थे सामयिक आलेख, साक्षात्कार, साहित्यिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिग। उन दिनों आकाशवाणी में एक कार्यक्रम आता था युवा वार्ता, मुझे कई बार उसके संचालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है़। उनदिनों पंद्रह मिनट के कार्यक्रम के पचहत्तर रुपए प्राप्त हुआ करते थे।
प्रश्न : वर्ष 1995 के बाद सीधे 2020 में पुस्तक, बीच में आप कहाँ खो गए?
संदीप : व्यवसायिक परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा भी झुकाव व्यवसाय की ओर बढ़ता चला गया। व्यवसाय और पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण लेखन कार्य भले ही बाधित हुआ, किंतु अध्ययन जारी रहा। जमशेदपुर पुस्तक मेले से प्रत्येक वर्ष मैं 8-10 पुस्तकें अवश्य खरीदता रहा हूँ। समय समय पर विभिन्न विषयों पर आर्टिकल्स भी लिखते रहा और स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होता रहा। ईश्वरीय प्रेरणा से वर्ष 2017 से मेरा मन पुराणों के अध्ययन में लगने लगा। श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, लवकुश चरित, विष्णु पुराण, शिव पुराण, वराह पुराण, देवी पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण इत्यादि कई धार्मिक ग्रंथो के अध्ययन से लेखन के प्रति मेरी रुचि जागृत हो गई।
प्रश्न : इसका मतलब आप हिंदूवादी धार्मिक विचारधारा के हैं?
संदीप : निश्चित तौर पर। मेरा जन्म सरस्वती पूजा बसंत पंचमी की रात्रि का है़। लेकिन यह कहना गलत होगा कि मैं हिंदूवादी हूँ। मैं सभी धर्मों का समान रुप से सम्मान करता हूँ। मेरी हाई स्कूल की शिक्षा सेंट मेरीज मिशनरी स्कूल से हुई है़। मेरा मानना है़ कि जो अनुशासन आप मिशनरीज में सीख सकते हैं वो और कहीं संभव नहीं है़।
साथ ही मैं यह भी जोड़ता हूँ कि हिंदू धर्म का जितना नुकसान हमारे धर्मगुरुओं व मठाधीशों ने किया है़, उतना किसी दूसरे ने नहीं किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 122 प्रमुख भाषाएँ हैं एवं 1599 अन्य बोलियाँ हैं। वहीं विश्व के 195 देशों में लगभग 7,117 भाषाएँ बोली जाती हैं। बीबीसी न्यूज के एक आर्टिकल के अनुसार भारत में लगभग 3,000 जातियाँ एवं 25,000 उपजातियाँ हैं। हर जाति के अपने नियम, अपनी धार्मिक परम्पराएं, अपने देवी देवता, अपने रीति रिवाज, अपनी मान्यताएँ और अपनी धार्मिक पुस्तक है़। भारत में प्रचलित ये धार्मिक पुस्तकें या तो उस धर्म को मानने वाले लोगों की अपनी निजी भाषा में उपलब्ध है, या बहुत हुआ तो हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और ओड़िया में प्रकाशित हुई है। अपने देश में एकमात्र "श्रीमद्भागवत गीता" ही ऐसा लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ है, जिसका अनुवाद लगभग 75 भाषाओं में हो पाया है। किंतु
चर्च ने अपने धार्मिक ग्रंथ "पवित्र बाइबिल" का अनुवाद विश्व की लगभग हर भाषा में करवाया। पूर्ण बाइबिल का अनुवाद विश्व की लगभग 704 भाषाओं में हो चुका है। वहीं इसके पदों एवं कुछ अंशो को 3,415 भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है। उसपर भी सबसे मुख्य बात कि यदि किसी को बाइबिल पढ़नी हो तो निःशुल्क उपलब्ध हो जाएगी। जबकि करोड़ रुपए खर्च कर आयोजित किए गए हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों में भी आपको श्रीमद्भागवत गीता या श्रीरामचरितमानस निःशुल्क नहीं मिलेगी।
प्रश्न : आपकी विचारधारा क्या है़?
संदीप : स्वभावतः कहा जाए तो मैं लोहिया के विचारों से प्रभावित रहा हूँ। मैं स्वयं को समाजवादी मानता हूँ। किंतु वो समाजवाद जिसकी नींव श्रीराम ने रखी, शबरी के हाथों जूठे बेर खाए। वो समाजवाद जिसके प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन रहे, जिन्होंने एक ईंट एक रुपया का सिद्धांत दिया। वो समाजवाद जिसके पैरोकार डॉ. राममनोहर लोहिया रहे। ना कि काशीराम, मायावती या आज की राजनीति वाला समाजवाद।
प्रश्न : साहित्यिक आयोजनों में आपकी उपस्थिति ना के बराबर रहती है़ ?
संदीप : ऐसा नहीं है़! मैं सामाजिक व्यक्ति हूँ, कई सामाजिक संगठनों में दायित्व पर हूँ। व्यवसाय व समाज के कार्यक्रमों के कारण व्यस्तता रहती है़। यदि किसी साहित्यिक कार्यक्रम में निजी तौर पर बुलावा रहता है़, तो अवश्य भाग लेता हूँ। हाँ यह बात सही है़ कि मैं बिना समुचित निमंत्रण किसी कार्यक्रम में नहीं जाता।
प्रश्न : आपने अधिकांश कविताओं में सरल और सहज शब्दों का प्रयोग किया है। क्यों ?
संदीप : भारीभरकम शब्द लिखने वाला ही साहित्यकार है़, यह सोचना गलत है़। आप गौर कीजिए कि बाबा नागार्जुन से लेकर कुमार विश्वास तक सरल एवं तुरंत समझ में आने वाले शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। मेरा पाठक किसी विभूति के विषय में यदि एक बार पढ़ ले, तो वह उस पर खुलकर चर्चा कर सके। इसीलिए मैंने असाधारण व्यक्तित्वों की जीवनियों को साधारण शब्दों में लिखा है़।
प्रश्न : क्या आपको लगता है़ कि साहित्य की इस विशाल दुनिया में आपकी पुस्तकें स्थान बना पाएँगी?
संदीप : क्यूँ बनाना है़ स्थान ! मैं अपनी पुस्तकों को संग्रहालय या पुस्तकालय का हिस्सा बनाने में इच्छुक नहीं।मेरी पुस्तकें तो शब्द रूपी "तर्पण" है समाज की उन विभूतियों का जिनके बहुमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा और "दर्पण" है वैसे जुझारु युवाओं के लिए जो लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि यूपीएससी की तैयारी करने वाला छात्र मेरी पुस्तक ढूंढकर पढ़े। मैं चाहता हूँ कि कॉलेज में आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिताओं में छात्र छात्राएँ मेरी पुस्तक से विषय उठाएँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी पुस्तक सामयिक पत्रकारिता में काम आए।
प्रश्न : साहित्य के क्षेत्र में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं ?
संदीप : साहित्य का क्षेत्र खेल के मैदान में आयोजित दौड़ प्रतियोगिता तो है़ नहीं कि मैं किस स्थान पर आया। यह एक खूबसूरत बगीचा है़, जिसमें कहीं कहीं रिक्त भूमि खोजकर मैं भी दो चार पौधे लगाना चाहता हूँ। मेरे द्वारा लिखी पुस्तकों को संदर्भ ग्रंथ मानकर शोधार्थी पीएचडी करेंगे, ये मेरे लिए गर्व की बात है़। मेरी पुस्तकों में अंकित संघर्ष गाथाओं से प्रभावित होकर जिस दिन कोई युवा पद्म सम्मान प्राप्त करने राष्ट्रपति भवन की ड्योढ़ी तक जा पहुँचेगा, मैं समझूंगा मुझे समुचित पारिश्रमिक प्राप्त हुआ।
प्रश्न : अपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?
संदीप : काव्य संग्रह आँख खोलती सुबह में प्रकाशित कविता 'दियासलाई', वर्ष 1993 में प्रकाशित इस पुस्तक के संपादक थे स्व. शैलेश पांडेय एवं कथाकार राकेश मिश्र।
प्रश्न : इन दिनों क्या लिख रहे हैं ?
संदीप : पुस्तक शिखर को छूते ट्राइबल्स के चौथे भाग पर कार्य जारी है़। साथ ही उसके भाग 1 एवं 3 के अंग्रेजी अनुवाद की भी तैयारी चल रही है़।
प्रश्न : आपकी पुस्तकों के संबंध में कोई विशेष बात, जो आप पाठकों तक पहुंचाना चाहें?
संदीप : पूरे देश में एकरूपता लाने हेतु केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण कर दिया गया है़। मैं प्रयासरत हूँ कि मेरा लेखन आईएस 16500 : 2012 के अनुसार हो। शिखर को छूते ट्राइबल्स भाग 3 एवं पद्म अलंकृत विभूतियाँ (मारवाड़ी/अग्रवाल) उसी पैटर्न पर लिखी गई हैं।
प्रश्न : आजकल पुस्तकों के पाठक कम होते जा रहे हैं, ऐसे में आपके मन में कभी यह नही आता कि क्यों लिखा जाए ?
संदीप : कम होते जा रहे हैं या बढ़ते जा रहे हैं? कल तक पूर्वोत्तर में कोई हिंदी बोलना नहीं चाहता था, आज वहाँ हिंदी पाँव पसार चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक हिंदी विश्व में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है़। ऐसे में सवाल उठता है़ कि इन हिंदीभाषियों तक अपनी पुस्तक कैसे पंहुचायी जाए। और इस प्रश्न का एक ही जवाब है़ कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो लीक से अलग हट कर हो।
प्रश्न : नवोदित साहित्यकारों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?
संदीप : दो बात। पहला अध्ययन अवश्य करें, क्योंकि बिना पढ़े अच्छा लिखना संभव नहीं। दूसरा प्रतिदिन लिखें, चाहे एक ही वाक्य लिखें, पर अवश्य लिखें। लिखने की आदत नित्यकर्म जैसी होनी चाहिए, आदत छूटी, लिखना छूटा समझो।
संदीप : फलों के राजा आम की कई किस्में बाजार में उपलब्ध रहती है़- हाफूस, लंगड़ा, सिंदूरी, मालदा, चौसा, बंगनपल्ली, हिमसागर, दशहरी, बादामी, केशर, मनकुराड़ इत्यादि। आम की सभी प्रजातियाँ रसभरी हैं, सभी का अपना अपना स्वाद है़। किंतु किसी को लंगड़ा पसंद है़, तो किसी को सिंदूरी। उसी प्रकार पद्म पुरस्कार प्राप्त हर शख्शियत सम्मानित है़। किंतु बतौर पाठक सबके विषय में पढ़ पाना असंभव है़। अतः वर्गीकरण के आधार पर मैं इन प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनियों का एक नया पाठकवर्ग तैयार करने का प्रयास कर रहा हूँ।
प्रश्न : पद्म पुरस्कार विजेताओं की जीवनियों को लिखने के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है़?
संदीप : अपने देश में हर वर्ष हजारों छात्र छात्राएँ पीएचडी करते हैं। किंतु अधिंकाश के विषय समान हैं। जबकि आदिवासियों की संघर्ष गाथा बहुत कठिन है़, फूस के झोपड़े से निकलकर पुरस्कृत होने के लिए राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने की कहानी को थीसिस में बदला जाए। मैं चाहता हूँ कि आदिवासियों में जो प्रेरक व्यक्तित्व हैं, उनपर शोध हो। इसके लिए जो बुनियादी जानकारी चाहिए, वो मेरी पुस्तकों में उपलब्ध है़। मेरी पुस्तकें शोधार्थियों के लिए नए द्वार खोले एवं संदर्भ पुस्तक बने, यही मेरा उद्देश्य है़।
प्रश्न : आप स्वयं ना डॉक्टरेट हैं, ना एमए, ना प्रोफेसर, ना शिक्षक, फिर भी आप लेखन कार्य कर रहे हैं। ऐसे में आपके लेखन की कितनी स्वीकार्यता होगी?
संदीप : क्या आपने कभी सुना है़ कि डॉ. गोस्वामी तुलसीदास या डॉ. कबीर या प्रो. सूरदास या प्रो. रहीम, नहीं ना। भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली गद्य-साहित्य का जनक माना जाता है, किंतु उन्होंने तो स्कूली शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी। ना प्रेमचंद एमए एमफिल थे और ना ही दिनकर। साहित्य पुरोधा मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी ने तो मैट्रिकुलेशन भी नहीं किया था।
मेरी पुस्तकों को पढें, आप पाएंगे कि कई ऐसे साहित्यकार हुए, जिनको पद्म सम्मान से विभूषित किया गया। किंतु वे ना तो डिग्री होल्डर हैं और ना कभी स्कूल कॉलेज जा पाए। यथा: पद्मश्री भीखुदान गोविंद भाई गढ़वी, पद्मश्री कवि दुला भाया काग, पद्मश्री बेनीचंद्र जमाटिया, पद्मश्री दादूदान गढ़वी, पद्मश्री पूर्णमासी जानी इत्यादि।
प्रश्न : आपको साहित्य सृजन की प्रेरणा कैसे मिली ?
संदीप : मेरे पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था, उनके पास हजारों पुस्तकें थी। गुरुदत्त की तो लगभग सारी पुस्तकें उनके संग्रह का हिस्सा थी। कहा जा सकता है़ कि मुझे पढ़ने की प्रेरणा बचपन में ही अपने पिता से मिली। मेरी प्रारंभिक शिक्षा जमशेदपुर के सबसे पुराने साहित्यिक केंद्र जगतबंधु सेवासदन पुस्तकालय द्वारा संचालित विद्यालय से हुई, सो मेरा जुड़ाव पुस्तकालय व वहाँ की साहित्यिक गतिविधियों से होता चला गया। वर्ष 1993 में मैंने मैट्रिकुलेशन किया, तबतक कविताओं से परिचय हो गया था। आकाशवाणी के विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागिता एवं पत्रकारिता का दौर प्रारंभ हो चुका था।
प्रश्न : पत्रकारिता !
संदीप : जी, पत्रकारिता। वर्ष 1993 -95 में लगभग डेढ़ साल तक मैंने दैनिक आज में बतौर पत्रकार कार्य किया। मेरे विषय थे सामयिक आलेख, साक्षात्कार, साहित्यिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिग। उन दिनों आकाशवाणी में एक कार्यक्रम आता था युवा वार्ता, मुझे कई बार उसके संचालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है़। उनदिनों पंद्रह मिनट के कार्यक्रम के पचहत्तर रुपए प्राप्त हुआ करते थे।
प्रश्न : वर्ष 1995 के बाद सीधे 2020 में पुस्तक, बीच में आप कहाँ खो गए?
संदीप : व्यवसायिक परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा भी झुकाव व्यवसाय की ओर बढ़ता चला गया। व्यवसाय और पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण लेखन कार्य भले ही बाधित हुआ, किंतु अध्ययन जारी रहा। जमशेदपुर पुस्तक मेले से प्रत्येक वर्ष मैं 8-10 पुस्तकें अवश्य खरीदता रहा हूँ। समय समय पर विभिन्न विषयों पर आर्टिकल्स भी लिखते रहा और स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होता रहा। ईश्वरीय प्रेरणा से वर्ष 2017 से मेरा मन पुराणों के अध्ययन में लगने लगा। श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, लवकुश चरित, विष्णु पुराण, शिव पुराण, वराह पुराण, देवी पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण इत्यादि कई धार्मिक ग्रंथो के अध्ययन से लेखन के प्रति मेरी रुचि जागृत हो गई।
प्रश्न : इसका मतलब आप हिंदूवादी धार्मिक विचारधारा के हैं?
संदीप : निश्चित तौर पर। मेरा जन्म सरस्वती पूजा बसंत पंचमी की रात्रि का है़। लेकिन यह कहना गलत होगा कि मैं हिंदूवादी हूँ। मैं सभी धर्मों का समान रुप से सम्मान करता हूँ। मेरी हाई स्कूल की शिक्षा सेंट मेरीज मिशनरी स्कूल से हुई है़। मेरा मानना है़ कि जो अनुशासन आप मिशनरीज में सीख सकते हैं वो और कहीं संभव नहीं है़।
साथ ही मैं यह भी जोड़ता हूँ कि हिंदू धर्म का जितना नुकसान हमारे धर्मगुरुओं व मठाधीशों ने किया है़, उतना किसी दूसरे ने नहीं किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 122 प्रमुख भाषाएँ हैं एवं 1599 अन्य बोलियाँ हैं। वहीं विश्व के 195 देशों में लगभग 7,117 भाषाएँ बोली जाती हैं। बीबीसी न्यूज के एक आर्टिकल के अनुसार भारत में लगभग 3,000 जातियाँ एवं 25,000 उपजातियाँ हैं। हर जाति के अपने नियम, अपनी धार्मिक परम्पराएं, अपने देवी देवता, अपने रीति रिवाज, अपनी मान्यताएँ और अपनी धार्मिक पुस्तक है़। भारत में प्रचलित ये धार्मिक पुस्तकें या तो उस धर्म को मानने वाले लोगों की अपनी निजी भाषा में उपलब्ध है, या बहुत हुआ तो हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और ओड़िया में प्रकाशित हुई है। अपने देश में एकमात्र "श्रीमद्भागवत गीता" ही ऐसा लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ है, जिसका अनुवाद लगभग 75 भाषाओं में हो पाया है। किंतु
चर्च ने अपने धार्मिक ग्रंथ "पवित्र बाइबिल" का अनुवाद विश्व की लगभग हर भाषा में करवाया। पूर्ण बाइबिल का अनुवाद विश्व की लगभग 704 भाषाओं में हो चुका है। वहीं इसके पदों एवं कुछ अंशो को 3,415 भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है। उसपर भी सबसे मुख्य बात कि यदि किसी को बाइबिल पढ़नी हो तो निःशुल्क उपलब्ध हो जाएगी। जबकि करोड़ रुपए खर्च कर आयोजित किए गए हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों में भी आपको श्रीमद्भागवत गीता या श्रीरामचरितमानस निःशुल्क नहीं मिलेगी।
प्रश्न : आपकी विचारधारा क्या है़?
संदीप : स्वभावतः कहा जाए तो मैं लोहिया के विचारों से प्रभावित रहा हूँ। मैं स्वयं को समाजवादी मानता हूँ। किंतु वो समाजवाद जिसकी नींव श्रीराम ने रखी, शबरी के हाथों जूठे बेर खाए। वो समाजवाद जिसके प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन रहे, जिन्होंने एक ईंट एक रुपया का सिद्धांत दिया। वो समाजवाद जिसके पैरोकार डॉ. राममनोहर लोहिया रहे। ना कि काशीराम, मायावती या आज की राजनीति वाला समाजवाद।
प्रश्न : साहित्यिक आयोजनों में आपकी उपस्थिति ना के बराबर रहती है़ ?
संदीप : ऐसा नहीं है़! मैं सामाजिक व्यक्ति हूँ, कई सामाजिक संगठनों में दायित्व पर हूँ। व्यवसाय व समाज के कार्यक्रमों के कारण व्यस्तता रहती है़। यदि किसी साहित्यिक कार्यक्रम में निजी तौर पर बुलावा रहता है़, तो अवश्य भाग लेता हूँ। हाँ यह बात सही है़ कि मैं बिना समुचित निमंत्रण किसी कार्यक्रम में नहीं जाता।
प्रश्न : आपने अधिकांश कविताओं में सरल और सहज शब्दों का प्रयोग किया है। क्यों ?
संदीप : भारीभरकम शब्द लिखने वाला ही साहित्यकार है़, यह सोचना गलत है़। आप गौर कीजिए कि बाबा नागार्जुन से लेकर कुमार विश्वास तक सरल एवं तुरंत समझ में आने वाले शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। मेरा पाठक किसी विभूति के विषय में यदि एक बार पढ़ ले, तो वह उस पर खुलकर चर्चा कर सके। इसीलिए मैंने असाधारण व्यक्तित्वों की जीवनियों को साधारण शब्दों में लिखा है़।
प्रश्न : क्या आपको लगता है़ कि साहित्य की इस विशाल दुनिया में आपकी पुस्तकें स्थान बना पाएँगी?
संदीप : क्यूँ बनाना है़ स्थान ! मैं अपनी पुस्तकों को संग्रहालय या पुस्तकालय का हिस्सा बनाने में इच्छुक नहीं।मेरी पुस्तकें तो शब्द रूपी "तर्पण" है समाज की उन विभूतियों का जिनके बहुमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा और "दर्पण" है वैसे जुझारु युवाओं के लिए जो लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि यूपीएससी की तैयारी करने वाला छात्र मेरी पुस्तक ढूंढकर पढ़े। मैं चाहता हूँ कि कॉलेज में आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिताओं में छात्र छात्राएँ मेरी पुस्तक से विषय उठाएँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी पुस्तक सामयिक पत्रकारिता में काम आए।
प्रश्न : साहित्य के क्षेत्र में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं ?
संदीप : साहित्य का क्षेत्र खेल के मैदान में आयोजित दौड़ प्रतियोगिता तो है़ नहीं कि मैं किस स्थान पर आया। यह एक खूबसूरत बगीचा है़, जिसमें कहीं कहीं रिक्त भूमि खोजकर मैं भी दो चार पौधे लगाना चाहता हूँ। मेरे द्वारा लिखी पुस्तकों को संदर्भ ग्रंथ मानकर शोधार्थी पीएचडी करेंगे, ये मेरे लिए गर्व की बात है़। मेरी पुस्तकों में अंकित संघर्ष गाथाओं से प्रभावित होकर जिस दिन कोई युवा पद्म सम्मान प्राप्त करने राष्ट्रपति भवन की ड्योढ़ी तक जा पहुँचेगा, मैं समझूंगा मुझे समुचित पारिश्रमिक प्राप्त हुआ।
प्रश्न : अपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?
संदीप : काव्य संग्रह आँख खोलती सुबह में प्रकाशित कविता 'दियासलाई', वर्ष 1993 में प्रकाशित इस पुस्तक के संपादक थे स्व. शैलेश पांडेय एवं कथाकार राकेश मिश्र।
प्रश्न : इन दिनों क्या लिख रहे हैं ?
संदीप : पुस्तक शिखर को छूते ट्राइबल्स के चौथे भाग पर कार्य जारी है़। साथ ही उसके भाग 1 एवं 3 के अंग्रेजी अनुवाद की भी तैयारी चल रही है़।
प्रश्न : आपकी पुस्तकों के संबंध में कोई विशेष बात, जो आप पाठकों तक पहुंचाना चाहें?
संदीप : पूरे देश में एकरूपता लाने हेतु केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण कर दिया गया है़। मैं प्रयासरत हूँ कि मेरा लेखन आईएस 16500 : 2012 के अनुसार हो। शिखर को छूते ट्राइबल्स भाग 3 एवं पद्म अलंकृत विभूतियाँ (मारवाड़ी/अग्रवाल) उसी पैटर्न पर लिखी गई हैं।
प्रश्न : आजकल पुस्तकों के पाठक कम होते जा रहे हैं, ऐसे में आपके मन में कभी यह नही आता कि क्यों लिखा जाए ?
संदीप : कम होते जा रहे हैं या बढ़ते जा रहे हैं? कल तक पूर्वोत्तर में कोई हिंदी बोलना नहीं चाहता था, आज वहाँ हिंदी पाँव पसार चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक हिंदी विश्व में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है़। ऐसे में सवाल उठता है़ कि इन हिंदीभाषियों तक अपनी पुस्तक कैसे पंहुचायी जाए। और इस प्रश्न का एक ही जवाब है़ कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो लीक से अलग हट कर हो।
प्रश्न : नवोदित साहित्यकारों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?
संदीप : दो बात। पहला अध्ययन अवश्य करें, क्योंकि बिना पढ़े अच्छा लिखना संभव नहीं। दूसरा प्रतिदिन लिखें, चाहे एक ही वाक्य लिखें, पर अवश्य लिखें। लिखने की आदत नित्यकर्म जैसी होनी चाहिए, आदत छूटी, लिखना छूटा समझो।
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