Sunday, 19 April 2026

झारखंड : महाभारत की जीवित स्मृतियाँ

*झारखंड : महाभारत की जीवित स्मृतियाँ*

झारखंड को केवल खनिज संपदा और प्राकृतिक वनों की धरती के रूप में जाना जाता है, किंतु इसकी सांस्कृतिक परतें इससे कहीं अधिक गहरी हैं. महाभारत की कथाओं और लोकविश्वासों के आधार पर पांडवों का इस भूभाग में दो बार आगमन हुआ. पहली बार, जब वे लाक्षागृह से बचकर गुप्त रूप से छुपते-छुपाते आए और झारखंड होते हुए एकचक्र नगरी, अर्थात वर्तमान आरा (बिहार) पहुँचे, जहाँ से वे पांचाल देश की राजधानी काम्पिल्य (वर्तमान फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश) की ओर अग्रसर हुए. इस यात्रा में माता कुंती उनके साथ थीं। इसी यात्रा के दौरान भीम का विवाह हिडिंबा के साथ हुआ.

दूसरी बार वे तेरह वर्षीय वनवास के दौरान पुनः झारखंड पहुँचे. इस बार द्रौपदी उनके साथ थीं. वनवास काल में जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के अपहरण का प्रसंग और घटोत्कच की सहायता इस क्षेत्र की लोककथाओं में आज भी जीवित है.

ये दोनों कथाएँ सर्वविदित हैं, किंतु महाभारत के मूल ग्रंथ में वन-यात्रा का सटीक भूगोल स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं मिलता. तथापि लोक परंपरा मार्ग की संभावित रेखा को प्रतिलक्षित करती है. स्कन्दपुराण एवं अन्य ग्रंथों में कड़ियों को जोड़ने पर मार्ग की रूपरेखा क्रमशः स्पष्ट होती प्रतीत होती है.

पौराणिक काल में राम का वनवास हो या पांडवों की वनयात्रा — ये प्रायः नदियों के किनारों पर संपन्न हुईं. इसके पीछे अनेक कारण थे. प्राचीन समय में यात्रा के दौरान पेयजल, भोजन और नित्यक्रिया के लिए जल स्रोतों के समीप रहना आवश्यक था. नदियाँ प्राकृतिक दिशासूचक का कार्य करती थीं, जिससे यात्रा अपेक्षाकृत सरल हो जाती थी. नदी तटों पर ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम स्थित थे, जहाँ पांडव विश्राम करते और संतों से सत्संग तथा आशीर्वाद प्राप्त करते थे.

वनवास यात्रा के दौरान पांडवों ने अनेक छोटी नदियाँ पार कीं तथा बड़ी नदियों के तटों के सहारे आगे बढ़ते रहे. उन्होंने मुख्यतः जंगलों, पर्वतीय क्षेत्रों और उपजाऊ मैदानों के मार्ग से यात्रा की. कुछ ऐसे स्थल भी रहे जहाँ नदियों का अभाव था. वहाँ विशेषकर घने जंगलों में झरनों, जलप्रपातों, छोटे सरोवरों, झीलों और प्राकृतिक जलधाराओं के सहारे यात्रा सुगम होती गई. जहाँ-जहाँ ऋषि-मुनियों के आश्रम थे, वहाँ उनके द्वारा निर्मित कुंड विद्यमान थे. अनेक स्थानों पर पांडवों द्वारा भी कुंड निर्माण के प्रमाण स्थानीय जनश्रुतियों में मिलते हैं. ऐसे जल स्रोतों के सहारे वे आगे बढ़ते रहे.

*लाक्षागृह (वर्तमान बागपत, उत्तर प्रदेश) से झारखंड की ओर*

लाक्षागृह की घटना के बाद पांडव दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर बढ़े. चित्रकूट से होते हुए वे सोनभद्र, रेनूकूट और दुद्धी तक पहुँचे. दुद्धी उत्तर प्रदेश का अंतिम बड़ा पड़ाव माना जाता है, जहाँ से उन्होंने कनहर नदी पार कर वर्तमान झारखंड की सीमा में प्रवेश किया.

*भीम चूल्हा, पलामू : मौन साक्षी*

कनहर नदी पार करने के बाद पांडव वर्तमान पलामू जिले के मोहम्मदगंज क्षेत्र में पहुँचे. यहाँ स्थित “भीम चूल्हा” पांडवों की उपस्थिति का प्रतीक एवं पर्यटकों के मध्य आकर्षण का केंद्र है.

दुद्धी से मोहम्मदगंज की दूरी लगभग 60–70 कि.मी. है, जो पैदल वनयात्रा के लिए एक स्वाभाविक पड़ाव हो सकता है. यह क्षेत्र कोयल नदी के तट पर स्थित है, जहाँ पांडवों की वनयात्रा से संबंधित अनेक जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं. मोहम्मदगंज का प्राचीन नाम स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, किंतु यह स्थान 'झारखंड पांडव पथ' का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है.

*कौलेश्वरी पर्वत : पांडवों की पूजा-स्थली*

जिला चतरा के हंटरगंज प्रखंड में अवस्थित कौलेश्वरी पर्वत को स्थानीय जनश्रुतियों में पांडवों की पूजा-स्थली के रूप में स्मरण किया जाता है.

उस काल में वर्तमान पलामू, गढ़वा, लातेहार और चतरा का क्षेत्र घने वनों से आच्छादित तथा आदिवासी-बहुल था. इन वनों में ऋषियों की पर्याप्त उपस्थिति और अनेक तपोवन स्थित थे. इन जिलों के मध्य उत्तर कोयल, कनहर, औरंगा, अमानत, हिरनी तथा माथन जैसी नदियों का जाल विस्तृत है, जो प्राचीन वनमार्गों की प्राकृतिक दिशा निर्धारित करते रहे होंगे. भूगोल-आधारित शोध संकेत करते हैं कि पांडवों की यात्रा सोन नदी तटवर्ती क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए कनहर नदी पार कर गढ़वा अंचल में पहुँची होगी. इसके पश्चात वे उत्तर कोयल नदी के तटों के सहारे लातेहार और पलामू के घने वनों से गुज़रे होंगे. तत्पश्चात चतरा जिले में प्रवेश कर हिरनी और माथन जैसी स्थानीय नदियों को पार करते हुए कौलेश्वरी धाम पहुँचे होंगे. कौलेश्वरी धाम आज भी पांडवों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ माना जाता है.

चतरा के हंटरगंज प्रखंड स्थित कौलेश्वरी पहाड़ की झारखंड में एक विशिष्ट पहचान है. यहाँ पहुँचने के लिए हंटरगंज से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी तय कर पर्वत की तलहटी तक पहुँचना पड़ता है. इसके बाद लगभग 1,575 फीट की ऊँचाई पैदल चढ़कर पर्वत शिखर पर स्थित माँ कौलेश्वरी मंदिर तक पहुँचा जा सकता है.

आज भी इस मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि देवी कुंती अपने पाँच पुत्रों के साथ यहाँ आई थीं और माँ कौलेश्वरी का पूजन किया था.

*धार्मिक संगम का अद्वितीय स्थल*

कौलेश्वरी पर्वत को हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों के संगम-स्थल के रूप में भी देखा जाता है. बौद्ध परंपरा में यह स्थल भगवान बुद्ध की तपोभूमि से संबंधित माना जाता है तथा मोक्ष-प्राप्ति के पवित्र स्थान के रूप में प्रतिष्ठित है. यहाँ स्थित “मड़वा मड़ई” नामक स्थल पर कुछ बौद्ध अनुयायी प्रतीकात्मक रूप से बाल और नाखून अर्पित करते हैं तथा जीवित अवस्था में ही अंतिम संस्कार-सदृश अनुष्ठान संपन्न करते हैं.

जैन परंपरा के अनुसार, कौलेश्वरी पहाड़ दसवें तीर्थंकर स्वामी शीतलनाथ की तपोभूमि माना जाता है. जैन धर्मावलंबियों ने पर्वत की चोटी पर एक मंदिर का निर्माण भी कराया है, जहाँ भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं.

*गिरिडीह के झारखंडधाम में है अर्जुन द्वारा स्थापित शिवलिंग*

कौलेश्वरी पर्वत से दक्षिण-पूर्व दिशा में बढ़ते हुए पांडवों ने संभवतः बराकर नदी तंत्र का अनुसरण किया होगा. इन नदी-मार्गों के सहारे गिरिडीह अंचल में प्रवेश कर वे अरण्यांचलों—बगोदर, कुंदर, बेंगाबाद और देवरी प्रखंड के वनवासी क्षेत्रों से गुजरते हुए वेबरियाडीह गाँव स्थित झारखंड धाम पहुँचे.
यह स्थल अपनी विशिष्ट पौराणिक महत्ता के लिए जाना जाता है. स्थानीय मान्यता है कि यहाँ स्थित दो शिवलिंगों में से एक की स्थापना भगवान श्रीराम द्वारा तथा दूसरे की अर्जुन द्वारा की गई थी. यह विश्वास किया जाता है कि वनयात्रा के कठिन दिनों में पांडवों ने इस स्थल पर विश्राम किया और शिव आराधना की.

इस यात्रा के दौरान उन्होंने उसरी नदी के तटवर्ती क्षेत्र में भी समय बिताया होगा. कौलेश्वरी से झारखंड धाम तक की यह यात्रा वर्तमान मानचित्र के अनुसार लगभग 95–110 किलोमीटर की है, जो प्राचीन वनपथों, नदी तटों और पर्वतीय अंचलों से होकर गुजरी होगी. उस समय मार्ग प्राकृतिक भू-आकृति के अनुरूप निर्धारित होते थे, अतः वास्तविक पैदल दूरी आधुनिक सड़क दूरी से अधिक या कम दोनों हो सकती है.


*दुमका में है पांडेश्वरनाथ पहाड़ और मंदिर*

झारखंड धाम से दक्षिण-पूर्व दिशा में बढ़ता संभावित वनमार्ग उसरी, बराकर और मयूराक्षी नदी तंत्र के सहारे विकसित होता प्रतीत होता है. जलस्रोतों के समानांतर चलना प्राचीन यात्राओं का स्वाभाविक नियम था. नदियाँ दिशा भी देती थीं और जीवन भी. इन्हीं नदी-तटों, वनों और पहाड़ी ढालों के सहारे एक ऐसी पूर्वी धुरी उभरती है, जो आगे चलकर शिव-आराधना के प्रमुख केंद्रों से जुड़ती दिखाई देती है.

सबसे पहले यह मार्ग पहुँचता है देवघर, जहाँ बाबा बैद्यनाथ धाम केवल झारखंड ही नहीं, समूचे भारतवर्ष में श्रद्धा का केंद्र है. भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित यह तीर्थ प्राचीन काल से साधकों, संतों और यात्रियों को आकर्षित करता रहा है. महाभारत में पांडवों के यहाँ आगमन का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, किंतु वनमार्ग और शिव-उपासना की परंपरा को देखते हुए यह मानना असंगत नहीं कि इस क्षेत्र से गुजरते समय उन्होंने इस पवित्र धाम के दर्शन किए हों. लाक्षागृह की घटना के पश्चात वे अपनी पहचान छिपाए हुए थे. ऐसे में संभव है कि उन्होंने छोटे समूहों में, दो-दो करके बाबाधाम में ज्योतिर्लिंग पर जलार्पण किया होगा और शक्तिपीठ माता पार्वती का दर्शन किया होगा. पांडव उस वन-यात्रा पर थे, जहाँ पहचान छुपाना और धर्म निभाना, दोनों ही एक साथ अनिवार्य थे. माता कुंती की दृष्टि से वनों में स्थित किसी भी देवी-देवता का मंदिर ओझल नहीं हो पाता था, क्योंकि मार्ग जितना कठिन था, आस्था उतनी ही दृढ़.

देवघर से पूर्व दिशा में बढ़ते हुए मार्ग पहुँचता है बासुकीनाथ मंदिर. स्थानीय मान्यता है कि देवघर में जल अर्पित करने के पश्चात बासुकीनाथ में पूजा किए बिना तीर्थ अधूरा रहता है. यह परंपरा संकेत करती है कि यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राचीन काल से शिव-धुरी के रूप में विकसित रहा होगा.

फिर यह मार्ग आगे बढ़ता है दुमका अंचल में पांडेश्वरनाथ मंदिर की ओर, जो बासुकीनाथ से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर प्रकृति की शांत छाया में अवस्थित है. ‘पांडेश्वरनाथ’ नाम ही दर्शाता है—पांडवों द्वारा प्रतिष्ठित, मंदिर परिसर में स्थित शिवलिंग को स्थानीय परंपरा पांडव-स्थापित मानती है. पांडवों के नाम से जुड़े पाँच तालाबों और पहाड़ के पश्चिमी छोर पर स्थित प्राचीन गुफा को आज भी श्रद्धा से देखा जाता है. पांडेश्वरनाथ मंदिर के गर्भगृह एवं प्रांगण में स्थित प्राचीन काल के भग्नावशेषो, प्रतिमाओं
और प्रस्तर कलाकृतियाँ पर्यटकों को आकर्षित करती हैं.
लोकस्मृति इस पर्वत को पांडवों के विश्राम और आराधना-स्थल के रूप में जीवित रखे हुए है.

इस प्रकार झारखंड धाम से लेकर देवघर, बासुकीनाथ और पांडेश्वरनाथ तक एक पूर्वी शिव-धुरी निर्मित होती है, जो नदियों के सहारे, वनों के बीच और लोकविश्वास की स्मृतियों में आज भी प्रवाहित है. वर्तमान मानचित्र के अनुसार झारखंड धाम से देवघर होते हुए पांडेश्वरनाथ तक की कुल दूरी लगभग 145–160 किलोमीटर बैठती है.


*निरसा के समीप पांड्रा गाँव में स्थित है कपिलेश्वर मंदिर*

दुमका अंचल के पांडेश्वरनाथ पर्वत से आगे बढ़ती पांडवों की संभावित पदयात्रा मानो जलधाराओं के साथ-साथ चलती हुई पश्चिम की ओर मुड़ती है. यह वह भूभाग है जहाँ पहाड़ियाँ धीरे-धीरे समतल मैदानों को स्थान देती हैं और नदियाँ दिशा का संकेत बन जाती हैं.

दुमका क्षेत्र की जीवनरेखा रही मयूराक्षी नदी के तटों से आगे बढ़ता वनमार्ग संभवतः दक्षिण-पश्चिम की ओर झुकता है.
आगे बढ़ते हुए यह जल-तंत्र बराकर नदी से जुड़ता है, जो निरसा अंचल के निकट बहती है. बराकर आगे चलकर दामोदर नदी में मिलती है. वही दामोदर, जिसने कोयलांचल धनबाद की धरती को आकार दिया. इस प्रकार दुमका से धनबाद की ओर बढ़ती यह यात्रा जलधाराओं के सहारे स्वाभाविक रूप से विकसित होती प्रतीत होती है.
इसी नदी-आधारित धुरी पर निरसा के समीप पांड्रा गाँव में स्थित है कपिलेश्वर मंदिर.

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर परिसर में स्थापित पाँच शिवलिंगों को पाँचों पांडवों से जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि युधिष्ठिर ने बाबा कपिलेश्वर, भीम ने बाबा बनेश्वर, अर्जुन ने भुवनेश्वर, नकुल ने तारकेश्वर तथा सहदेव ने बाबा मनकेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी. साथ ही यह भी माना जाता है कि माता कुंती ने यहाँ माँ पार्वती की प्रतिष्ठा की.

लोकविश्वास यह भी कहता है कि माता कुंती ने यहाँ जिस चूल्हे पर भोजन बनाया था, वह आज भी विद्यमान है, और उसी स्मृति में महाभोग तैयार किया जाता है. कुछ लोग इसे ‘द्रौपदी का चूल्हा’ भी कहते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि संभवतः पांडवों का यहाँ दो बार आगमन हुआ — पहली बार लाक्षागृह की घटना के पश्चात माता कुंती के साथ और दूसरी बार वनवास के दौरान द्रौपदी के साथ.

मान्यता यह भी है कि इस गाँव का नामकरण प्राचीनकाल में पांडवों के नाम पर हुआ था. लोकपरंपरा के अनुसार इसका प्रारंभिक नाम ‘पांडु-रा’ रहा होगा, जिसका आशय पांडवों के प्रवास से जुड़ा माना जाता है. कालांतर में भाषा और उच्चारण के परिवर्तन के साथ यह नाम परिवर्तित होकर ‘पांडरा’ या ‘पांड्रा’ हो गया, यह भाषाई व्याख्या लोकपरंपरा पर आधारित है. दुमका से निरसा की वर्तमान दूरी लगभग 110–120 किलोमीटर है.


*चंदनकियारी में भैरव धाम (पांडव स्थान) एवं जलकुंड*

पांड्रा (निरसा) से दक्षिण दिशा में दामोदर नदी तंत्र का अनुसरण करते हुए पांडवों की संभावित यात्रा चंदनकियारी की ओर बढ़ी. बराकर नदी से दामोदर तंत्र में प्रवेश कर यह मार्ग लगभग 40–50 किलोमीटर की पैदल दूरी में वन, जलधाराओं और नदी-तटों के सहारे विकसित होता प्रतीत होता है.

चंदनकियारी प्रखंड मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर उत्तर तथा भोजूडीह रेलवे स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण, इजरी नदी के तट पर पोलकिटी गाँव में स्थित ‘भैरव धाम’ स्थानीय आस्था का केंद्र है. स्थानीय जनमानस इसे प्रेमपूर्वक ‘पांडव स्थान’ भी कहता है. जनश्रुति है कि महाभारतकाल में पांडव यहाँ ठहरे थे. कहा जाता है कि जलसंकट के समय अर्जुन ने अपने बाण से धरती पर प्रहार किया और उसी स्थान से एक पवित्र कुंड का उद्भव हुआ.
स्थानीय विश्वास के अनुसार उस कुंड का जल शीतल तथा औषधीय गुणों से युक्त है. श्रद्धालु इसे पवित्र मानते हैं और आज भी अनेक लोग स्वास्थ्य-लाभ की कामना से इसका सेवन करते हैं. इस कुंड के बीच में पत्थर के दो चक्रकार गोले है जिनके विषय में यह किंवदंती है कि शिवरात्रि के अवसर पर ये घूमते है.

*राजनगर में भीमखांदा : श्री श्री पांडेश्वर महादेव*

चंदनकियारी से आगे बढ़ती पांडवों की यात्रा राँची के नगड़ी अंचल की ओर मुड़ती है, जहाँ स्वर्णरेखा नदी के उद्गम स्थल रानीचुआँ की कथाएं प्रसिद्ध है. वहाँ से यह वनमार्ग स्वर्णरेखा नदी तंत्र के सहारे क्रमशः आगे बढ़ते हुए सरायकेला-खरसावाँ क्षेत्र में प्रवेश करता है.

इन्हीं जलधाराओं के बीच राजनगर प्रखंड में बोंबोगा (बंगबंगा) नदी के तट पर स्थित है भीमखंदा, जिसे स्थानीय लोकस्मृति पांडव-प्रवास से जोड़ती है. जनश्रुतियों के अनुसार पांडवों ने यहाँ रात्रि विश्राम किया था. बोंबोगा नदी के किनारे एक समतल शिला पर अंकित दो छिद्रों वाली आकृति को ‘पांडवों की रसोई’ कहा जाता है. संताली परंपरा में इसे ‘मोंगरीछांदा’ नाम से जाना जाता है. कुछ कथाएँ इस स्थल को माता कुंती से जोड़ती हैं, तो कुछ द्रौपदी के वनवास-कालीन प्रसंगों से.

स्थानीय विश्वास के अनुसार समीप स्थित कुछ शिलाओं को द्रौपदी के ‘बाल सुखाने का आसन’ के रूप में देखा जाता है. एक विशाल प्रस्तर-खंड पर उकेरे गए पदचिह्नों को ग्रामीण भीम के पाँव का चिह्न मानते हैं, जबकि निकट ही एक पेड़ को अर्जुन के तीर से जोड़ा जाता है. वहीं एक शिवलिंग ‘पांडेश्वर महादेव’ के रूप में पूजित है, जिसे लोकपरंपरा भीम द्वारा स्थापित मानती है.

*महादेवशाल : बाबा श्याम की जन्मस्थली*

राजनगर के भीमखंदा में एक रात्रि विश्राम के उपरांत पांडवों की वनयात्रा दक्षिण-पश्चिम दिशा में खूँटी के कर्रा क्षेत्र की ओर अग्रसर हुई. यहाँ से मार्ग क्रमशः शंख और दक्षिण कोयल नदी तंत्र के निकट पहुँचता है. जिनके मध्य पश्चिमी सिंहभूम जिले का गोइलकेरा क्षेत्र स्थित है, जहाँ सारंडा का विराट साल वन आज भी प्रकृति की मौन सत्ता का परिचायक है. इसी अंचल में अवस्थित है महादेवशाल — एक ऐसा स्थल, जिसे स्थानीय परंपरा ‘हिडिंब वन’ से जोड़ती है.

लाक्षागृह से बच निकलने के पश्चात भीम का विवाह इसी वनप्रदेश में हिडिंबा से हुआ. आगे चलकर इसी वनभूमि में घटोत्कच का जन्म हुआ, वह महायोद्धा, जिसने महाभारत युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई.

इन्हीं घटोत्कच और उनकी पत्नी मोरवी के पुत्र के रूप में जन्मे बर्बरीक, जिन्हें आज बाबा श्याम के नाम से पूजा जाता है, लोकभक्ति की परंपरा में वीरता और त्याग के प्रतीक माने जाते हैं. इस प्रकार वन की यह कथा केवल पांडवों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे चलकर भक्तिभाव की धारा में परिवर्तित हो जाती है.

झारखंड की धरती ऐसे अनेक पौराणिक स्थलों की स्मृतियों को संजोए हुए है. लोहरदगा का आंजनेयधाम, जहाँ भगवान हनुमान का जन्मस्थान माना जाता है; गुमला का टांगीनाथ, जहाँ भगवान परशुराम के फरसे से जुड़ी मान्यता प्रचलित है; तथा दुमका का देवाकीधाम, जहाँ यह विश्वास किया जाता है कि भगवान कृष्ण ने शंखनाद कर महाभारत युद्ध की समाप्ति की घोषणा की थी.

यद्यपि महाभारत के मूल ग्रंथ में इन घटनाओं का सटीक भौगोलिक निर्धारण स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, तथापि लोकमान्यताएँ इस समूचे अंचल को विशिष्ट सांस्कृतिक गहराई प्रदान करती हैं. यहाँ इतिहास शिलालेखों से कम और स्मृतियों से अधिक जीवित है.

संदीप मुरारका
झारखंड की धरती पर बिखरे महाभारत और रामायण के पदचिह्नों के अनवरत अन्वेषक एवं संवेदनशील दस्तावेजकर्ता

Saturday, 18 April 2026

महाभारत की NextGen स्त्री : हिडिंबा

महाभारत की NextGen स्त्री : हिडिंबा

आठ मार्च की सुबह थी. मैं चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अख़बार के पन्ने पलट रहा था. आज के समाचार पत्र में चार पृष्ठों का एक विशेष परिशिष्ट ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेषांक’ संलग्न था.

तभी मेरी छोटी बेटी अक्षिता, जो इन दिनों दसवीं की परीक्षा दे रही है, अपनी दादी के पास आकर बैठ गई. उसने अखबार की ओर इशारा करते हुए पूछा — दादी, आज की युवतियाँ संघर्ष की मिसाल कही जाती हैं. उनका जीवन अनुभव प्रेरणाओं से भरा होता है. क्या आपके रामायण या महाभारत में भी कोई ऐसी स्त्री थी जिसने अपना जीवन स्वयं चुना हो? जो केवल किसी की पत्नी या माँ बनकर न रह गई हो? जिसने अपने मूल्य अगली पीढ़ी को सौंपे हों, जिनका संघर्ष सीख देता हो?

मेरी माँ मुस्कराईं. वे समझ गईं कि उनकी पोती तुलनात्मक भाव में है. यदि वे मौन रहीं तो अक्षिता यही मानेगी कि स्त्री-चेतना का विकास पिछले चार-पाँच दशकों में ही हुआ है, मानो “NextGen स्त्री” का जन्म आधुनिक पाठ्यपुस्तकों के साथ हुआ हो.

उनकी आँखों में वर्षों की स्मृतियाँ तैर गईं. वे गंभीर स्वर में बोलीं — हाँ! हर काल में ऐसी स्त्रियाँ रही हैं, जो व्यक्ति से ऊपर उठकर चेतना बन जाती हैं. वे अपने समय से आगे की दिशा तय करती हैं.

जैसे? अक्षिता ने तुरंत पूछा

दादी ने कहा — रामायण में राम की माता कैकेयी हों, लवकुश की माता सीता हो… और महाभारत में जनजातीय चेतना की प्रतीक हिडिंबा.

अक्षिता थोड़ा मुस्कराई — राम की माँ कैकेयी और लव-कुश की माता सीता, इस अनूठे परिचय पर फिर कभी बात करुँगी, क्योंकि इनके बारे में तो थोड़ा-बहुत जानती हूँ. पर यह हिडिंबा कौन थीं? और आप उन्हें स्त्री-आत्मनिर्णय और स्वायत्तता की प्रतीक कैसे कह सकती हैं?

कमरे का वातावरण गंभीर हो गया. मैंने भी अख़बार एक ओर रख दिया. सविता भी अपनी चाय लेकर आ गई और वहीं बैठ गई. लगता था आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की गोष्ठी हमारे घर पर ही होने वाली है.

दादी ने धीमे स्वर में कहा — हिडिंबा! जिसे वेदव्यास ने ‘असुर’ लिखा, और इतिहास ने उसे ‘राक्षसी’ पढ़ लिया.

कुछ क्षणों का मौन छा गया. दादी ने फिर कहा — अच्छा, गूगल पर देखो, झारखंड में कितनी जनजातियाँ अधिसूचित हैं?

अक्षिता ने दो मिनट का समय लिया और मोबाइल पर उँगलियाँ दौड़ाते हुए उत्तर दिया —बत्तीस.

और क्या उनमें ‘असुर’ नाम की भी कोई जनजाति है?
दादी ने फिर पूछा.

अक्षिता चौंकी — हाँ, दादी…है.

दादी की आँखों में चमक थी तो फिर सोचो, जिसे ग्रंथों ने ‘असुर’ कहा, क्या वह वास्तव में राक्षसी थी? या वह उस समाज की स्त्री थी जिसे मुख्यधारा ने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की?

दादी ने आगे कहना शुरू किया — असल में ‘असुर’ शब्द को समझे बिना हम हिडिंबा को समझ ही नहीं सकते. आज भी ‘असुर’ नाम की यह जनजाति झारखंड में अधिसूचित है. पलामू, लातेहार, गुमला और लोहरदगा में इनकी आबादी अधिक है. पश्चिमी सिंहभूम में भी इनकी उपस्थिति है. झींकपानी प्रखंड में ‘असुरा’ नाम का एक गाँव तक है.
अब सोचो, यदि ‘असुर’ एक वास्तविक जनजातीय समुदाय है, तो महाभारत में प्रयुक्त यह शब्द क्या केवल राक्षसी अर्थ में लिया जाना चाहिए? या यह किसी भिन्न सांस्कृतिक समुदाय का संकेत हो सकता है?

हम सभी ध्यान से सुन रहे थे.

दादी ने धीमे स्वर में कहा — संभव है कि वेदव्यास ने हिडिंबा का संदर्भ किसी वनवासी, जनजातीय समुदाय के रूप में दिया हो. पर बाद की व्याख्याओं ने ‘असुर’ को सीधे ‘राक्षस’ मान लिया. इतिहास कई बार शब्दों को सरल करना चाहता है, किंतु उसका अर्थ और जटिल हो जाता है.

वे थोड़ी देर रुकीं, फिर बोलीं — यह ठीक वैसा ही है जैसे पुराणों में ‘दक्षिण’ शब्द का उल्लेख आते ही कुछ इतिहासकार उसे वर्तमान दक्षिण भारत से जोड़ देते हैं, जबकि उस समय भौगोलिक अवधारणाएँ भिन्न थीं.

दादी ने धीमे स्वर में कहा — महाभारत के आदिपर्व के हिडिंबवध प्रसंग के पहले ही श्लोक में हिडिंब का उल्लेख आता है. जो वन में, शालवृक्ष के समीप निवास करता है.
अब यह सोचो कि सारंडा का जंगल आज भी घने साल वृक्षों से आच्छादित है. महादेवशाल भी कभी उसी वन-क्षेत्र का हिस्सा रहा होगा. शब्द, स्थल और स्मृतियाँ समय के साथ बदलती हैं, पर संकेत बचे रहते हैं.

कमरे में सन्नाटा था. अक्षिता ने धीरे से पूछा — तो दादी… क्या इसका मतलब हिडिंबा महादेवशाल की असुर जनजाति से रही होंगी? वे कोई राक्षसी नहीं थीं?

दादी मुस्कराईं — इतिहास में ‘मतलब’ इतनी जल्दी नहीं निकाले जाते, बेटी. हम इतना कह सकते हैं कि महाभारत का वर्णन एक वनवासी समुदाय की ओर संकेत करता है. ‘असुर’ शब्द आज भी एक जनजाति के रूप में जीवित है.
पर किसी कथा को किसी विशेष भूगोल से जोड़ना शोध का विषय है, निष्कर्ष का नहीं.

हिडिंबा को राक्षसी कहना जितना सरल है, उसे एक वनवासी स्त्री के रूप में समझना उतना ही गहरा.

अक्षिता अभी भी सोच में थीतो दादी… फिर हिडिंबा ने क्या किया ऐसा, जिससे आप उन्हें स्त्री-आत्मनिर्णय की प्रतीक मानती हैं?

माँ सीधी होकर बैठ गई, जैसे कोई पुरानी कथा को फिर से जीवित करने जा रही हो. उन्होंने कहना शुरू किया
जब पांडव वन में थे, तब हिडिंबा ने सबसे पहले भीम को देखा. उसने भीम को ‘चुना’. उसका स्वयंवर नहीं हुआ, उसके पिता ने उसका हाथ नहीं सौंपा. उसने स्वयं अपने मन की बात कही.

अक्षिता ने तुरंत पूछा — मतलब उसने प्रपोज किया?

दादी हँसीं — हाँ, अगर आज की भाषा में कहो तो वही.

उसने अपने भाई हिडिंब की आज्ञा के विरुद्ध जाकर भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा. यह केवल प्रेम नहीं था. यह सामाजिक संरचना के विरुद्ध खड़ा होना भी था.

मैंने देखा, अक्षिता की आँखों में जिज्ञासा चमक रही थी. और माँ की आँखों में दृढ़ विश्वास.

दादी आगे बोलीं — सोचो, एक जनजातीय स्त्री, जो अपनी भूमि की स्वामिनी है, अपने ही समुदाय की सत्ता के विरुद्ध जाकर एक क्षत्रिय राजकुमार को चुनती है. यह केवल अंतरजातीय विवाह नहीं था, यह सांस्कृतिक सीमाओं को पार करना था.

फिर क्या वह भीम के साथ हस्तिनापुर चली गई? अक्षिता ने पूछा.

दादी ने सिर हिलाया — नहीं! यही तो सबसे बड़ा निर्णय था. उसने विवाह किया, पर अपनी भूमि नहीं छोड़ी। वह अपने वन में रही, अपनी परंपराओं के साथ. उसने स्वयं को पति की पहचान में विलीन नहीं किया.

दादी ने फिर कहा — और जब भीम वनयात्रा में आगे बढ़ गया, तब हिडिंबा ने विलाप नहीं किया. उसने पुत्र घटोत्कच को जन्म दिया, उसे पाला, प्रशिक्षित किया. वह एक सिंगल मदर थी, जिसने अपने पुत्र को नायक बनाया.

अक्षिता अब गंभीर थी. उसने धीरे से कहा — यानी, वे किसी की छाया नहीं बनी?
दादी ने उत्तर दिया — बिल्कुल सही! वह स्वयं एक वृक्ष बनी, जिसकी छाया में अगली पीढ़ी खड़ी हुई.

अक्षिता ने पूछा — दादी… जब भीम चले गए, तब हिडिंबा ने क्या किया? क्या वह अकेली रह गई?

दादी ने कहा अकेली? नहीं! वह अकेली नहीं हुई, बल्कि वह संपूर्ण हुई.

उसने घटोत्कच को जन्म दिया. सोचो, एक स्त्री जिसने प्रेम भी स्वयं चुना और मातृत्व भी स्वयं जिया. न कोई राजमहल, न कोई साम्राज्य, न कोई पति का संरक्षण. वन उसका घर था और वही उसका संसार.

दादी ने आगे कहा — सिंगल मदर होना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं होता. यह जिम्मेदारी का वह संपूर्ण वृत है जिसमें माँ ही पिता है, गुरु है, संरक्षक है और दिशा-निर्धारक भी. हिडिंबा ने घटोत्कच को केवल पाला नहीं, उसे प्रशिक्षित किया. उसे अपनी जड़ों से जोड़े रखा. उसे यह नहीं सिखाया कि वह किसी राजवंश की छाया है, बल्कि यह सिखाया कि वह स्वयं अपनी शक्ति है.

मैंने देखा, अक्षिता की आँखें गंभीर हो गई थीं. दादी ने कहा — आज जब हम सिंगल मदर शब्द सुनते हैं, तो हमें आधुनिक समाज का संदर्भ दिखता है. पर हिडिंबा ने उस समय एकल मातृत्व जिया, जब स्त्री की पहचान प्रायः पति से जुड़ी मानी जाती थी.

उसने भीम के जाने को अपनी नियति का अंत नहीं बनने दिया. उसने अपने पुत्र को इतना सक्षम बनाया कि महाभारत के युद्ध में वही घटोत्कच पांडवों की सबसे बड़ी शक्ति बना.

अक्षिता ने कहा — मतलब, उसने अपने बेटे को सिर्फ बड़ा नहीं किया, उसे नायक बनाया.

दादी मुस्कराईं — हाँ! और यही सिंगल मदर की सबसे बड़ी पहचान है. वह अगली पीढ़ी को केवल जीवित नहीं रखती, उसे नेतृत्व के योग्य बनाती है.

हिडिंबा ने अपने पुत्र को पिता की अनुपस्थिति का बोझ नहीं दिया. उसने उसे अपनी जनजातीय वन चेतना, अपनी स्वतंत्रता और अपनी जड़ों का गर्व दिया.

कमरे में एक गहरा मौन था. फिर माँ ने जोरदार वाक्य कहा — और यही तो ‘NextGen स्त्री’ की पहचान है कि वह टूटती नहीं, वह निर्माण करती है.

अक्षिता अब पूरी तरह कहानी में डूब चुकी थी. और फिर दादी?” उसने पूछा.

दादी ने धीमे स्वर में कहा — हिडिंबा ने केवल घटोत्कच को नायक नहीं बनाया. उसके पुत्र घटोत्कच और पुत्रवधू मोरवी ने एक ऐसी संतान को जन्म दिया बर्बरीक, जिन्हें आज बाबा श्याम के रूप में पूजा जाता है. सोचो, यह केवल वंश की निरंतरता नहीं है. यह मूल्य, दीक्षा और शिक्षा की निरंतरता है.

दादी आगे बोलीं —हिडिंबा ने अपने पुत्र को जो आत्मबल, स्वतंत्रता और जड़ों से जुड़ाव दिया, वही चेतना आगे चलकर बर्बरीक के भीतर भी दिखाई देती है. वह योद्धा जिसने धर्म की अपनी व्याख्या की, जिसने शक्ति का अर्थ अलग ढंग से समझा. यह केवल रक्त-संबंध नहीं था, यह संस्कार-संबंध था.

यही तो पीढ़ियों का हस्तांतरण है. जब एक स्त्री अपने निर्णय से शुरू हुई चेतना को अगली पीढ़ियों तक पहुँचा देती है. और तब वह केवल माँ नहीं रहती, वह दिशा बन जाती है.

दादी ने कहा — यही थी भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाली दीक्षा और शिक्षा. हिडिंबा ने केवल एक पुत्र नहीं पाला, उसने एक परंपरा गढ़ी.

अक्षिता अब चुप थी. अब उसकी आँखों में प्रश्न नहीं, विचार थे. कुछ क्षण बाद उसने धीमे स्वर में कहा — तो दादी… ‘NextGen स्त्री’ कोई नई खोज नहीं है?

दादी मुस्कराईं. नहीं बेटी. नई केवल परिस्थितियाँ होती हैं, चेतना नहीं. हर युग में ऐसी स्त्रियाँ रही हैं जिन्होंने अपने समय की सीमाओं को लांघा है. फर्क सिर्फ इतना है कि आज हम उन्हें नए शब्दों में पुकारते हैं — ‘स्वायत्त’, ‘आत्मनिर्णयी’, ‘सिंगल मदर’, ‘इंटरकास्ट मैरिज’, ‘इंडिपेंडेंट वुमन’…इत्यादि. पर इन शब्दों से पहले भी वे थीं.

मैंने देखा, अक्षिता की आँखों में एक नई चमक थी. दादी ने आगे कहा —हिडिंबा कोई एक पात्र नहीं है. वह एक चेतना है. वह वह स्त्री है, जो प्रेम स्वयं चुनती है, जो विवाह के बाद अपनी पहचान नहीं खोती, जो अकेले मातृत्व निभाती है, जो अपने पुत्र को केवल बड़ा नहीं करती, उसे मूल्य देती है, दिशा देती है. वह अतीत की जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की दिशा निर्धारित करती है.

कमरे में सुबह की धूप अब और साफ होने लगी थी. अक्षिता ने मुस्कराकर कहा — तो दादी… असली ‘NextGen स्त्री’ वही है, जो हर पीढ़ी में अपनी शर्तों पर जीती है?

दादी ने सिर हिलाया — हाँ! और याद रखना, NextGen स्त्री कोई एक चेहरा नहीं होती, वह एक सतत विकसित होती चेतना है. वह अतीत को अस्वीकार नहीं करती, उससे शक्ति लेती है, वर्तमान में अपनी पहचान गढ़ती है और भविष्य की दिशा स्वयं निर्धारित करती है.

मैंने अख़बार के उस विशेषांक की ओर देखा और मन ही मन सोचा, शायद स्त्री-चेतना की कहानी उतनी नई नहीं, जितनी हम समझते हैं. कुछ कहानियाँ इतिहास में लिखी जाती हैं, कुछ पुनर्पाठ में जीवित होती हैं. और हिडिंबा, एक राक्षसी नहीं थी, वह महाभारत काल की एक ऐसी स्त्री थी,
जिसकी चेतना आज भी अगली पीढ़ियों को दिशा दे सकती है.

इतने में ही कॉलबेल बज उठी. सविता दरवाज़ा खोलने उठी और मैं भी अपने कमरे की ओर बढ़ गया. शायद तैयार होने के लिए, शायद इस सुबह को भीतर समेट लेने के लिए.
घर की वह छोटी-सी बातचीत अनायास ही एक गोष्ठी में बदल चुकी थी. कोई मंच नहीं था, कोई श्रोतागण नहीं,
पर विचारों का आदान-प्रदान उतना ही गंभीर था, जितना किसी सभागार में होता है.

अक्षिता अपनी किताबें समेट रही थी, पर उसके चेहरे पर अब केवल परीक्षा की चिंता नहीं थी, विचारों की चमक थी.

मैंने मन ही मन सोचा — शायद “NextGen स्त्री” पर होने वाली सबसे सशक्त गोष्ठियाँ अखबारों के पन्नों पर नहीं, घरों की बैठक में जन्म लेती हैं. आज की सुबह केवल महिला दिवस नहीं था, बल्कि वह पीढ़ियों के बीच चेतना का हस्तांतरण था.

संदीप मुरारका
लेखक 

Saturday, 15 November 2025

मारवाड़ी युवा मंच, जमशेदपुर शाखा द्वारा आयोजित परिचर्चा के दौरान 14 नवंबर, 2025 को युवा साथियों के साथ हुई संदीप मुरारका की बातचीत का अंश -

“समृद्ध और विकसित झारखंड का परिकल्पना: हमारे सपने और योगदान”*
यह कोई सरकारी परिचर्चा का शीर्षक नहीं,
बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है.

औपचारिकता करने के लिए मेरे पास भी
खनिज संपदा, भूमि संसाधन, मानव बल,
और राजनीतिक अस्थिरता जैसे
भारी-भरकम शब्दों का पूरा संग्रह था.
चाहता तो मैं भी लंबा चौड़ा, तकनीकी भाषण दे देता.

लेकिन—
इस विषय का मूल दो शब्द हैं:
सपने… और योगदान!

और इन्हीं दो शब्दों में
हम सबके लिए एक प्रश्न छिपा है—

“पिछले 25 वर्षों में हमारी भूमिका क्या रही?
हमने अपने झारखंड को समृद्ध बनाने के लिए अब तक क्या किया?”

*झारखंड — एक अनुपम धरोहर*

झारखंड कोई साधारण राज्य नहीं,
यह प्रकृति की गोद है, संस्कृति का आसन है,
और आध्यात्मिकता की जड़ें यहाँ की मिट्टी में घुली हैं.

यहीं बाबा धाम है — द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक,
यहीं शक्तिपीठ हैं,
यहीं पांडवों की यात्राओं के दर्जनों ऐतिहासिक स्थल हैं,
यहीं लोहरदगा में भगवान बजरंगबली की जन्मस्थली अंजनी धाम है,
यहीं पश्चिमी सिंहभूम में बाबा श्याम (बर्बरीक) की जन्मभूमि है,
यहीं गुमला में भगवान परशुराम का टांगीनाथ धाम है,

इतना ही नहीं —
झारखंड की हर नदी, हर पहाड़, हर कण-कण
इतिहास और पवित्रता से भरा हुआ है.

यह राज्य पर्यटन की असीम संभावनाओं से सराबोर है.

*मारवाड़ी समाज की ताक़त — और विकास का सूत्र*

सत्र में चर्चा के दौरान पता चला कि
अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के देशभर में लगभग 65,000 सदस्य हैं.
और यदि मारवाड़ी सम्मेलन, महिला मंच, अग्रवाल सम्मेलन आदि को जोड़ दें,
तो यह संख्या एक लाख से भी ऊपर पहुँच जाती है.

सोचिए…
यदि यही लोग अपने परिवारों और परिचितों को यह बताएँ—
कि झारखंड क्या है,
यहाँ क्या-क्या है,
और उन्हें जीवन में एक बार यहाँ जरूर आना चाहिए…

तो एक वर्ष में 1000 लोग भी यदि झारखंड पर्यटन के लिए आ जाते हैं,
तो यह उस राज्य के लिए वही होगा
जैसे भीषण आग पर
किसी चिड़िया के द्वारा गिराया गया पानी.
जो छोटा दिखता है…
पर दिशा बदल देता है.

यह अभियान हमारी शाखाओं से शुरू हो सकता है.
हर जिले की शाखा अपने पर्यटन स्थलों का सुंदर संकलन तैयार करे—

• स्थलों का इतिहास
• उसका धार्मिक -सांस्कृतिक महत्व
• वहाँ कैसे पहुँचना है
• नजदीकी रेल व विमान मार्ग
• और दर्शनीय स्थलों की तस्वीरें

यह पुस्तिका देशभर के हर मारवाड़ी परिवार तक पहुँचे.
और संदेश हो—

*“पधारो झारखंड
यहाँ सिर्फ सफर नहीं,
अनुभव आपका इंतज़ार कर रहा है.”*

*जमशेदपुर — पर्यटन का नया अध्याय*

कौन कहता है कि छुट्टियाँ सिर्फ गोवा-दिल्ली-मसूरी की हैं?
एक बार झारखंड को देखिए—

• डिमना झील में सुबह का सुकून
• दलमा पहाड़ में हिरण और हाथियों की झलक
• राजनगर का भीमखांदा — जहाँ भीम का चूल्हा है, द्रौपदी की स्मृतियाँ हैं
• घाटशिला का पंच पांडव पहाड़
• जादूगोड़ा का रंकिणी मंदिर
• पाथेर पांचाली के लेखक बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की स्मृतियाँ

और जमशेदपुर—
देश का सबसे साफ-सुथरा औद्योगिक शहर,
जहाँ पर्यटन और सुविधाएँ साथ-साथ मिलती हैं.

यहाँ ताज विवांता, रेडिसन, रामाडा जैसे होटल,
2500 से 10,000 रुपये की रेंज में बेहतरीन ठहराव प्रदान करते हैं.

और भोजन?
दक्षिण भारतीय स्वाद, बंजारा की राजस्थानी थाली,
और जमशेदपुर की शामें—
आपके छुट्टी के हर पल को यादगार बना देंगी.

*तो आज का असली प्रश्न यही है—*

सपने क्या हैं?
और उनमें हमारा व्यक्तिगत योगदान क्या होगा?

झारखंड को समृद्ध बनाना
सरकार का ही काम नहीं—
यह हमारा भी धर्म है,
हमारी ज़िम्मेदारी है,
और हमारी पहचान भी.

सपनों को पूरा करने वाले
कदम सरकारें नहीं उठाती—
उन्हें लोग उठाते हैं,
हम और आप उठाते हैं.

आज की यह चर्चा
झारखंड के लिए
हमारे सामूहिक सपनों का पहला अध्याय बने—
इसी कामना के साथ,

जोहार! धन्यवाद!!

Sunday, 12 October 2025

कुरु वंशावली में बर्बरीक

कुरु वंशावली में बर्बरीक
(महाभारत के अनुसार)

1. भरत
भरत चक्रवर्ती प्राचीन भारत के सम्राट थे, जिनके नाम पर इस भूभाग को भारतवर्ष कहा गया। भरत से कई पीढ़ियों के उपरांत कुरु का जन्म हुआ।

भरत → कई पीढ़ियाँ → कुरु


2. कुरु
कुरु वंश के संस्थापक, जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र की भूमि प्रसिद्ध हुई।


3. राजा प्रतीप
कुरु वंश के प्रतापी राजा, जिनके तीन पुत्र थे -

• देवापि - ज्येष्ठ पुत्र, जिन्होंने सन्यास ले लिया।

• बाल्हीक - दूसरे पुत्र, जो बाल्हिका राज्य (आधुनिक बल्ख, अफगानिस्तान क्षेत्र) के शासक बने।

• शांतनु - तृतीय पुत्र, जिन्होंने हस्तिनापुर का राजसिंहासन संभाला।


4. राजा शांतनु

प्रथम पत्नी गंगा से पुत्र :

• देवव्रत (भीष्म पितामह), जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया।

द्वितीय पत्नी सत्यवती से दो पुत्र :

• चित्रांगद - कम आयु में निधन

• विचित्रवीर्य – हस्तिनापुर के राजा बने, परंतु अल्पायु में निधन। इनकी दो पत्नियाँ थीं अंबिका और अंबालिका


5. विचित्रवीर्य के निधन के पश्चात् नियोग प्रथा से संतानोत्पत्ति

• अंबिका से पुत्र:  धृतराष्ट्र (जन्म से नेत्रहीन)

• अंबालिका से पुत्र : पांडु (पीतवर्ण, श्रापग्रस्त)

• दासी से पुत्र : विदुर (महाज्ञानी, धर्मराज यम का अंशावतार माने जाते हैं)


6 (i). धृतराष्ट्र

पत्नी गांधारी से 100 पुत्र (कौरव) और 1 पुत्री (दुशला)


6 (ii). पांडु (हस्तिनापुर के राजा)

पांडु शापग्रस्त थे, अतः संतानोत्पत्ति असंभव

ऋषि दुर्वासा से मिले वरदान द्वारा देवताओं का आह्वान कर पुत्र प्राप्ति की गई।

पत्नी कुंती :
• युधिष्ठिर (धर्मराज के आह्वान से)

• भीम (वायु देव के आह्वान से)

• अर्जुन (इंद्र देव के आह्वान से)


पत्नी माद्री :
• नकुल व सहदेव (अश्विनीकुमारों के आह्वान से)

यही पाँचों भाई पांडव कहलाए।


7. भीम और घटोत्कच

द्वितीय पांडव भीम का विवाह वनवासी स्त्री हिडिंबा से हुआ। उनसे उत्पन्न पुत्र:

• घटोत्कच – अपराजेय योद्धा, जो महाभारत युद्ध में कर्ण के वज्रास्त्र से वीरगति को प्राप्त हुआ।


8. घटोत्कच की संतान

घटोत्कच का विवाह मोरवी (असम की राजकुमारी) से हुआ। उनसे उत्पन्न तीन पुत्र:

• बर्बरीक (श्याम बाबा) - तीन बाणों के स्वामी, शीशदान के लिए प्रसिद्ध।

• अंजनपर्व - वीर योद्धा, महाभारत युद्ध के चौदहवें दिवस अश्वत्थामा द्वारा वध।

• मेघवर्ण - पराक्रमी, महाभारत युद्धोत्तर अश्वमेध यज्ञ में अर्जुन के नेतृत्व में यज्ञ अश्व की रक्षा में देश भ्रमण किया।



9. पांडवों का अन्य विस्तार

अर्जुन एवं द्रौपदी से पुत्र: प्रतिविंध्य

अर्जुन एवं सुभद्रा से पुत्र : अभिमन्यु

10. अभिमन्यु एवं उत्तरा से पुत्र : परीक्षित
महाभारत युद्ध के बाद कुरु वंश का उत्तराधिकारी


इस प्रकार वंशावली भरत → कुरु → प्रतीप → शांतनु → धृतराष्ट्र-पांडु-विदुर → कौरव-पांडव → घटोत्कच-बर्बरीक
→ अभिमन्यु → परीक्षित तक चलती है।

पांडव वन यात्रा मार्ग:

लाक्षागृह (बागपत) हिंडनपार यमुनापार (नावद्वारा) कानपुरदेहात / फतेहपुर बांदा
चित्रकूट करवी / मऊ अत्रौली / मानिकपुर मिर्जापुर के दक्षिणी भाग / विंध्याचल की पहाड़ियाँ रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र जिला मुख्यालय) रेनुकूट म्योरपुर दुद्धी → कनहर नदी पार → झारखंड के पलामू जिला में प्रवेश

पलामू मोहम्मदगंज  → हुसैनाबाद → पंडवा (भीमचूल्हा) → गढ़वा जिला में प्रवेश→ रमकंडा → कांडी → लातेहार जिला में प्रवेश→ हेरहंज → बालूमाथ → चतरा जिला में प्रवेश → टंडवा → लावालौंग → इटखोरी (कौलेश्वरीधाम)
सारठ (देवघर) → ग्राम बाबूपुर → पालोजोरी → रणबहियार → जरमुंडी → शिवपहाड़ी → हंसडीहा → पांडेश्वरनाथ पहाड़ (दुमका) → हंसडीहा → बाँसुरी/बंजाही → देवली → कतरास → गोविंदपुर → निरसा → पांड्रा गांव (निरसा प्रखंड, धनबाद) बलियापुर तोपचांची फुलवारी भोजूडीह पोलकीरी कुम्हरी (चेचकाधाम) चंदनकियारी (बोकारो) बेरमो जरीडीह चंद्रपुरा तेनुघाट पेटरवार गोला प्रखंड (जिला रामगढ़) →ओर मांझी → नगड़ी गांव (रांची) → हटिया → नामकुम → तुपुदाना → खलारी/टांगरबसली → खूंटी सीमा → टोरपा → राजनगर → कर्रा → खरसावां सीमा → चक्रधरपुर → गोइलकेरा → महादेवशाल (हिडिंबवन)

लौटने का मार्ग :

महादेवशाल टेबो (गोइलकेरा बहरागोड़ाधालभूमगढ़ घाटशिला (पंचपांडवस्थल मुसाबनी जादूगोड़ा  बराकर नदी के पास
गिरिडीह लखीसराय समस्तीपुर आरा (बिहार)

व्यापार के परे भारत की यात्रा में अग्रवाल समाज का योगदान

विख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा है -

हम बड़े नहीं हैं,
फिर भी बड़े हैं
इसलिए कि लोग जहाँ गिर पड़े हैं
हम वहाँ तने खड़े है.

अग्रवाल मतलब व्यापार ही नहीं, अग्रवाल मतलब सत्ता, साहित्य, संस्कृति, सृजन, खेल और सफलता है.

हालांकि किसी भी देश के इतिहास अथवा उसकी यात्रा को जातिगत योगदान में बाँटना उचित नहीं है. लेकिन अपने समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को अपने समाज के गौरवांवित अवदान से परिचित कराना भी आवश्यक है, ताकि वे जान सकें कि उनके पुरखों ने देश की प्रगति में कितना बड़ा योगदान दिया.

यकीन मानिए, यदि भारत की इतिहास यात्रा से अग्रवालों का अवदान अलग कर दिया जाए – तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अपना देश पचास वर्ष पीछे चला जाएगा.

संविधान निर्माता :
भारत का संविधान – जो हमारे लोकतंत्र की आत्मा है – उसकी प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा भीमराव आंबेडकर को पूरी दुनिया जानती है, किंतु उस समिति में सात सदस्य थे, जिसमें एक थे अग्रवाल समाज के देवी प्रसाद खेतान.

राजनीति :
आजादी के ठीक बाद सन 1947 में बनी संविधान सभा में रामनाथ गोयनका, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, कुसुमकांत जैन, राम बल्लभ विजयवर्गीय, गोपाल कृष्ण विजयवर्गीय जैसे प्रतिनिधियों ने हमारे समाज का मस्तक ऊँचा किया.

पहली लोकसभा में कई अग्रवाल सांसदों के नाम गूंजे, जिनमें मुख्य थे - बनारसी दास झुनझुनवाला, श्रीमन्नारायण धर्मनारायण अग्रवाल, मुकुंद लाल अग्रवाल, रामेश्वर प्रसाद नेवटिया, राधेश्याम मोरारका. समाजवादी आंदोलन के युगद्रष्टा डॉ. राममनोहर लोहिया से लेकर, वर्तमान में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल हों या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग, रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल अथवा भीलवाड़ा के सांसद दामोदर अग्रवाल, ये सभी अग्रवाल समाज के वह चेहरे हैं जिनके बिना भारतीय राजनीति की चर्चा अधूरी है.

बैंकर :
आजादी से पहले देश का सबसे बड़ा बैंक था - इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया – जिसके चेयरमैन थे बद्रीदास गोयनका,  वही बैंक बाद में 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' बना. यानी हम अग्रवाल देश के सबसे बड़े बैंक की नींव के पत्थर हैं.
विमल जालान भारतीय रिजर्व बैंक के 21वें गवर्नर रहे हैं.
हाल ही में संजय अग्रवाल ने एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक की नींव रखकर आधुनिक वित्तीय क्षेत्र में नया अध्याय रचा है.
अतुल गोयल का नाम आप सबने सुना होगा, वे गत वर्ष तक पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक थे.

निवेशक :
इंडियन वॉरेन बफेट कहलाने वाले पद्मश्री राकेश झुनझुनवाला, को कौन नहीं जानता होगा, आज उनकी पत्नी रेखा झुनझुनवाला देश की दिग्गज निवेशक है. दिग्गज शेयर बाजार निवेशक मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल हैं. वहीं अवाना कैपिटल की संस्थापक अंजली बंसल है.


धार्मिक साहित्य :
यदि आज घर-घर में गीता, रामचरितमानस और हनुमान चालीसा उपलब्ध हैं, तो इसका श्रेय शंकराचार्यों या धर्म गुरुओं को नहीं जाता, बल्कि सेठ जयदयाल गोयनका और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार को जाता है, जिन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की. हिंदी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी अग्रवाल ही थे.


पत्रकारिता:
जम्मू-कश्मीर में पत्रकारिता की नींव रखने वाले लाला मुल्क राज सराफ अग्रवाल समाज की ही शान थे, जिन्होंने 1924 में “रणवीर” नामक पहला दैनिक निकाला. टाइम्स ऑफ इंडिया को अंग्रेजों से खरीदने वाले रामकृष्ण डालमिया, इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक रामनाथ गोयनका,
दैनिक भास्कर के संस्थापक रमेश चंद्र अग्रवाल से लेकर उदित वाणी के संस्थापक राधेश्याम अग्रवाल तक, सभी अग्रवाल ही तो हैं. पद्मश्री शोभना भरतिया देश की पहली महिला हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह एच टी मीडिया का नेतृत्व किया और पद्मश्री शीला झुनझुनवाला देश की पहली महिला पत्रकार हैं जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिंदुस्तान में संयुक्त संपादक की भूमिका निभाई.

साहित्य एवं शिक्षा :
“धरती धोरां री” जैसे अमर गीत के रचयिता पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया से लेकर वर्तमान समय में मशहूर कवि शैलेश लोढ़ा तक कई अग्रवाल हैं, जिनकी लेखनी अद्वितीय है. साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में कई अग्रवालों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है - पद्म भूषण डॉ. दिनेश नंदिनी डालमिया, पद्मश्री डॉ. बीना अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस, पद्मश्री डॉ. रामवतार पोद्दार 'अरुण'.


फिल्म, रंगमंच, टेलीविजन और कला :
कलाकार पद्मश्री रामगोपाल बजाज, जी टीवी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा, पद्मश्री जगदीश चंद्र मित्तल, पद्मश्री कोमल कोठारी - जैसे नाम बताते हैं कि साहित्य और कला में अग्रवाल समाज की क्या पैठ है. साउथ सिनेमा (तेलुगु, तमिल) की सुपरस्टार काजल अग्रवाल, 1990 की सुपरहिट फिल्म आशिकी से रातों-रात स्टार बनी अनु अग्रवाल, तमिल फिल्मों में बड़ी अभिनेत्री निधि अग्रवाल, स्टैंड अप कॉमेडियन कौस्तुभ अग्रवाल, स्टैंड-अप कॉमिक और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर गुनीत अग्रवाल जैसे कई नाम हैं, जो अग्रवाल समुदाय को नेक्स्ट लेवल पर ले गए हैं.


ई - कॉमर्स :
आधुनिक ई-कॉमर्स के दौर में अग्रवाल समाज ने देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँचाइयों पर पहुँचाया है.लेंसकार्ट के संस्थापक पीयूष बंसल, फ्लिपकार्ट के सचिन और बिन्नी बंसल, मिन्त्रा के मुकेश बंसल, स्नैपडील के रोहित बंसल, इंडियामार्ट के दिनेश अग्रवाल, ओला के भाविश अग्रवाल, ओयो के रितेश अग्रवाल, जोमैटो के दीपेंद्र गोयल, शादी डॉट कॉम के अनुपम मित्तल, येभी के मनमोहन अग्रवाल, सवारी के गौरव अग्रवाल, नापतौल वाले मनु अग्रवाल, सस्ता सुंदर डॉट कॉम के बनवारी लाल मित्तल आज देश की युवा पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं.


खेल और एडवेंचर :
जमशेदपुर की पद्मश्री प्रेमलता अग्रवाल ने ना केवल
एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा लहराया बल्कि विश्व की सातों सर्वोच्च चोटियां फतह कर डाली. एविएशन और एडवेंचर के क्षेत्र में पद्मभूषण विजयपत सिंघानिया, पद्मश्री अजीत बजाज और पद्मश्री देवेंद्र झाझरिया का नाम विश्व विख्यात है.

श्री राम मंदिर, अयोध्या:
अयोध्या के राम मंदिर को ही लीजिये, क्या अग्रवालों के योगदान के बिना इसका निर्माण संभव था? कदापि नहीं!
अयोध्या विवाद से संबं‍धित मुकदमे में रामलला की ओर से  स्व. देवकी नंदन अग्रवाल मित्र रुप में पैरोकार रहे. श्री राम जन्मभूमि क्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या के महासचिव चंपत राय बंसल हैं.  दिनांक 5 अगस्त, 2020 को श्री राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी के साथ मुख्य यजमान की भूमिका सलिल सिंघल ने निभाई, जो रामजन्मभूमि आंदोलन के सूत्रधार स्व. अशोक सिंघल के भतीजे हैं. रामलला की नई मूर्ति स्थापना के पूर्व अयोध्या के टैंट में भगवान श्रीराम के अष्टधातु का जो विग्रह था, उसके प्राकट्य के सूत्रधार भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार थे.

विष्णु हरि डालमिया हों या कोठारी बंधु, जय भगवान गोयल हों या विनोद कुमार बंसल अथवा अमर नाथ गोयल, स्व. सीताराम गोयल हों या स्व. रामस्वरूप अग्रवाल, जयपुर के एस के पोद्दार हों या इंदौर के बिनोद गोयल अथवा सूरत का अग्रवाल विकास ट्रस्ट, इन अग्रवाल विभूतियों की चर्चा के बगैर श्री राम मंदिर अयोध्या की स्थापना का इतिहास अधूरा है.

अध्यात्म :
विश्वविख्यात ध्यान गुरु पद्म भूषण सत्यनारायण गोयनका के विश्व भर में करोड़ों अनुयायी हैं. वैसे विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भी अग्रवाल समुदाय से हैं, उनके पिता का नाम रामकृपाल गर्ग और माताजी का नाम सरोज गर्ग है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ :
अल्पसंख्यक संवाद और राष्ट्रीय एकता पर विशेष कार्य करने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी भी तो अग्रवाल ही हैं.

मेडिकल और इंजिनियरिंग:
चिकित्सा, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में तो कई अग्रवाल विभूतियां हैं, जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया - पद्मभूषण डॉ. सत्य पॉल अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सुदर्शन कुमार अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. के. के. अग्रवाल, डॉ. अशोक पनगढ़िया, पद्मश्री प्रो. पवन राज गोयल,  पद्मविभूषण डॉ. बालकृष्ण गोयल, पद्मविभूषण डॉ. दौलत सिंह कोठारी, पद्मश्री डॉ. लोकेश कुमार सिंघल, पद्मश्री प्रेम शंकर गोयल, पद्मश्री डॉ. जय पाल मित्तल और पद्मभूषण रामनारायण अग्रवाल.

समाजसेवा :
समाजिक कार्य के क्षेत्र में तो देश के हर शहर, हर गांव, हर कस्बे में एक विख्यात अग्रवाल मिलेंगे. किंतु यहां चर्चा केवल उन चुनिंदा अग्रवालों की, जिनको समाजसेवा के क्षेत्र में पद्म सम्मान से विभूषित किया गया - पद्मश्री कैलाश चन्द्र अग्रवाल, पद्मश्री मामराज अग्रवाल, पद्मभूषण सीताराम सेकसरिया, पद्मश्री सुलोचना मोदी और पद्मविभूषण जानकीबाई बजाज.

प्रशासनिक सेवा, सार्वजनिक मामले और पर्यावरण :
कोविड 19 महामारी के दौरान भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की मीडिया ब्रीफिंग्स करने वाले प्रतिनिधि के रुप में लव अग्रवाल देश के विख्यात आईएएस हैं. भारतनेट और डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट की मुख्य आर्किटेक्ट अरुणा अग्रवाल दूरसंचार सचिव और बाद में राज्यसभा सदस्य रहीं.
डी. पी. अग्रवाल और विनय मित्तल संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं. सुभाष चंद्र गर्ग वर्ल्ड बैंक में कार्यकारी निदेशक रहे. आई पी एस सीमांत गोयल रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के प्रमुख रहे. केरल कैडर के आई ए एस अधिकारी एल. सी. गोयल केंद्रीय गृह सचिव रहे. प्रशासनिक सेवा और सार्वजनिक मामलों में पद्मश्री सुरजमल अग्रवाल, पद्मभूषण डॉ० लक्ष्मी मल्ल सिंघवी, विख्यात पर्यावरणविद पद्मभूषण अनिल कुमार अग्रवाल का नाम उल्लेखनीय है.

ये उदाहरण साबित करते हैं कि हमारी उड़ान केवल व्यापार तक सीमित नहीं है. कौन सा क्षेत्र है जहां अग्रवालों की धमक नहीं है? व्यापार से परे – राजनीति से साहित्य तक,
माउंट एवरेस्ट से राम मंदिर तक, अग्रवाल समाज ने भारत की यात्रा को गति और गौरव दोनों दिया है.


Friday, 10 January 2025

साक्षात्कार : संदीप मुरारका

प्रश्न : क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि वर्ग विशेष पर लिखकर आप पुरस्कार विजेताओं का वर्गीकरण कर रहे हैं?

संदीप : फलों के राजा आम की कई किस्में बाजार में उपलब्ध रहती है़- हाफूस, लंगड़ा, सिंदूरी, मालदा, चौसा, बंगनपल्ली, हिमसागर, दशहरी, बादामी, केशर, मनकुराड़ इत्यादि। आम की सभी प्रजातियाँ रसभरी हैं, सभी का अपना अपना स्वाद है़। किंतु किसी को लंगड़ा पसंद है़, तो किसी को सिंदूरी। उसी प्रकार पद्म पुरस्कार प्राप्त हर शख्शियत सम्मानित है़। किंतु बतौर पाठक सबके विषय में पढ़ पाना असंभव है़। अतः वर्गीकरण के आधार पर मैं इन प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनियों का एक नया पाठकवर्ग तैयार करने का प्रयास कर रहा हूँ।

प्रश्न : पद्म पुरस्कार विजेताओं की जीवनियों को लिखने के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है़?

संदीप : अपने देश में हर वर्ष हजारों छात्र छात्राएँ पीएचडी करते हैं। किंतु अधिंकाश के विषय समान हैं। जबकि आदिवासियों की संघर्ष गाथा बहुत कठिन है़, फूस के झोपड़े से निकलकर पुरस्कृत होने के लिए राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने की कहानी को थीसिस में बदला जाए। मैं चाहता हूँ कि आदिवासियों में जो प्रेरक व्यक्तित्व हैं, उनपर शोध हो। इसके लिए जो बुनियादी जानकारी चाहिए, वो मेरी पुस्तकों में उपलब्ध है़। मेरी पुस्तकें शोधार्थियों के लिए नए द्वार खोले एवं संदर्भ पुस्तक बने, यही मेरा उद्देश्य है़।

प्रश्न : आप स्वयं ना डॉक्टरेट हैं, ना एमए, ना प्रोफेसर, ना शिक्षक, फिर भी आप लेखन कार्य कर रहे हैं। ऐसे में आपके लेखन की कितनी स्वीकार्यता होगी?

संदीप : क्या आपने कभी सुना है़ कि डॉ. गोस्वामी तुलसीदास या डॉ. कबीर या प्रो. सूरदास या प्रो. रहीम, नहीं ना। भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली गद्य-साहित्‍य का जनक माना जाता है, किंतु उन्होंने तो स्कूली शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी। ना प्रेमचंद एमए एमफिल थे और ना ही दिनकर। साहित्य पुरोधा मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी ने तो मैट्रिकुलेशन भी नहीं किया था।

मेरी पुस्तकों को पढें, आप पाएंगे कि कई ऐसे साहित्यकार हुए, जिनको पद्म सम्मान से विभूषित किया गया। किंतु वे ना तो डिग्री होल्डर हैं और ना कभी स्कूल कॉलेज जा पाए। यथा: पद्मश्री भीखुदान गोविंद भाई गढ़वी, पद्मश्री कवि दुला भाया काग, पद्मश्री बेनीचंद्र जमाटिया, पद्मश्री दादूदान गढ़वी, पद्मश्री पूर्णमासी जानी इत्यादि।

प्रश्न : आपको साहित्य सृजन की प्रेरणा कैसे मिली ?

संदीप : मेरे पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था, उनके पास हजारों पुस्तकें थी। गुरुदत्त की तो लगभग सारी पुस्तकें उनके संग्रह का हिस्सा थी। कहा जा सकता है़ कि मुझे पढ़ने की प्रेरणा बचपन में ही अपने पिता से मिली। मेरी प्रारंभिक शिक्षा जमशेदपुर के सबसे पुराने साहित्यिक केंद्र जगतबंधु सेवासदन पुस्तकालय द्वारा संचालित विद्यालय से हुई, सो मेरा जुड़ाव पुस्तकालय व वहाँ की साहित्यिक गतिविधियों से होता चला गया। वर्ष 1993 में मैंने मैट्रिकुलेशन किया, तबतक कविताओं से परिचय हो गया था। आकाशवाणी के विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागिता एवं पत्रकारिता का दौर प्रारंभ हो चुका था।

प्रश्न : पत्रकारिता !

संदीप : जी, पत्रकारिता। वर्ष 1993 -95 में लगभग डेढ़ साल तक मैंने दैनिक आज में बतौर पत्रकार कार्य किया। मेरे विषय थे सामयिक आलेख, साक्षात्कार, साहित्यिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिग। उन दिनों आकाशवाणी में एक कार्यक्रम आता था युवा वार्ता, मुझे कई बार उसके संचालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है़। उनदिनों पंद्रह मिनट के कार्यक्रम के पचहत्तर रुपए प्राप्त हुआ करते थे।

प्रश्न : वर्ष 1995 के बाद सीधे 2020 में पुस्तक, बीच में आप कहाँ खो गए?

संदीप : व्यवसायिक परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा भी झुकाव व्यवसाय की ओर बढ़ता चला गया। व्यवसाय और पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण लेखन कार्य भले ही बाधित हुआ, किंतु अध्ययन जारी रहा। जमशेदपुर पुस्तक मेले से प्रत्येक वर्ष मैं 8-10 पुस्तकें अवश्य खरीदता रहा हूँ। समय समय पर विभिन्न विषयों पर आर्टिकल्स भी लिखते रहा और स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होता रहा। ईश्वरीय प्रेरणा से वर्ष 2017 से मेरा मन पुराणों के अध्ययन में लगने लगा। श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, लवकुश चरित, विष्णु पुराण, शिव पुराण, वराह पुराण, देवी पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण इत्यादि कई धार्मिक ग्रंथो के अध्ययन से लेखन के प्रति मेरी रुचि जागृत हो गई।

प्रश्न : इसका मतलब आप हिंदूवादी धार्मिक विचारधारा के हैं?

संदीप : निश्चित तौर पर। मेरा जन्म सरस्वती पूजा बसंत पंचमी की रात्रि का है़। लेकिन यह कहना गलत होगा कि मैं हिंदूवादी हूँ। मैं सभी धर्मों का समान रुप से सम्मान करता हूँ। मेरी हाई स्कूल की शिक्षा सेंट मेरीज मिशनरी स्कूल से हुई है़। मेरा मानना है़ कि जो अनुशासन आप मिशनरीज में सीख सकते हैं वो और कहीं संभव नहीं है़।

साथ ही मैं यह भी जोड़ता हूँ कि हिंदू धर्म का जितना नुकसान हमारे धर्मगुरुओं व मठाधीशों ने किया है़, उतना किसी दूसरे ने नहीं किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 122 प्रमुख भाषाएँ हैं एवं 1599 अन्य बोलियाँ हैं। वहीं विश्व के 195 देशों में लगभग 7,117 भाषाएँ बोली जाती हैं। बीबीसी न्यूज के एक आर्टिकल के अनुसार भारत में लगभग 3,000 जातियाँ एवं 25,000 उपजातियाँ हैं। हर जाति के अपने नियम, अपनी धार्मिक परम्पराएं, अपने देवी देवता, अपने रीति रिवाज, अपनी मान्यताएँ और अपनी धार्मिक पुस्तक है़। भारत में प्रचलित ये धार्मिक पुस्तकें या तो उस धर्म को मानने वाले लोगों की अपनी निजी भाषा में उपलब्ध है, या बहुत हुआ तो हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और ओड़िया में प्रकाशित हुई है। अपने देश में एकमात्र "श्रीमद्भागवत गीता" ही ऐसा लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ है, जिसका अनुवाद लगभग 75 भाषाओं में हो पाया है। किंतु
चर्च ने अपने धार्मिक ग्रंथ "पवित्र बाइबिल" का अनुवाद विश्व की लगभग हर भाषा में करवाया। पूर्ण बाइबिल का अनुवाद विश्व की लगभग 704 भाषाओं में हो चुका है। वहीं इसके पदों एवं कुछ अंशो को 3,415 भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है। उसपर भी सबसे मुख्य बात कि यदि किसी को बाइबिल पढ़नी हो तो निःशुल्क उपलब्ध हो जाएगी। जबकि करोड़ रुपए खर्च कर आयोजित किए गए हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों में भी आपको श्रीमद्भागवत गीता या श्रीरामचरितमानस निःशुल्क नहीं मिलेगी।

प्रश्न : आपकी विचारधारा क्या है़?

संदीप : स्वभावतः कहा जाए तो मैं लोहिया के विचारों से प्रभावित रहा हूँ। मैं स्वयं को समाजवादी मानता हूँ। किंतु वो समाजवाद जिसकी नींव श्रीराम ने रखी, शबरी के हाथों जूठे बेर खाए। वो समाजवाद जिसके प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन रहे, जिन्होंने एक ईंट एक रुपया का सिद्धांत दिया। वो समाजवाद जिसके पैरोकार डॉ. राममनोहर लोहिया रहे। ना कि काशीराम, मायावती या आज की राजनीति वाला समाजवाद।

प्रश्न : साहित्यिक आयोजनों में आपकी उपस्थिति ना के बराबर रहती है़ ?

संदीप : ऐसा नहीं है़! मैं सामाजिक व्यक्ति हूँ, कई सामाजिक संगठनों में दायित्व पर हूँ। व्यवसाय व समाज के कार्यक्रमों के कारण व्यस्तता रहती है़। यदि किसी साहित्यिक कार्यक्रम में निजी तौर पर बुलावा रहता है़, तो अवश्य भाग लेता हूँ। हाँ यह बात सही है़ कि मैं बिना समुचित निमंत्रण किसी कार्यक्रम में नहीं जाता।

प्रश्न : आपने अधिकांश कविताओं में सरल और सहज शब्दों का प्रयोग किया है। क्यों ?

संदीप : भारीभरकम शब्द लिखने वाला ही साहित्यकार है़, यह सोचना गलत है़। आप गौर कीजिए कि बाबा नागार्जुन से लेकर कुमार विश्वास तक सरल एवं तुरंत समझ में आने वाले शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। मेरा पाठक किसी विभूति के विषय में यदि एक बार पढ़ ले, तो वह उस पर खुलकर चर्चा कर सके। इसीलिए मैंने असाधारण व्यक्तित्वों की जीवनियों को साधारण शब्दों में लिखा है़।

प्रश्न : क्या आपको लगता है़ कि साहित्य की इस विशाल दुनिया में आपकी पुस्तकें स्थान बना पाएँगी?

संदीप : क्यूँ बनाना है़ स्थान ! मैं अपनी पुस्तकों को संग्रहालय या पुस्तकालय का हिस्सा बनाने में इच्छुक नहीं।मेरी पुस्तकें तो शब्द रूपी "तर्पण" है समाज की उन विभूतियों का जिनके बहुमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा और "दर्पण" है वैसे जुझारु युवाओं के लिए जो लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि यूपीएससी की तैयारी करने वाला छात्र मेरी पुस्तक ढूंढकर पढ़े। मैं चाहता हूँ कि कॉलेज में आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिताओं में छात्र छात्राएँ मेरी पुस्तक से विषय उठाएँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी पुस्तक सामयिक पत्रकारिता में काम आए।


प्रश्न : साहित्य के क्षेत्र में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं ?

संदीप : साहित्य का क्षेत्र खेल के मैदान में आयोजित दौड़ प्रतियोगिता तो है़ नहीं कि मैं किस स्थान पर आया। यह एक खूबसूरत बगीचा है़, जिसमें कहीं कहीं रिक्त भूमि खोजकर मैं भी दो चार पौधे लगाना चाहता हूँ। मेरे द्वारा लिखी पुस्तकों को संदर्भ ग्रंथ मानकर शोधार्थी पीएचडी करेंगे, ये मेरे लिए गर्व की बात है़। मेरी पुस्तकों में अंकित संघर्ष गाथाओं से प्रभावित होकर जिस दिन कोई युवा पद्म सम्मान प्राप्त करने राष्ट्रपति भवन की ड्योढ़ी तक जा पहुँचेगा, मैं समझूंगा मुझे समुचित पारिश्रमिक प्राप्त हुआ। 


प्रश्न : अपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?

संदीप : काव्य संग्रह आँख खोलती सुबह में प्रकाशित कविता 'दियासलाई', वर्ष 1993 में प्रकाशित इस पुस्तक के संपादक थे स्व. शैलेश पांडेय एवं कथाकार राकेश मिश्र।


प्रश्न : इन दिनों क्या लिख रहे हैं ?

संदीप : पुस्तक शिखर को छूते ट्राइबल्स के चौथे भाग पर कार्य जारी है़। साथ ही उसके भाग 1 एवं 3 के अंग्रेजी अनुवाद की भी तैयारी चल रही है़।

प्रश्न : आपकी पुस्तकों के संबंध में कोई विशेष बात, जो आप पाठकों तक पहुंचाना चाहें?
संदीप : पूरे देश में एकरूपता लाने हेतु केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण कर दिया गया है़। मैं प्रयासरत हूँ कि मेरा लेखन आईएस 16500 : 2012 के अनुसार हो। शिखर को छूते ट्राइबल्स भाग 3 एवं पद्म अलंकृत विभूतियाँ (मारवाड़ी/अग्रवाल) उसी पैटर्न पर लिखी गई हैं।


प्रश्न : आजकल पुस्तकों के पाठक कम होते जा रहे हैं, ऐसे में आपके मन में कभी यह नही आता कि क्यों लिखा जाए ?

संदीप : कम होते जा रहे हैं या बढ़ते जा रहे हैं? कल तक पूर्वोत्तर में कोई हिंदी बोलना नहीं चाहता था, आज वहाँ हिंदी पाँव पसार चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक हिंदी विश्व में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है़। ऐसे में सवाल उठता है़ कि इन हिंदीभाषियों तक अपनी पुस्तक कैसे पंहुचायी जाए। और इस प्रश्न का एक ही जवाब है़ कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो लीक से अलग हट कर हो।

प्रश्न : नवोदित साहित्यकारों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

संदीप : दो बात। पहला अध्ययन अवश्य करें, क्योंकि बिना पढ़े अच्छा लिखना संभव नहीं। दूसरा प्रतिदिन लिखें, चाहे एक ही वाक्य लिखें, पर अवश्य लिखें। लिखने की आदत नित्यकर्म जैसी होनी चाहिए, आदत छूटी, लिखना छूटा समझो।