Sunday, 12 October 2025

कुरु वंशावली में बर्बरीक

कुरु वंशावली में बर्बरीक
(महाभारत के अनुसार)

1. भरत
भरत चक्रवर्ती प्राचीन भारत के सम्राट थे, जिनके नाम पर इस भूभाग को भारतवर्ष कहा गया। भरत से कई पीढ़ियों के उपरांत कुरु का जन्म हुआ।

भरत → कई पीढ़ियाँ → कुरु


2. कुरु
कुरु वंश के संस्थापक, जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र की भूमि प्रसिद्ध हुई।


3. राजा प्रतीप
कुरु वंश के प्रतापी राजा, जिनके तीन पुत्र थे -

• देवापि - ज्येष्ठ पुत्र, जिन्होंने सन्यास ले लिया।

• बाल्हीक - दूसरे पुत्र, जो बाल्हिका राज्य (आधुनिक बल्ख, अफगानिस्तान क्षेत्र) के शासक बने।

• शांतनु - तृतीय पुत्र, जिन्होंने हस्तिनापुर का राजसिंहासन संभाला।


4. राजा शांतनु

प्रथम पत्नी गंगा से पुत्र :

• देवव्रत (भीष्म पितामह), जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया।

द्वितीय पत्नी सत्यवती से दो पुत्र :

• चित्रांगद - कम आयु में निधन

• विचित्रवीर्य – हस्तिनापुर के राजा बने, परंतु अल्पायु में निधन। इनकी दो पत्नियाँ थीं अंबिका और अंबालिका


5. विचित्रवीर्य के निधन के पश्चात् नियोग प्रथा से संतानोत्पत्ति

• अंबिका से पुत्र:  धृतराष्ट्र (जन्म से नेत्रहीन)

• अंबालिका से पुत्र : पांडु (पीतवर्ण, श्रापग्रस्त)

• दासी से पुत्र : विदुर (महाज्ञानी, धर्मराज यम का अंशावतार माने जाते हैं)


6 (i). धृतराष्ट्र

पत्नी गांधारी से 100 पुत्र (कौरव) और 1 पुत्री (दुशला)


6 (ii). पांडु (हस्तिनापुर के राजा)

पांडु शापग्रस्त थे, अतः संतानोत्पत्ति असंभव

ऋषि दुर्वासा से मिले वरदान द्वारा देवताओं का आह्वान कर पुत्र प्राप्ति की गई।

पत्नी कुंती :
• युधिष्ठिर (धर्मराज के आह्वान से)

• भीम (वायु देव के आह्वान से)

• अर्जुन (इंद्र देव के आह्वान से)


पत्नी माद्री :
• नकुल व सहदेव (अश्विनीकुमारों के आह्वान से)

यही पाँचों भाई पांडव कहलाए।


7. भीम और घटोत्कच

द्वितीय पांडव भीम का विवाह वनवासी स्त्री हिडिंबा से हुआ। उनसे उत्पन्न पुत्र:

• घटोत्कच – अपराजेय योद्धा, जो महाभारत युद्ध में कर्ण के वज्रास्त्र से वीरगति को प्राप्त हुआ।


8. घटोत्कच की संतान

घटोत्कच का विवाह मोरवी (असम की राजकुमारी) से हुआ। उनसे उत्पन्न तीन पुत्र:

• बर्बरीक (श्याम बाबा) - तीन बाणों के स्वामी, शीशदान के लिए प्रसिद्ध।

• अंजनपर्व - वीर योद्धा, महाभारत युद्ध के चौदहवें दिवस अश्वत्थामा द्वारा वध।

• मेघवर्ण - पराक्रमी, महाभारत युद्धोत्तर अश्वमेध यज्ञ में अर्जुन के नेतृत्व में यज्ञ अश्व की रक्षा में देश भ्रमण किया।



9. पांडवों का अन्य विस्तार

अर्जुन एवं द्रौपदी से पुत्र: प्रतिविंध्य

अर्जुन एवं सुभद्रा से पुत्र : अभिमन्यु

10. अभिमन्यु एवं उत्तरा से पुत्र : परीक्षित
महाभारत युद्ध के बाद कुरु वंश का उत्तराधिकारी


इस प्रकार वंशावली भरत → कुरु → प्रतीप → शांतनु → धृतराष्ट्र-पांडु-विदुर → कौरव-पांडव → घटोत्कच-बर्बरीक
→ अभिमन्यु → परीक्षित तक चलती है।

पांडव वन यात्रा मार्ग:

लाक्षागृह (बागपत) हिंडनपार यमुनापार (नावद्वारा) कानपुरदेहात / फतेहपुर बांदा
चित्रकूट करवी / मऊ अत्रौली / मानिकपुर मिर्जापुर के दक्षिणी भाग / विंध्याचल की पहाड़ियाँ रॉबर्ट्सगंज (सोनभद्र जिला मुख्यालय) रेनुकूट म्योरपुर दुद्धी → कनहर नदी पार → झारखंड के पलामू जिला में प्रवेश

पलामू मोहम्मदगंज  → हुसैनाबाद → पंडवा (भीमचूल्हा) → गढ़वा जिला में प्रवेश→ रमकंडा → कांडी → लातेहार जिला में प्रवेश→ हेरहंज → बालूमाथ → चतरा जिला में प्रवेश → टंडवा → लावालौंग → इटखोरी (कौलेश्वरीधाम)
सारठ (देवघर) → ग्राम बाबूपुर → पालोजोरी → रणबहियार → जरमुंडी → शिवपहाड़ी → हंसडीहा → पांडेश्वरनाथ पहाड़ (दुमका) → हंसडीहा → बाँसुरी/बंजाही → देवली → कतरास → गोविंदपुर → निरसा → पांड्रा गांव (निरसा प्रखंड, धनबाद) बलियापुर तोपचांची फुलवारी भोजूडीह पोलकीरी कुम्हरी (चेचकाधाम) चंदनकियारी (बोकारो) बेरमो जरीडीह चंद्रपुरा तेनुघाट पेटरवार गोला प्रखंड (जिला रामगढ़) →ओर मांझी → नगड़ी गांव (रांची) → हटिया → नामकुम → तुपुदाना → खलारी/टांगरबसली → खूंटी सीमा → टोरपा → राजनगर → कर्रा → खरसावां सीमा → चक्रधरपुर → गोइलकेरा → महादेवशाल (हिडिंबवन)

लौटने का मार्ग :

महादेवशाल टेबो (गोइलकेरा बहरागोड़ाधालभूमगढ़ घाटशिला (पंचपांडवस्थल मुसाबनी जादूगोड़ा  बराकर नदी के पास
गिरिडीह लखीसराय समस्तीपुर आरा (बिहार)

व्यापार के परे भारत की यात्रा में अग्रवाल समाज का योगदान

विख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा है -

हम बड़े नहीं हैं,
फिर भी बड़े हैं
इसलिए कि लोग जहाँ गिर पड़े हैं
हम वहाँ तने खड़े है.

अग्रवाल मतलब व्यापार ही नहीं, अग्रवाल मतलब सत्ता, साहित्य, संस्कृति, सृजन, खेल और सफलता है.

हालांकि किसी भी देश के इतिहास अथवा उसकी यात्रा को जातिगत योगदान में बाँटना उचित नहीं है. लेकिन अपने समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को अपने समाज के गौरवांवित अवदान से परिचित कराना भी आवश्यक है, ताकि वे जान सकें कि उनके पुरखों ने देश की प्रगति में कितना बड़ा योगदान दिया.

यकीन मानिए, यदि भारत की इतिहास यात्रा से अग्रवालों का अवदान अलग कर दिया जाए – तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अपना देश पचास वर्ष पीछे चला जाएगा.

संविधान निर्माता :
भारत का संविधान – जो हमारे लोकतंत्र की आत्मा है – उसकी प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा भीमराव आंबेडकर को पूरी दुनिया जानती है, किंतु उस समिति में सात सदस्य थे, जिसमें एक थे अग्रवाल समाज के देवी प्रसाद खेतान.

राजनीति :
आजादी के ठीक बाद सन 1947 में बनी संविधान सभा में रामनाथ गोयनका, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, कुसुमकांत जैन, राम बल्लभ विजयवर्गीय, गोपाल कृष्ण विजयवर्गीय जैसे प्रतिनिधियों ने हमारे समाज का मस्तक ऊँचा किया.

पहली लोकसभा में कई अग्रवाल सांसदों के नाम गूंजे, जिनमें मुख्य थे - बनारसी दास झुनझुनवाला, श्रीमन्नारायण धर्मनारायण अग्रवाल, मुकुंद लाल अग्रवाल, रामेश्वर प्रसाद नेवटिया, राधेश्याम मोरारका. समाजवादी आंदोलन के युगद्रष्टा डॉ. राममनोहर लोहिया से लेकर, वर्तमान में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल हों या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग, रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल अथवा भीलवाड़ा के सांसद दामोदर अग्रवाल, ये सभी अग्रवाल समाज के वह चेहरे हैं जिनके बिना भारतीय राजनीति की चर्चा अधूरी है.

बैंकर :
आजादी से पहले देश का सबसे बड़ा बैंक था - इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया – जिसके चेयरमैन थे बद्रीदास गोयनका,  वही बैंक बाद में 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' बना. यानी हम अग्रवाल देश के सबसे बड़े बैंक की नींव के पत्थर हैं.
विमल जालान भारतीय रिजर्व बैंक के 21वें गवर्नर रहे हैं.
हाल ही में संजय अग्रवाल ने एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक की नींव रखकर आधुनिक वित्तीय क्षेत्र में नया अध्याय रचा है.
अतुल गोयल का नाम आप सबने सुना होगा, वे गत वर्ष तक पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक थे.

निवेशक :
इंडियन वॉरेन बफेट कहलाने वाले पद्मश्री राकेश झुनझुनवाला, को कौन नहीं जानता होगा, आज उनकी पत्नी रेखा झुनझुनवाला देश की दिग्गज निवेशक है. दिग्गज शेयर बाजार निवेशक मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल हैं. वहीं अवाना कैपिटल की संस्थापक अंजली बंसल है.


धार्मिक साहित्य :
यदि आज घर-घर में गीता, रामचरितमानस और हनुमान चालीसा उपलब्ध हैं, तो इसका श्रेय शंकराचार्यों या धर्म गुरुओं को नहीं जाता, बल्कि सेठ जयदयाल गोयनका और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार को जाता है, जिन्होंने गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की. हिंदी साहित्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी अग्रवाल ही थे.


पत्रकारिता:
जम्मू-कश्मीर में पत्रकारिता की नींव रखने वाले लाला मुल्क राज सराफ अग्रवाल समाज की ही शान थे, जिन्होंने 1924 में “रणवीर” नामक पहला दैनिक निकाला. टाइम्स ऑफ इंडिया को अंग्रेजों से खरीदने वाले रामकृष्ण डालमिया, इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक रामनाथ गोयनका,
दैनिक भास्कर के संस्थापक रमेश चंद्र अग्रवाल से लेकर उदित वाणी के संस्थापक राधेश्याम अग्रवाल तक, सभी अग्रवाल ही तो हैं. पद्मश्री शोभना भरतिया देश की पहली महिला हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह एच टी मीडिया का नेतृत्व किया और पद्मश्री शीला झुनझुनवाला देश की पहली महिला पत्रकार हैं जिन्होंने राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिंदुस्तान में संयुक्त संपादक की भूमिका निभाई.

साहित्य एवं शिक्षा :
“धरती धोरां री” जैसे अमर गीत के रचयिता पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया से लेकर वर्तमान समय में मशहूर कवि शैलेश लोढ़ा तक कई अग्रवाल हैं, जिनकी लेखनी अद्वितीय है. साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में कई अग्रवालों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है - पद्म भूषण डॉ. दिनेश नंदिनी डालमिया, पद्मश्री डॉ. बीना अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस, पद्मश्री डॉ. रामवतार पोद्दार 'अरुण'.


फिल्म, रंगमंच, टेलीविजन और कला :
कलाकार पद्मश्री रामगोपाल बजाज, जी टीवी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा, पद्मश्री जगदीश चंद्र मित्तल, पद्मश्री कोमल कोठारी - जैसे नाम बताते हैं कि साहित्य और कला में अग्रवाल समाज की क्या पैठ है. साउथ सिनेमा (तेलुगु, तमिल) की सुपरस्टार काजल अग्रवाल, 1990 की सुपरहिट फिल्म आशिकी से रातों-रात स्टार बनी अनु अग्रवाल, तमिल फिल्मों में बड़ी अभिनेत्री निधि अग्रवाल, स्टैंड अप कॉमेडियन कौस्तुभ अग्रवाल, स्टैंड-अप कॉमिक और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर गुनीत अग्रवाल जैसे कई नाम हैं, जो अग्रवाल समुदाय को नेक्स्ट लेवल पर ले गए हैं.


ई - कॉमर्स :
आधुनिक ई-कॉमर्स के दौर में अग्रवाल समाज ने देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँचाइयों पर पहुँचाया है.लेंसकार्ट के संस्थापक पीयूष बंसल, फ्लिपकार्ट के सचिन और बिन्नी बंसल, मिन्त्रा के मुकेश बंसल, स्नैपडील के रोहित बंसल, इंडियामार्ट के दिनेश अग्रवाल, ओला के भाविश अग्रवाल, ओयो के रितेश अग्रवाल, जोमैटो के दीपेंद्र गोयल, शादी डॉट कॉम के अनुपम मित्तल, येभी के मनमोहन अग्रवाल, सवारी के गौरव अग्रवाल, नापतौल वाले मनु अग्रवाल, सस्ता सुंदर डॉट कॉम के बनवारी लाल मित्तल आज देश की युवा पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं.


खेल और एडवेंचर :
जमशेदपुर की पद्मश्री प्रेमलता अग्रवाल ने ना केवल
एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा लहराया बल्कि विश्व की सातों सर्वोच्च चोटियां फतह कर डाली. एविएशन और एडवेंचर के क्षेत्र में पद्मभूषण विजयपत सिंघानिया, पद्मश्री अजीत बजाज और पद्मश्री देवेंद्र झाझरिया का नाम विश्व विख्यात है.

श्री राम मंदिर, अयोध्या:
अयोध्या के राम मंदिर को ही लीजिये, क्या अग्रवालों के योगदान के बिना इसका निर्माण संभव था? कदापि नहीं!
अयोध्या विवाद से संबं‍धित मुकदमे में रामलला की ओर से  स्व. देवकी नंदन अग्रवाल मित्र रुप में पैरोकार रहे. श्री राम जन्मभूमि क्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या के महासचिव चंपत राय बंसल हैं.  दिनांक 5 अगस्त, 2020 को श्री राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी के साथ मुख्य यजमान की भूमिका सलिल सिंघल ने निभाई, जो रामजन्मभूमि आंदोलन के सूत्रधार स्व. अशोक सिंघल के भतीजे हैं. रामलला की नई मूर्ति स्थापना के पूर्व अयोध्या के टैंट में भगवान श्रीराम के अष्टधातु का जो विग्रह था, उसके प्राकट्य के सूत्रधार भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार थे.

विष्णु हरि डालमिया हों या कोठारी बंधु, जय भगवान गोयल हों या विनोद कुमार बंसल अथवा अमर नाथ गोयल, स्व. सीताराम गोयल हों या स्व. रामस्वरूप अग्रवाल, जयपुर के एस के पोद्दार हों या इंदौर के बिनोद गोयल अथवा सूरत का अग्रवाल विकास ट्रस्ट, इन अग्रवाल विभूतियों की चर्चा के बगैर श्री राम मंदिर अयोध्या की स्थापना का इतिहास अधूरा है.

अध्यात्म :
विश्वविख्यात ध्यान गुरु पद्म भूषण सत्यनारायण गोयनका के विश्व भर में करोड़ों अनुयायी हैं. वैसे विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भी अग्रवाल समुदाय से हैं, उनके पिता का नाम रामकृपाल गर्ग और माताजी का नाम सरोज गर्ग है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ :
अल्पसंख्यक संवाद और राष्ट्रीय एकता पर विशेष कार्य करने वाले संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी भी तो अग्रवाल ही हैं.

मेडिकल और इंजिनियरिंग:
चिकित्सा, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में तो कई अग्रवाल विभूतियां हैं, जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया - पद्मभूषण डॉ. सत्य पॉल अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. सुदर्शन कुमार अग्रवाल, पद्मश्री डॉ. के. के. अग्रवाल, डॉ. अशोक पनगढ़िया, पद्मश्री प्रो. पवन राज गोयल,  पद्मविभूषण डॉ. बालकृष्ण गोयल, पद्मविभूषण डॉ. दौलत सिंह कोठारी, पद्मश्री डॉ. लोकेश कुमार सिंघल, पद्मश्री प्रेम शंकर गोयल, पद्मश्री डॉ. जय पाल मित्तल और पद्मभूषण रामनारायण अग्रवाल.

समाजसेवा :
समाजिक कार्य के क्षेत्र में तो देश के हर शहर, हर गांव, हर कस्बे में एक विख्यात अग्रवाल मिलेंगे. किंतु यहां चर्चा केवल उन चुनिंदा अग्रवालों की, जिनको समाजसेवा के क्षेत्र में पद्म सम्मान से विभूषित किया गया - पद्मश्री कैलाश चन्द्र अग्रवाल, पद्मश्री मामराज अग्रवाल, पद्मभूषण सीताराम सेकसरिया, पद्मश्री सुलोचना मोदी और पद्मविभूषण जानकीबाई बजाज.

प्रशासनिक सेवा, सार्वजनिक मामले और पर्यावरण :
कोविड 19 महामारी के दौरान भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की मीडिया ब्रीफिंग्स करने वाले प्रतिनिधि के रुप में लव अग्रवाल देश के विख्यात आईएएस हैं. भारतनेट और डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट की मुख्य आर्किटेक्ट अरुणा अग्रवाल दूरसंचार सचिव और बाद में राज्यसभा सदस्य रहीं.
डी. पी. अग्रवाल और विनय मित्तल संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं. सुभाष चंद्र गर्ग वर्ल्ड बैंक में कार्यकारी निदेशक रहे. आई पी एस सीमांत गोयल रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के प्रमुख रहे. केरल कैडर के आई ए एस अधिकारी एल. सी. गोयल केंद्रीय गृह सचिव रहे. प्रशासनिक सेवा और सार्वजनिक मामलों में पद्मश्री सुरजमल अग्रवाल, पद्मभूषण डॉ० लक्ष्मी मल्ल सिंघवी, विख्यात पर्यावरणविद पद्मभूषण अनिल कुमार अग्रवाल का नाम उल्लेखनीय है.

ये उदाहरण साबित करते हैं कि हमारी उड़ान केवल व्यापार तक सीमित नहीं है. कौन सा क्षेत्र है जहां अग्रवालों की धमक नहीं है? व्यापार से परे – राजनीति से साहित्य तक,
माउंट एवरेस्ट से राम मंदिर तक, अग्रवाल समाज ने भारत की यात्रा को गति और गौरव दोनों दिया है.


Friday, 10 January 2025

साक्षात्कार : संदीप मुरारका

प्रश्न : क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि वर्ग विशेष पर लिखकर आप पुरस्कार विजेताओं का वर्गीकरण कर रहे हैं?

संदीप : फलों के राजा आम की कई किस्में बाजार में उपलब्ध रहती है़- हाफूस, लंगड़ा, सिंदूरी, मालदा, चौसा, बंगनपल्ली, हिमसागर, दशहरी, बादामी, केशर, मनकुराड़ इत्यादि। आम की सभी प्रजातियाँ रसभरी हैं, सभी का अपना अपना स्वाद है़। किंतु किसी को लंगड़ा पसंद है़, तो किसी को सिंदूरी। उसी प्रकार पद्म पुरस्कार प्राप्त हर शख्शियत सम्मानित है़। किंतु बतौर पाठक सबके विषय में पढ़ पाना असंभव है़। अतः वर्गीकरण के आधार पर मैं इन प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनियों का एक नया पाठकवर्ग तैयार करने का प्रयास कर रहा हूँ।

प्रश्न : पद्म पुरस्कार विजेताओं की जीवनियों को लिखने के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है़?

संदीप : अपने देश में हर वर्ष हजारों छात्र छात्राएँ पीएचडी करते हैं। किंतु अधिंकाश के विषय समान हैं। जबकि आदिवासियों की संघर्ष गाथा बहुत कठिन है़, फूस के झोपड़े से निकलकर पुरस्कृत होने के लिए राष्ट्रपति भवन तक पहुँचने की कहानी को थीसिस में बदला जाए। मैं चाहता हूँ कि आदिवासियों में जो प्रेरक व्यक्तित्व हैं, उनपर शोध हो। इसके लिए जो बुनियादी जानकारी चाहिए, वो मेरी पुस्तकों में उपलब्ध है़। मेरी पुस्तकें शोधार्थियों के लिए नए द्वार खोले एवं संदर्भ पुस्तक बने, यही मेरा उद्देश्य है़।

प्रश्न : आप स्वयं ना डॉक्टरेट हैं, ना एमए, ना प्रोफेसर, ना शिक्षक, फिर भी आप लेखन कार्य कर रहे हैं। ऐसे में आपके लेखन की कितनी स्वीकार्यता होगी?

संदीप : क्या आपने कभी सुना है़ कि डॉ. गोस्वामी तुलसीदास या डॉ. कबीर या प्रो. सूरदास या प्रो. रहीम, नहीं ना। भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली गद्य-साहित्‍य का जनक माना जाता है, किंतु उन्होंने तो स्कूली शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी। ना प्रेमचंद एमए एमफिल थे और ना ही दिनकर। साहित्य पुरोधा मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी ने तो मैट्रिकुलेशन भी नहीं किया था।

मेरी पुस्तकों को पढें, आप पाएंगे कि कई ऐसे साहित्यकार हुए, जिनको पद्म सम्मान से विभूषित किया गया। किंतु वे ना तो डिग्री होल्डर हैं और ना कभी स्कूल कॉलेज जा पाए। यथा: पद्मश्री भीखुदान गोविंद भाई गढ़वी, पद्मश्री कवि दुला भाया काग, पद्मश्री बेनीचंद्र जमाटिया, पद्मश्री दादूदान गढ़वी, पद्मश्री पूर्णमासी जानी इत्यादि।

प्रश्न : आपको साहित्य सृजन की प्रेरणा कैसे मिली ?

संदीप : मेरे पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था, उनके पास हजारों पुस्तकें थी। गुरुदत्त की तो लगभग सारी पुस्तकें उनके संग्रह का हिस्सा थी। कहा जा सकता है़ कि मुझे पढ़ने की प्रेरणा बचपन में ही अपने पिता से मिली। मेरी प्रारंभिक शिक्षा जमशेदपुर के सबसे पुराने साहित्यिक केंद्र जगतबंधु सेवासदन पुस्तकालय द्वारा संचालित विद्यालय से हुई, सो मेरा जुड़ाव पुस्तकालय व वहाँ की साहित्यिक गतिविधियों से होता चला गया। वर्ष 1993 में मैंने मैट्रिकुलेशन किया, तबतक कविताओं से परिचय हो गया था। आकाशवाणी के विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागिता एवं पत्रकारिता का दौर प्रारंभ हो चुका था।

प्रश्न : पत्रकारिता !

संदीप : जी, पत्रकारिता। वर्ष 1993 -95 में लगभग डेढ़ साल तक मैंने दैनिक आज में बतौर पत्रकार कार्य किया। मेरे विषय थे सामयिक आलेख, साक्षात्कार, साहित्यिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिग। उन दिनों आकाशवाणी में एक कार्यक्रम आता था युवा वार्ता, मुझे कई बार उसके संचालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है़। उनदिनों पंद्रह मिनट के कार्यक्रम के पचहत्तर रुपए प्राप्त हुआ करते थे।

प्रश्न : वर्ष 1995 के बाद सीधे 2020 में पुस्तक, बीच में आप कहाँ खो गए?

संदीप : व्यवसायिक परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा भी झुकाव व्यवसाय की ओर बढ़ता चला गया। व्यवसाय और पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण लेखन कार्य भले ही बाधित हुआ, किंतु अध्ययन जारी रहा। जमशेदपुर पुस्तक मेले से प्रत्येक वर्ष मैं 8-10 पुस्तकें अवश्य खरीदता रहा हूँ। समय समय पर विभिन्न विषयों पर आर्टिकल्स भी लिखते रहा और स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होता रहा। ईश्वरीय प्रेरणा से वर्ष 2017 से मेरा मन पुराणों के अध्ययन में लगने लगा। श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, लवकुश चरित, विष्णु पुराण, शिव पुराण, वराह पुराण, देवी पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण इत्यादि कई धार्मिक ग्रंथो के अध्ययन से लेखन के प्रति मेरी रुचि जागृत हो गई।

प्रश्न : इसका मतलब आप हिंदूवादी धार्मिक विचारधारा के हैं?

संदीप : निश्चित तौर पर। मेरा जन्म सरस्वती पूजा बसंत पंचमी की रात्रि का है़। लेकिन यह कहना गलत होगा कि मैं हिंदूवादी हूँ। मैं सभी धर्मों का समान रुप से सम्मान करता हूँ। मेरी हाई स्कूल की शिक्षा सेंट मेरीज मिशनरी स्कूल से हुई है़। मेरा मानना है़ कि जो अनुशासन आप मिशनरीज में सीख सकते हैं वो और कहीं संभव नहीं है़।

साथ ही मैं यह भी जोड़ता हूँ कि हिंदू धर्म का जितना नुकसान हमारे धर्मगुरुओं व मठाधीशों ने किया है़, उतना किसी दूसरे ने नहीं किया। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 122 प्रमुख भाषाएँ हैं एवं 1599 अन्य बोलियाँ हैं। वहीं विश्व के 195 देशों में लगभग 7,117 भाषाएँ बोली जाती हैं। बीबीसी न्यूज के एक आर्टिकल के अनुसार भारत में लगभग 3,000 जातियाँ एवं 25,000 उपजातियाँ हैं। हर जाति के अपने नियम, अपनी धार्मिक परम्पराएं, अपने देवी देवता, अपने रीति रिवाज, अपनी मान्यताएँ और अपनी धार्मिक पुस्तक है़। भारत में प्रचलित ये धार्मिक पुस्तकें या तो उस धर्म को मानने वाले लोगों की अपनी निजी भाषा में उपलब्ध है, या बहुत हुआ तो हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और ओड़िया में प्रकाशित हुई है। अपने देश में एकमात्र "श्रीमद्भागवत गीता" ही ऐसा लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ है, जिसका अनुवाद लगभग 75 भाषाओं में हो पाया है। किंतु
चर्च ने अपने धार्मिक ग्रंथ "पवित्र बाइबिल" का अनुवाद विश्व की लगभग हर भाषा में करवाया। पूर्ण बाइबिल का अनुवाद विश्व की लगभग 704 भाषाओं में हो चुका है। वहीं इसके पदों एवं कुछ अंशो को 3,415 भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है। उसपर भी सबसे मुख्य बात कि यदि किसी को बाइबिल पढ़नी हो तो निःशुल्क उपलब्ध हो जाएगी। जबकि करोड़ रुपए खर्च कर आयोजित किए गए हिंदू धार्मिक कार्यक्रमों में भी आपको श्रीमद्भागवत गीता या श्रीरामचरितमानस निःशुल्क नहीं मिलेगी।

प्रश्न : आपकी विचारधारा क्या है़?

संदीप : स्वभावतः कहा जाए तो मैं लोहिया के विचारों से प्रभावित रहा हूँ। मैं स्वयं को समाजवादी मानता हूँ। किंतु वो समाजवाद जिसकी नींव श्रीराम ने रखी, शबरी के हाथों जूठे बेर खाए। वो समाजवाद जिसके प्रवर्तक महाराजा अग्रसेन रहे, जिन्होंने एक ईंट एक रुपया का सिद्धांत दिया। वो समाजवाद जिसके पैरोकार डॉ. राममनोहर लोहिया रहे। ना कि काशीराम, मायावती या आज की राजनीति वाला समाजवाद।

प्रश्न : साहित्यिक आयोजनों में आपकी उपस्थिति ना के बराबर रहती है़ ?

संदीप : ऐसा नहीं है़! मैं सामाजिक व्यक्ति हूँ, कई सामाजिक संगठनों में दायित्व पर हूँ। व्यवसाय व समाज के कार्यक्रमों के कारण व्यस्तता रहती है़। यदि किसी साहित्यिक कार्यक्रम में निजी तौर पर बुलावा रहता है़, तो अवश्य भाग लेता हूँ। हाँ यह बात सही है़ कि मैं बिना समुचित निमंत्रण किसी कार्यक्रम में नहीं जाता।

प्रश्न : आपने अधिकांश कविताओं में सरल और सहज शब्दों का प्रयोग किया है। क्यों ?

संदीप : भारीभरकम शब्द लिखने वाला ही साहित्यकार है़, यह सोचना गलत है़। आप गौर कीजिए कि बाबा नागार्जुन से लेकर कुमार विश्वास तक सरल एवं तुरंत समझ में आने वाले शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। मेरा पाठक किसी विभूति के विषय में यदि एक बार पढ़ ले, तो वह उस पर खुलकर चर्चा कर सके। इसीलिए मैंने असाधारण व्यक्तित्वों की जीवनियों को साधारण शब्दों में लिखा है़।

प्रश्न : क्या आपको लगता है़ कि साहित्य की इस विशाल दुनिया में आपकी पुस्तकें स्थान बना पाएँगी?

संदीप : क्यूँ बनाना है़ स्थान ! मैं अपनी पुस्तकों को संग्रहालय या पुस्तकालय का हिस्सा बनाने में इच्छुक नहीं।मेरी पुस्तकें तो शब्द रूपी "तर्पण" है समाज की उन विभूतियों का जिनके बहुमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा और "दर्पण" है वैसे जुझारु युवाओं के लिए जो लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि यूपीएससी की तैयारी करने वाला छात्र मेरी पुस्तक ढूंढकर पढ़े। मैं चाहता हूँ कि कॉलेज में आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिताओं में छात्र छात्राएँ मेरी पुस्तक से विषय उठाएँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी पुस्तक सामयिक पत्रकारिता में काम आए।


प्रश्न : साहित्य के क्षेत्र में आप स्वयं को कहाँ पाते हैं ?

संदीप : साहित्य का क्षेत्र खेल के मैदान में आयोजित दौड़ प्रतियोगिता तो है़ नहीं कि मैं किस स्थान पर आया। यह एक खूबसूरत बगीचा है़, जिसमें कहीं कहीं रिक्त भूमि खोजकर मैं भी दो चार पौधे लगाना चाहता हूँ। मेरे द्वारा लिखी पुस्तकों को संदर्भ ग्रंथ मानकर शोधार्थी पीएचडी करेंगे, ये मेरे लिए गर्व की बात है़। मेरी पुस्तकों में अंकित संघर्ष गाथाओं से प्रभावित होकर जिस दिन कोई युवा पद्म सम्मान प्राप्त करने राष्ट्रपति भवन की ड्योढ़ी तक जा पहुँचेगा, मैं समझूंगा मुझे समुचित पारिश्रमिक प्राप्त हुआ। 


प्रश्न : अपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?

संदीप : काव्य संग्रह आँख खोलती सुबह में प्रकाशित कविता 'दियासलाई', वर्ष 1993 में प्रकाशित इस पुस्तक के संपादक थे स्व. शैलेश पांडेय एवं कथाकार राकेश मिश्र।


प्रश्न : इन दिनों क्या लिख रहे हैं ?

संदीप : पुस्तक शिखर को छूते ट्राइबल्स के चौथे भाग पर कार्य जारी है़। साथ ही उसके भाग 1 एवं 3 के अंग्रेजी अनुवाद की भी तैयारी चल रही है़।

प्रश्न : आपकी पुस्तकों के संबंध में कोई विशेष बात, जो आप पाठकों तक पहुंचाना चाहें?
संदीप : पूरे देश में एकरूपता लाने हेतु केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण कर दिया गया है़। मैं प्रयासरत हूँ कि मेरा लेखन आईएस 16500 : 2012 के अनुसार हो। शिखर को छूते ट्राइबल्स भाग 3 एवं पद्म अलंकृत विभूतियाँ (मारवाड़ी/अग्रवाल) उसी पैटर्न पर लिखी गई हैं।


प्रश्न : आजकल पुस्तकों के पाठक कम होते जा रहे हैं, ऐसे में आपके मन में कभी यह नही आता कि क्यों लिखा जाए ?

संदीप : कम होते जा रहे हैं या बढ़ते जा रहे हैं? कल तक पूर्वोत्तर में कोई हिंदी बोलना नहीं चाहता था, आज वहाँ हिंदी पाँव पसार चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक हिंदी विश्व में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है़। ऐसे में सवाल उठता है़ कि इन हिंदीभाषियों तक अपनी पुस्तक कैसे पंहुचायी जाए। और इस प्रश्न का एक ही जवाब है़ कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो लीक से अलग हट कर हो।

प्रश्न : नवोदित साहित्यकारों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

संदीप : दो बात। पहला अध्ययन अवश्य करें, क्योंकि बिना पढ़े अच्छा लिखना संभव नहीं। दूसरा प्रतिदिन लिखें, चाहे एक ही वाक्य लिखें, पर अवश्य लिखें। लिखने की आदत नित्यकर्म जैसी होनी चाहिए, आदत छूटी, लिखना छूटा समझो। 

Monday, 5 February 2024

पद्म पुरस्कारों से अलंकृत राज्य झारखंड

पद्म पुरस्कारों की परंपरा वर्ष 1954 में प्रारंभ की गई थी. तब से लेकर आज तक कुल 50 भारत रत्न, 336 पद्म विभूषण, 1320 पद्म भूषण एवं 3531 पद्मश्री प्रदान किये जा चुके हैं. इनमें झारखंड की झोली में 3 पद्म भूषण और 29 पद्मश्री पुरस्कार आये हैं. वर्ष 1989 में टाटा स्टील के तत्कालीन चेयरमैन रुसी मोदी को व्यापार एवं उद्योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए देश के तीसरे सर्वोच्च पुरस्कार पद्म भूषण से नवाजा गया. वहीं 2018 में क्रिकेट के मैदान में झारखंड का परचम लहराने वाले कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धौनी को पद्म भूषण से अलंकृत किया गया, उन्हें
2009 में पद्मश्री पुरस्कार भी प्रदान किया जा चुका है. आठ बार सांसद रह चुके पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष एवं सादगी के प्रतीक आदिवासी नेता कड़िया मुंडा को वर्ष 2019 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. वर्ष 2010 में सामाजिक कार्यकर्त्ता व गांधीवादी शैलेश कुमार बंदोपाध्याय को पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया. हालांकि उनका नाम पश्चिम बंगाल की सूची में दर्ज है, किंतु उनका जन्म झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिला के चक्रधरपुर में हुआ था.

वर्ष 2024 के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची में जिला सरायकेला की चामी मुर्मू और जमशेदपुर की पूर्णिमा महतो का नाम शामिल है. चामी मुर्मू पर्यावरण कार्यकर्त्ता के रुप में लोकप्रिय हैं. पूर्व में इन्हें नारी शक्ति पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है. चामी मुर्मू ने 3000 महिला समूह बनाकर 30 हजार महिलाओं को स्वराेजगार से जोड़ा है. वे सरायकेला जिले के राजनगर प्रखंड भाग-16 की जिला परिषद सदस्य हैं. उन्होंने राजनगर के बगराईसाई में सहयाेगी महिला संस्था का गठन किया था. उनकी संस्था अब तक 720 हेक्टेयर भूमि पर लगभग 30 लाख पौधरोपण कर चुकी है. जिला पूर्वी सिंहभूम की पूर्णिमा महतो भारतीय तीरंदाजी टीम की कोच हैं. उन्होंने 1998 के राष्ट्रमंडल खेलों में एक रजत पदक जीता था. वे भारतीय राष्ट्रीय तीरंदाजी चैंपियनशिप भी जीत चुकी हैं. पूर्णिमा महतो को पूर्व में द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है, वे झारखंड की पहली महिला खिलाड़ी हैं, जिन्हें प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

हो भाषा के सरंक्षण व संवर्धन के लिये विगत कई दशकों से प्रयासरत रहे कोल्हान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं शिक्षाविद् डॉ. जानुम सिंह सोय को गत वर्ष 2023 में पद्मश्री से नवाजा गया. जनजातीय संस्कृति और जीवनशैली पर कलम चलाने वाले मूर्धन्य साहित्यकार प्रो. जानुम सिंह सोय ने 'हो लोकगीतों का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन' विषय पर पीएचडी की है. सोय पूर्वी सिंहभूम जिला के धालभूमगढ़ प्रखंड में निवास करते हैं. इसी जिला के चाकुलिया प्रखंड में रहने वाली पर्यावरणप्रेमी, बहादुर, समाजसेवी व कुशल संगठनकर्ता जमुना टुडू को पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. जमुना टुडू लेडी टार्जन के नाम से लोकप्रिय हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान मन की बात के 53वें एपिसोड में 24 फरवरी 2019 को जमुना टुडू के संघर्ष की कहानी पूरे राष्ट्र को सुनाई थी.

जिला पूर्वी सिंहभूम के करनडीह में अवस्थित लालबहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज (एलबीएसएम कॉलेज) के प्राचार्य रहे स्व. प्रो. दिगंबर हांसदा को वर्ष 2018 में पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया. सरल व सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले दिगंबर हांसदा ने कोल्हान विश्वविद्यालय का सिंडिकेट सदस्य रहते हुए शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में संताली को शामिल करने हेतु मजबूती से अपना पक्ष रखा. उन्होंने इंटरमीडिएट, स्नातक और स्नातकोत्तर के लिए संताली भाषा का कोर्स संगृहीत किया. स्कूल कॉलेज के पाठ्यक्रम में संताली भाषा की पुस्तकों को जुड़वाने का श्रेय प्रो. दिगंबर हांसदा को ही जाता है. शिक्षा के प्रति उनका रुझान व समर्पण ऐसा था कि सेवानिवृति के काफी समय बाद तक भी वे अपने कॉलेज में कक्षाएं लेते रहे, वह भी अवैतनिक, पूर्णतः निःशुल्क. केवल एक ही जज्बा था कि कैसे ज्यादा से ज्यादा बच्चों को संताली भाषा व ओलचिकि लिपि का ज्ञान दिया जा सके.

जल पुरुष के नाम से लोकप्रिय पर्यावरणविद पड़ाह राजा सिमोन उरांव को जल संरक्षण, जल संग्रहण, वन एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए 2016 में पद्मश्री से विभूषित किया गया. बाबा सिमोन उरांव रांची जिला के बेड़ो प्रखंड में रहते हैं. उन्होंने अपने
गांव के झरिया नाला के गायघाट के पास नरपतना में 45 फिट का बांध बनाया था. वह बांध अगले ही मानसून के दौरान तेज बारिश में बह गया. तब उन्होंने खक्सी टोला के निकट छोटा झरिया नाला में दूसरे नए बांध का निर्माण किया. उनके प्रयास से लघु सिंचाई योजना के अन्तर्गत हरिहरपुर जामटोली के निकट देशवाली बांध का निर्माण हुआ. साथ ही अगले कुछ वर्षों में अलग अलग प्रयासों में कई स्थानों में चेकडैम बने. आज उनके आस पास के गांवों में सब्जियों की भरपूर पैदावार होती है.

शिक्षाविद् , अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद्, समाजशास्त्री, साहित्यकार, अप्रतिम आदिवासी कलाकार , बांसुरी वादक, संगीतज्ञ, पूर्व राज्यसभा सांसद एवं बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी स्व. डॉ. आर. डी. मुंडा को वर्ष 2010 में देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया गया. विख्यात फिल्म गाड़ी लोहरदगा मेल के प्रेरणास्त्रोत डॉ. मुंडा कहते थे कि 'नाच गाना आदिवासी संस्कृति है, जब काम पर जाओ तो नगाड़ा लेकर जाओ और जब थकान हो जाए, काम से जी ऊबने लगे तो थोड़ी देर नगाड़ा बजाओ.' उनका मानना था कि 'पूरा देश मरुभूमि बनने के कगार पर है. केवल जहां जहां आदिवासी रहते हैं, वहीं थोड़ा जंगल बचा है. अतः यदि जंगल को बचाना है तो आदिवासियों को बचाना होगा.'
देशज पुत्र डॉ. मुंडा ने पूरी दुनिया के जनजातीय समुदायों को संगठित किया. प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाए जाने वाले विश्व जनजातीय दिवस की परंपरा को शुरू करवाने में उनका अहम योगदान रहा.

झारखंड के जनजातीय समुदाय के लोग ना केवल देश की विरासत और परंपराओं को सहेजे हुये हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सौंपने हेतु कटिबद्ध दिखते हैं. पारंपरिक
गीत संगीत, लोकनृत्य, वाद्ययंत्र, औषधीय ज्ञान, प्रकृति प्रेम, पुरखों के प्रति सम्मान और संगठन के प्रति समर्पण का ही नतीजा है कि आज देश भर का जनजातीय समुदाय काफी सशक्त हो चुका है. देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर जनजातीय महिला आसीन हैं, वे झारखंड की पूर्व राज्यपाल रह चुकी हैं. किंतु ऐसा नहीं है कि यहां कि सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को केवल आदिवासियों ने ही सहेज कर रखा है. इस समग्र विरासत को आगे बढ़ाने एवं समृद्ध करने में झारखंड के गैर आदिवासियों का भी अतुलनीय योगदान रहा है. रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय क्षेत्रीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष स्व. गिरधारी राम गोंझू को वर्ष 2022 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया. वे नागपुरी भाषा के विख्यात साहित्यकार थे. विद्वान लेखक गिरधारी राम गोंझू ने झारखंड की सांस्कृतिक विरासत, नागपुरी के प्राचीन कवि, झारखंड के लोकगीत, झारखंड के वाद्य यंत्र, सदानी नागपुरी व्याकरण, नागपुरी शब्दकोश, मातृभाषा की भूमिका, खुखड़ा-रगड़ी, ऋतु के रंग मंदार के संग, महाबली राधे का बलिदान, झारखंड का अमर पुत्र मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा, महाराजा मदरा मुंडा और अखरा निंदाय गेलक इत्यादि कई पुस्तकों का लेखन किया.

ठेठ नागपुरी संगीत व गीत की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कृतसंकल्पित मुकुंद नायक को वर्ष 2017 में कला एवं संगीत के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. वे पंचपरगनिया, बांग्ला, मुंडारी, कुडुख, नागपुरी, खोरठा जैसी स्थानीय भाषाओं में गीत गाते हैं. ज्यादातर स्वरचित गीत गाने वाले मुकुंद नायक एक विद्वान गीतकार, संगीतज्ञ, ढोलकिया, नर्तक, लोक गायक, प्रशिक्षक, नागपुरी लोक नृत्य झुमइर के प्रतिपादक एवं लोक संस्कृति के वाहक हैं.
झारखंड के सिमडेगा जिला के गांव बोक्बा में घासी जाति में जन्में मुकुंद नायक अपनी जाति का परिचय भी अपनी विशिष्ट शैली में देते हैँ - 'जहां बसे तीन जाइत, वहां बाजा बजे दिन राइत, घासी- लोहरा और गोड़ाइत.' 

नागपुरी गीतों के अप्रतिम लेखक मधु मंसूरी हंसमुख को वर्ष 2020 में पद्मश्री से विभूषित किया गया. झारखंड आंदोलन के दौरान उनके लिखे गीत गुंजयमान रहे हैं. 'गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं.....' गीत के रचयिता मधु मंसूरी हंसमुख रांची जिला के रातू प्रखंड के सिमलिया गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने नागपुरी भाषा में 300 से भी ज्यादा गीत लिखे हैं. उनके ज्यादातर गीतों में सामाजिक सरोकार के स्वर मुखर हैं. झारखंड की रॉक कला और जनजातीय भित्ति चित्रों पर गहन शोध व लेखन के लिए लोकप्रिय बुलु इमाम को वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.
जनजातीय कला एवं संस्कृति के सरंक्षण में उनका अद्वितीय योगदान है. उन्होंने हजारीबाग में संस्कृति संग्रहालय और आर्ट गैलरी की स्थापना की है. गुमला जिला के बिशुनपुर में आदिवासी समाज के उत्थान के लिए कार्यरत संस्था विकास भारती के सचिव बाबा अशोक भगत को 2015 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया.

झारखंड ने सबसे ज्यादा पद्मश्री पुरस्कार छऊ नृत्य कला में बटोरे हैं. जिला सरायकेला खरसावां का छऊ नृत्य विश्व प्रसिद्ध है. कहा जा सकता है कि छऊ नृत्य व मुखौटों के कारण ही देश के कला मानचित्र पर सरायकेला का नाम अंकित है. छऊ नृत्य एवं छऊ मुखौटा निर्माण की कला के सरंक्षण एवं संवर्धन के लिए समय समय सरायकेला के कई कलाकारों को पद्मश्री से पुरस्कृत किया जा चुका है. वर्ष 1991 में सरायकेला राजघराने के राजकुमार स्व. शुभेंदु नारायण सिंहदेव एवं वर्ष 2005 में छऊ नृत्य कला केंद्र के संस्थापक निदेशक स्व. गुरु केदारनाथ साहू को पद्मश्री सम्मान से पुरस्कृत किया गया. वर्ष 2006 में छऊ नृत्य के प्रतिपादक गुरु स्व. श्यामाचरण पति एवं वर्ष 2008 में छऊ नृत्य प्रशिक्षक गुरु स्व. मंगला प्रसाद मोहंती को पद्मश्री से विभूषित किया गया. वर्ष 2011 में छऊ नृत्य गुरु स्व. मकरध्वज दारोगा एवं छऊ नृत्य को बढ़ावा देने के लिए गठित संस्था त्रिनेत्र के संस्थापक स्व. पंडित गोपाल प्रसाद दुबे को वर्ष 2012 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया.
अपने परिवार की पांचवीं पीढ़ी के छऊ नर्तक शशधर आचार्या लगभग 50 देशों में छऊ नृत्य का प्रदर्शन कर चुके हैं, उन्हें वर्ष 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

सातों महाद्वीपों के शिखर पर चढ़ने का अद्वितीय साहस करने वाली भारत की पहली महिला प्रेमलता अग्रवाल को वर्ष 2013 में देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया. जमशेदपुर की रहने वाली प्रेमलता अग्रवाल ने दक्षिण अफ्रीका के किलीमंजारो, एशिया के माउंट एवरेस्ट, साऊथ अमेरिका के अकांकागुआ, यूरोप के एल्ब्रस, आस्ट्रेलिया के
क्रांसटेज पिरामिड, अंटार्कटिका के माउंट विनसन मैसिफ एवं नार्थ अमेरिका के डेनाली पर्वतों की चोटी पर तिरंगा लहरा कर पर्वतारोहण के क्षेत्र देश का मान बढ़ाया है.
वे माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ने वाली सबसे उम्रदराज भारतीय महिला पर्वतारोही होने का कीर्तिमान बना चुकी हैं.

खेल के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल करने वाली अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज दीपिका कुमारी को 2016 में पद्मश्री से विभूषित किया गया. राष्ट्रमंडल खेल में भारत की झोली में स्वर्ण पदक लाने वाली दीपिका अत्यंत निर्धन परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इनके पिता ऑटो चालक एवं माता नर्स हैं.
भारतीय तीरंदाजी के इतिहास में कई स्वर्ण रजत पन्नों को जोड़ने वाली दीपिका को अर्जुन पुरस्कार भी प्रदान किया जा चुका है. बॉडीबिल्डिंग के 80 किलो भार वर्ग में मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीत चुके प्रेमचंद डोगरा को वर्ष 1990 में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया था. भारतीय टीम एथलेटिक्स के पूर्व कोच बहादुर सिंह को वर्ष 1983 में पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया था. जमशेदपुर से जुड़े बहादुर सिंह शॉट पुट के खिलाड़ी रहे हैं, इन्होंने भारत की झोली में कई स्वर्ण और रजत पदक भरे. उनका मानना है कि 'झारखंड के प्रतिभावान खिलाड़ियों में काफी संभावनाएं हैं. सिर्फ उन्हें तराशने की आवश्यकता है. जब तक आप बच्चों को खेलों से नहीं जोड़ेंगे, तब तक हम बेहतर खिलाड़ी नहीं निकाल सकते.'

सरायकेला-खरसांवा जिले के बीरबांस गांव की रहने वाली छुटनी देवी महतो की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है. जादू टोना ओझा गुनी का मुखर विरोध करने वाली छुटनी देवी को डायन कह कर प्रताड़ित किया गया. उनके ऊपर मल मूत्र तक फेंके गए. ऐसे जुल्मों को सहन करने वाली
छूटनी देवी ने हार नहीं मानी और सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध लड़ती रहीं. उनके संघर्ष को तब मुकाम मिला, जब वर्ष 2021 में उन्हें रायसीना की पहाड़ी से बुलावा आया और राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री पदक प्रदान किया गया.

रांची के लालपुर की पैथ लैब में बैठ कर मरीजों का परचा लिखने वाले गुमनाम हीरो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी गरीबों से महज पांच रुपये फीस लेते हैं. रिम्स, रांची के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. मुखर्जी पिछले कई दशकों से रोजाना दो-तीन घंटे गरीब मरीजों का ईलाज करते आ रहे हैं. वे दवा कंपनियों से मिलने वाली सैंम्पल की मुफ्त दवाओं को भी जरुरतमंदों में बांट देते हैं. चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसे अद्वितीय व्यक्तित्व को वर्ष 2019 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया.

झारखंड की भूमि हिंदी पत्रकारिता के लिए भी काफी उर्वरा रही है. कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों का प्रकाशन इस धरती से होता है. इसी पत्रकारिता जगत से राज्य के वरिष्ठ पत्रकार बलबीर दत्त को वर्ष 2017 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. केंद्रीय मृदा और जल संरक्षण अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान , चंडीगढ़ के प्रमुख डॉ परशुराम मिश्रा को वर्ष 2000 में विज्ञान और इंजिनियरिंग के क्षेत्र में पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया था. राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल) एवं वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के निदेशक रहे धातुविज्ञानी स्व. बाल राज निझावन को वर्ष 1958 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

संदीप मुरारका 
(लेखक जनजातीय समुदाय के सकारात्मक पहलुओं पर लिखनेवाले कलमकार एवं व्याख्याता हैं.)
www.sandeepmurarka.com
9431117507

Tuesday, 26 September 2023

दायित्व निर्वहन : संदीप मुरारका

दायित्व निर्वहन -

साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थान :
सरंक्षक, संस्कार भारती, जमशेदपुर
पूर्व महासचिव, जगतबंधु सेवासदन पुस्तकालय
सदस्य, अखिल भारतीय साहित्य परिषद
सदस्य, सहयोग (बहुभाषीय साहित्यिक संस्था)
संस्थापक सदस्य, झारखंड राजस्थानी अकादमी, रांची
आजीवन सदस्य, सैल्यूलाइड चैप्टर
सदस्य, साहित्य धरा अकादमी, दुमका (सदस्यता संख्या SDA0384)

सामाजिक संस्थान -
अध्यक्ष, पूर्वी सिंहभूम जिला अग्रवाल सम्मेलन
सलाहकार, अग्रवाल समाज फाउंडेशन
उपाध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन, IVF
सदस्यता संख्या 066 16 03618
पूर्व कार्यसमिति सदस्य, राजस्थान युवक मंडल
सदस्यता संख्या G 174
पूर्व महासचिव, पूर्वी सिंहभूम जिला मारवाड़ी सम्मेलन
पूर्व अध्यक्ष, मारवाड़ी सम्मेलन, जुगसलाई शाखा
पूर्व अध्यक्ष, मारवाड़ी युवा मंच, जमशेदपुर शाखा
पूर्व प्रांतीय कार्यसमिति सदस्य, झा. प्रा. मा. यु. म.
पूर्व सचिव, राजस्थान सेवासदन हॉस्पिटल
ट्रस्टी सदस्य, श्री टाटानगर गौशाला
पूर्व अध्यक्ष, जायंट्स ग्रुप ऑफ जमशेदपुर
पूर्व फेडरेशन अध्यक्ष, जायंट्स वेलफेयर फाउंडेशन, ब्रांच 8
सरंक्षक सदस्य एवं पूर्व सचिव, भारतीय रेड क्रॉस सोसाईटी, जमशेदपुर
सह सरंक्षक, भारतीय रेड क्रॉस सोसाईटी, सरायकेला खरसावां
आजीवन सदस्य, कॉयंस कलेक्टर्स क्लब, जमशेदपुर
सदस्य, हिंद एकता मंच, जुगसलाई

धार्मिक संस्थान -
ट्रस्टी सदस्य, श्री राजस्थान शिव मंदिर, जुगसलाई
सदस्य, श्री बैकुंठ धाम मंदिर, महतो पारा, जुगसलाई
सदस्य, श्री सत्यनारायण मारवाड़ी ठाकुरबाड़ी ट्रस्ट, साकची
पूर्व अध्यक्ष, श्री श्री दुर्गे अखंड अखाड़ा, महावीर मंदिर, जुगसलाई
पूर्व अध्यक्ष, श्री सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति, नया बाजार, जुगसलाई

व्यवसायिक संस्थान -
सदस्य, सिंहभूम चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज
पूर्व क्षेत्रीय उपाध्यक्ष, फेडरेशन झारखंड चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज
सदस्य, आदित्यपुर स्मॉल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन
पूर्व सदस्य, सी आई आई, जमशेदपुर

Sunday, 1 January 2023

जनजातीय संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध भारतवर्ष



कहते हैं कि अपने देश की संस्कृति हजारों साल पुरानी है, लेकिन इतिहासकारों ने संस्कृति के असल संवाहको के साथ न्याय नहीं किया। मेरा मानना है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की सबसे बड़ी संवाहक हैं यहां की विभिन्न जनजातियां, जो स्वयं में इतिहास की उन अनकही कहानियों को समेटे हुए हैं, जिन्हें कलमबद्ध नहीं किया जा सका। भारत के विभिन्न राज्यों में फैली इन जनजातियों ने ना केवल पौराणिक संस्कृति और परंपराओं को कायम रखा है बल्कि आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में भी सांस्कृतिक विरासतों को सहेज रखा है।

जब भी हम आदिवासियों की बात करते हैं, तो नामचीन साहित्यकारों द्वारा बताया जाता है कि उनकी दुनिया हाशिए पर है, वे भूखे नंगे वंचित हैं, वे शहर कस्बे की बजाए पेड़ पौधे, नदी तालाब, पहाड़ कंदराओं और जंगलों में रहते हैं, वे दुनिया की तमाम आधुनिक सुख सुविधाओं से महरूम हैं और समाज की मुख्यधारा से अलग विचरते हैं। किंतु वास्तविकता में ऐसा नहीं है। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जिसमें जनजातियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा ना की हो। जनजातीय संस्कृति सदैव से समृद्ध व समुन्नत रही है। झारखंड, बिहार और ओड़िशा के जनजातीय समुदाय की परंपराओं और संस्कृति से तो हम गाहे बेगाहे अवगत होते रहते हैं, चलिये आज बात करते हैं देश के अन्य राज्यों की, जहां के जनजातीय लोग स्वदेशी संस्कृति और विरासत को मजबूत करने में जुटे हैं।

त्रिपुरा -
त्रिपुरा की एक जनजाति है रेयांग (ब्रू), जिनकी संस्कृति उनके प्रसिद्ध लोकनृत्य 'होजागीरी' में परिलक्षित होती है। इस सामूहिक नृत्य में 4- 6 युवतियां  सिर पर पारंपरिक बोतल 'बोडो' और हाथ में मिट्टी के पारंपरिक दीपक 'कूपी' लेकर नृत्य करती हैं। साथ ही पुरुष पवन वाद्ययंत्र 'सुमी' बजाते हुए गायन करते हैं। वर्ष 2021 में देश की इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिये रेयांग जनजाति के विख्यात लोकनृत्य गुरु माइत्याराम (सत्यराम) रेयांग को पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया।

कहते हैं कि परंपराएं समुदायों का इतिहास बताती हैं और ऐसी ही एक पुरातन संगीत परंपरा के वाहक हैं त्रिपुरा की डारलोंग जनजाति के 102 वर्षीय थांगा डारलोंग, जिन्होंने ना केवल पारंपरिक वाद्य यंत्र 'रोजेम' को संरक्षित किया है,  बल्कि अपने समुदाय के युवाओं को उसमें पारंगत भी कर रहे हैं। रोजेम बांस का बना एक वाद्य यंत्र होता है। थांगा डारलोंग जब उसपर धुन छेड़ते हैं तो लोगों के पांव थिरकने लगते हैं। वर्ष 2019 में भारत सरकार ने उनको देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया।

जमाटिया जनजाति के स्व. बेनीचंद्र जमाटिया त्रिपुरा की एक आध्यात्मिक विभूति थे, उन्होंने कोकबोरोक भाषा में 
भगवान श्रीकृष्ण पर आधारित असंख्य भक्ति गीतों की रचना की। फूलों को एकत्रित कर माली जिस प्रकार माला गूंथता है, उसी प्रकार शब्दों को पीरोकर बेनीचंद्र ने लैटिन अंग्रेजी एवं कोकबोरोक भाषा में एक पुस्तक को आकार दिया। वे स्वनिर्मित 'तीन तारा वाद्ययंत्र' बजा कर अपनी रचनाओं का गायन भी किया करते थे। वर्ष 2020 में जनजातीय संस्कृति के संवाहक बेनीचंद्र जमाटिया को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

गुजरात -
सूरत शहर से जुड़े लोगों के सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है 'डायरो', जो वहां की एक लोक संगीत परंपरा है, जिसमें कलाकार लोक कथाएं गाते हैं। अपनी आवाज के चुंबकीय आकर्षण से लोगों को खींचने वाले चारण जनजाति के भीखुदान गोविंद भाई गढ़वी ने डायरो लोकगीतों की एक अशेष श्रृंखला निर्मित की है, जिसमें 350 से ज्यादा ऑडियो एल्बम होंगे। भीखुदान भाई की लोकप्रियता का आलम यह है कि गुजराती भाषा व साहित्य का कोई सार्वजनिक कार्यक्रम हो और वहां उनकी मौजूदगी ना हो, ये हो नहीं सकता। वर्ष 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया है।

चारण जनजाति के अप्रतिम गीतकार कवि काग को संत मोरारी बापू ने एक नया नाम दिया है - 'काग ऋषि'। वर्ष 1962 में पद्मश्री से अलंकृत भगत बापू और काग बापू के नाम से विख्यात कवि दुला भाया काग को इस सदी के वाल्मीकि की संज्ञा दी जा सकती है। आम बोलचाल की भाषा में कविताएं लिखने वाले भगत बापू कहा करते थे कि "कवि की कविता और धनुष का बाण, यदि दिल में ना उतरे, तो उसका उपयोग कैसा?"

वर्ष 1990 में कला के क्षेत्र में पद्मश्री से विभूषित भील जनजाति की पार्श्वगायिका दिवालीबेन पुंजभाई भील को 'गुजरात की कोयल' कहा जाता है। जीवन के प्रारंभिक संघर्ष के दिनों में एक दवाखाना में साफ सफाई का काम करने वाली दिवालीबेन ने भजन व लोकगीत गायन में विश्वभर में ख्याति प्राप्त की। उन्होंने ना जाने कितनी ही फिल्मों में पार्श्व गायिका के रुप में गीत गाए और उनके कई आडियो एल्बम रिलीज हुए। सदैव पारंपरिक वेशभूषा में रहने वाली, सादगी की प्रतिमूर्ति, देश विदेश में हजारों कन्सर्ट कर चुकी महान लोक कलाकार पार्श्वगायिका पद्मश्री दिवाली बेन की साड़ी का पल्लू भी कभी सर से नीचे नहीं सरका। ऐसे महान जनजातीय लोककलाकारों से ही भारतवर्ष का हर हिस्सा सांस्कृतिक और पारंपरिक रुप से समृद्ध है।

तेलंगाना -
तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कोया आदिवासी समुदाय की विलुप्त हो रही कला 'कंचुमेलम-कंचुथलम' को पुनर्जीवित करने वाले साकीनी रामचंद्रैया एक मुखर लोक गायक और ढोल वादक हैं। कोया कलाकार रामचंद्रैया ने आदिवासी योद्धाओं एवं पुरखों की कहानियां कहते गीतों का एक वृहत संग्रह तैयार किया है। वर्ष 2022 में पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक रामचंद्रैया अपने गीतों के जरिये जनजातीय समुदाय के इतिहास को नई पीढ़ी को सौंपने एवं देश की संस्कृति को समृद्ध करने का महान कार्य कर रहे हैं।

मोर पंख, हिरण के सींग, बकरी के खाल की पगड़ी, कृत्रिम दाढ़ी- मूंछें, शरीर पर राख और रंग बिरंगी पोशाकों से सजे हुए कलाकार दीपावली के समय जब 'गुस्सादी नृत्य' प्रस्तुत करते हैं, तो विदेशी पर्यटकों का जमावाड़ा लग जाता है। ऐसा लगता है मानो अपने देश की संस्कृति कितनी समृद्ध है जिसे देखने विदेशी भी आतुर रहते हैं। इसी 'गुस्सादी' नृत्य शैली के संवर्द्धन का श्रेय जाता है तेलंगाना की राजगोंड़ जनजाति के लोक नर्तक कनक राजू को, जिन्हें वर्ष 2021 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

महाराष्ट्र -
महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध वरली चित्रकार जिव्या सोमा माशे को वर्ष 2011 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने 1200 साल पुरानी वरली आदिवासी चित्रकला में इतनी ख्याति बटोरी है कि राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पेंटिंग्स की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मभूषण डा. रामकुमार वर्मा उन जैसे चित्रकारों के लिए ही कहा करते थे - "कवि और चित्रकार में भेद है। कवि अपने स्वर में तथा चित्रकार अपनी रेखा में जीवन के तत्व और सौंदर्य के रंग भरता है।"

सिक्किम -
सिक्किम की थांका चित्रकला को नई पहचान दिलाने वाले कलाकार उस्ताद खांडू वांगचुक भूटिया 350 से अधिक लोगों को थांका पेंटिंग्स, लकड़ी पर नक्काशी और कालीन बुनाई का प्रशिक्षण दे चुके है। सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में प्रचलित कपास या रेशम पर बनी हुई थांगका पेंटिंग में भगवान बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के साथ-साथ अन्य देवताओं एवं बोधिसत्व को दर्शाया जाता है। थांका चित्रकला को देश-विदेश में नई पहचान दिलाने वाले भूटिया जनजाति के वांगचुक भूटिया को वर्ष 2022 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया है। 

सिक्किम सरकार के सांस्कृतिक मामलों व विरासत विभाग में कार्य करते हुए श्रीमती हिलदामित लेपचा ने अनेकों राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लिया।
भूटिया एवं नेपाली लोकगीत गायिका हिलदामित लेपचा
तुनबुक, सुतसंग, पालित केंग, नाईम ब्रीयोप पालित, तुंगदारबोंग जैसे कई प्रकार के पारंपरिक वाद्ययंत्र बजा लेती हैं। वे एक बेहतरीन लोक गायिका, संगीतकार, गीतकार, कवि, निबंधकार और नाटककार हैं, जिनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं और लोकगीतों के एल्बम रिलीज हुए। देश की जनजातीय परंपरा को सहेजने व समुन्नत करने हेतु लेपचा जनजाति की हिलदामित लेपचा को वर्ष 2013 में पद्मश्री से विभूषित किया गया था।

अपने प्रशंसकों के मध्य रोंग लापोन यानी लेपचा मास्टर के नाम से लोकप्रिय सोनम शेरिंग को "लेपचा संस्कृति" के पुनरुद्धार का श्रेय जाता है। वे कहते थे कि 'जिस प्रकार तारे कभी धरती पर नहीं गिर सकते, वैसे ही लेपचा संस्कृति कभी लुप्त नहीं हो सकती।' सोनम शेरिंग को सिक्किम के संगीत वाद्ययंत्रों पर किए गए शोध के लिए पहचाना जाता है।उन्होंने सदियों पुराने रिकॉर्ड संकलित किए और लेपचा वाद्ययंत्रों पर शोध कार्य किया। उनके द्वारा स्थापित लेपचा म्यूजियम में लेपचा समुदाय की जीवनशैली, संस्कृति और परंपराओं को संजोंने का अद्भुत काम किया गया है। वर्ष 2007 में उन्हें देश का चौथा सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री प्रदान किया गया।

पश्चिम बंगाल -
यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में भारत की 14 धरोहरों को अंकित किया गया है, जिनमें पुरुलिया का विश्वविख्यात छऊ नृत्य भी एक है। जिसके संवर्द्धक व प्रतिपादक भूमिज जनजाति के विख्यात छऊ नर्तक गंभीर सिंह मुडा को वर्ष 1981 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों के अलावा लंदन, फ्रांस, जापान एवं यूसए में भी  जनजातीय नृत्य कला का प्रदर्शन किया और स्वदेशी सांस्कृतिक विरासत को विदेशी मंचों तक पहुंचाया था।

असम -
बोड़ो संस्कृति की रक्षा के लिए सतत प्रयत्नशील डॉ. कामेश्वर ब्रह्मा को वर्ष 2016 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री पदक से सम्मानित किया गया। जनजातीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर साहित्य का सृजन करने वाले
बोड़ो जनजाति के डॉ. कामेश्वर ब्रह्मा ने बोड़ो समुदाय के बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए अतुलनीय प्रयास किए। डॉ. ब्रह्मा ने बोड़ो भाषा एवं साहित्य के प्रति समर्पित संस्था बोड़ो साहित्य सभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हुये  अपने कार्यकाल में जनजातीय संस्कृति पर किए गए शोध कार्यों पर आधारित कई पुस्तकें प्रकाशित की।


मेघालय -
पाश्चात्य संगीत जैज़ में पारंगत नील हर्बर्ट नोंगकिंरिह विख्यात पियानोवादक हैं। शिलांग चैंबर चॉयर के संस्थापक
नील हर्बर्ट अंतरराष्ट्रीय मंचो पर विश्वविख्यात द लंदन कॉन्सर्टेंट और द वियना चैंबर ऑर्केस्ट्रा के साथ मिलकर कई कार्यक्रम कर चुके हैं। स्वदेशी संस्कृति को मजबूत करने का एक अप्रतिम उदाहरण पेश करते हुये मेघालय की मूल भाषा खासी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से नोंगकिंरिह ने स्थानीय लोककथा पर आधारित एक गानबद्ध नाटक 'ओपेरा - सोहलिंगंगेम' लिखा और उसे संगीतमय किया, जो काफी लोकप्रिय हुआ। खासी जनजाति के विख्यात पियानोवादक नील हर्बर्ट नोंगकिंरिह को वर्ष 2015 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

अपने सुमधुर खासी गीतों के माध्यम से समाज को संदेश देने वाले संगीतकार स्केनड्रोवेल सियमलियेह अपने चार तार वाले वाद्ययंत्र 'दुईतारा' की मधुर ध्वनि और भावपूर्ण गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे। स्केनड्रोवेल सियमलियेह दुईतारा, वायलिन और गिटार के साथ खासी भाषा के गीतों में अपने समुदाय का इतिहास, पुरखों के किस्से, लोककथाएं, मूल मिथक और लोकगीत सुनाया करते थे। वे ना केवल गीतकार और संगीतकार बल्कि एक इतिहासकार भी थे, जिन्होंने खासी समुदाय के लुप्तप्राय इतिहास का सरंक्षण व संवर्द्धन किया। खासी जनजाति के अद्वितीय गीतकार स्व. स्केनड्रोवेल सियमलियेह को वर्ष 2009 में पद्मश्री से विभूषित किया गया।

नागालैंड -
स्वदेशी संस्कृति और विरासत को बचाने में जनजातियों का क्या योगदान है, यह रानी गाईदिन्ल्यू की स्टोरी पढ़कर समझा जा सकता है। नागाओं के कबीलों में एकता स्थापित कर संयुक्त मोर्चा बना कर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने वाली वीर रानी गाईदिन्ल्यू की निर्भीकता एवं ओजस्विता के कारण जनजातीय समुदाय में उन्हें देवी का दर्जा दिया जाता है। किंतु पीड़ा का विषय यह है कि आजाद भारत में भी उन्हें कई वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे और कई वर्षों तक भूमिगत रहना पड़ा। नागालैंड की लक्ष्मी बाई, पहाड़ियों की बेटी, रानी मां, जननेता, स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेविका रानी गाईदिन्ल्यु 'हेराका संस्कृति' के सरंक्षण के लिए जीवनपर्यंत समर्पित रहीं। यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में उनकी जनशताब्दी पर रुपए 5 एवं 100 के सिक्के जारी किए। रोंगमेई नागा (काबुई) जनजाति की रानी गाईदिन्ल्यू को वर्ष 1982 में पद्मभूषण से विभूषित किया गया था।

मध्यप्रदेश -
जिस भारत भवन के निर्माण के समय भील जनजाति की भूरी बाई बरिया ने बतौर मजदूर छः रुपए दिहाड़ी पर ईंटें ढोयी और पसीना बहाया, आज वहां के जनजातीय संग्रहालय में उनकी पेंटिंग लगी हुई है। उन्होंने पिथौरा चित्रकारी को ना केवल देश में बल्कि विदेशों में पहचान दिलवाई। विख्यात पिथौरा चित्रकार भूरी बाई बरिया
महान व पुरातन भील जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहीं हैं। महामहिम राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2021 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

यूके, जर्मनी, हालैंड, रूस, नीदरलैंड, इटली इत्यादि देशों की आर्ट गैलरी में गोंड पेंटिंग्स की धूम मचाने वाले भज्जू श्याम के कारण पाटनगढ़ गांव की तस्वीर बदल चुकी है। वहां के अधिकांश लोगों की आजीविका का मुख्य साधन गोंड पेटिंग बन चुकी है। चित्रकला के व्यवसाय से समृद्व हुए इस गांव में तकरीबन 100 परिवार और भोपाल में 40 कलाकार गोंड़ पेंटिंग्स बना रहे हैं। ब्रिटिश संस्कृति का प्रतिबिंब देशी मिजाज में अपने कैनवास पर उकेरने वाले गोंड कलाकार भज्जू श्याम की कलाकृतियां दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। गोंड - परधान जनजाति के विश्वविख्यात गोंड कलाकार व लंदन जंगल बुक के आर्टिस्ट भज्जू श्याम को कला के क्षेत्र में वर्ष 2018 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

राजस्थान -
कल्पना कीजिये कि जो लड़की पैदा होते ही रेत में दफना दी गई, किंतु कुदरत ने उसे जीवित रखा। आगे चलकर अपने ही लिखे गानों को खुद ही गाने वाली और उन पर नृत्य करने वाली उसी लड़की गुलाबो सपेरा ने ऐसी ख्याति पाई कि डेनमार्क, ब्राजील, यूएसए, जापान, यूके इत्यादि 165 देशों में उनके कार्यक्रम आयोजित हो चुके हैं। नृत्य संगीत में वैश्विक पहचान बनाने वाली गुलाबो ने प्रसिद्ध फ्रांसीसी संगीतकार थियरी ’टिटी’ रॉबिन के साथ एसोसिएट होकर कई कार्यक्रम किए। विश्व फलक पर पारंपरिक कालबेलिया नृत्य की पहचान स्थापित करने वाली गुलाबो सपेरा ने कई हिंदी फिल्मों में नृत्य किया। उनका मानना है कि 'स्टेज ही उनके लिए मंदिर है और दर्शक ही उनके भगवान हैं।' कालबेलिया जनजाति की अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नृत्यांगना
गुलाबो सपेरा को उनके सांस्कृतिक अवदान के लिए वर्ष 2016 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

छत्तीसगढ़ -
तानपुरा लेकर मंच पर एक कोने से दूसरे कोने तक घूमते हुए लोक गायिका तीजन बाई जब एक विशेष संवाद शैली में पंडवानी अर्थात पांडवों की कथा सुनाती हैं और पौराणिक कथाओं को वर्तमान किस्सों से जोड़ देती हैं, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो स्वयं को उस कहानी का पात्र समझने लगते हैं। संगीत साधक तीजन बाई विदेशों में भारत की सांस्कृतिक राजदूत हैं। वे जापान, जर्मनी, इंग्लैड, स्विट्जरलैंड, इटली, रूस, चाईना इत्यादि चालीस से ज्यादा देशों में इस गौरवशाली जनजातीय कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं। परधान (गोंड) जनजाति की पंडवानी लोक गीत-नाट्य की विख्यात महिला कलाकार डॉ. तीजन बाई को देश की संस्कॄति को समृद्ध करने हेतु किये गये अविस्मरणीय योगदान हेतु वर्ष 2019 में पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया।

अरुणाचल प्रदेश -
देश की विरासत को नई पीढ़ी को सौंपने के क्रम में किये जा रहे कार्यों की सूची में जबतक शेरदुकपेन जनजाति के येशे दोरजी थोंगछी के योगदान की चर्चा ना हो, यह सूची पूर्ण नहीं हो सकती। पूर्वोत्तर में सबसे लंबे समय तक उपायुक्त पद पर आसीन रहने वाले येशे दोरजी थोंगछी पूर्वोत्तर के पहले लेखक हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जनजातीय समुदायों की आंतरिक कहानियों से बाहरी दुनिया को परिचित करवाया है। साहित्य सुधी येशे ने सरल भाषा व हृदय को छूती संवाद शैली में कई नाटकों का लेखन किया। कलमकार येशे ने जनजातीय परंपरा के अंतर्गत बहु पति (एक से अधिक पति), पुनर्विवाह, विधवा विवाह, पुर्नजन्म, आंचलिक संस्कृति जैसे कई अनछुए पहलूओं पर कलम चलाई। इनकी कहानियों पर कई फिल्में बनी, जिनको राष्ट्रीय अवॉर्ड्स भी मिले। आदिवासी मुद्दों पर लिखने वाले असमिया उपन्यासकार येशे दोरजी थोंगछी को वर्ष 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

कर्नाटक -
भारत का प्राचीन इतिहास गवाह है कि हमारी विरासतें ना केवल गीत संगीत में बल्कि पेड़ पौधे जंगलों पहाड़ों में भी बिखरी पड़ी हैं। संजीवनी बूटी हो या बाबा रामदेव की आयुर्वेदिक दवाईयां, सबका मूल जंगलों में ही है। जंगलों में बिखरे ज्ञान का जितना भान जनजातियों को है, शायद ही अन्य किसी को हो। हक्काली जनजाति की 78 वर्षीय पर्यावरणविद् तुलसी अम्मा उर्फ तुलसी गौड़ा ‘जंगलों की एनसाइक्लोपीडिया’ के रूप में कर्नाटक में विख्यात है। वे पिछले 60 वर्षो में एक लाख से ज्यादा पौधे लगा चुकी हैं। तुलसी अम्मा को पेड़ पौधों की विभिन्न प्रजातियों का  व्यापक ज्ञान है। जल, जंगल और जीवन के सरंक्षण के लिए संकल्पित जनजातीय समुदाय के लिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि 'जंगल हैं तो आदिवासी हैं, और आदिवासी हैं तभी जंगल हैं।' जंगल के जीवंत ज्ञानकोष तुलसी गौड़ा को वर्ष 2020 में पद्मश्री से विभूषित किया गया।

कन्नड़ भाषा व साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ. डोड्डारंगे गौड़ा शब्द शिल्पी हैं, जो फिल्मी गानों के बोल लिखते समय ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो कानों से उतरकर होठों पर आ जाए और लोगों के मन मस्तिष्क पर छा जाएं। उन्होंने कन्नड़ फिल्मों के लिए 500 से अधिक गीत रचे। डॉ. गौड़ा ने फिल्मों के लिए संवाद एवं सौ से अधिक टेली-धारावाहिकों की पटकथाएं लिखी। कर्नाटक विधान परिषद् के मनोनीत सदस्य रहे डॉ. गौड़ा ने विपुल लेखन कार्य किया। उनकी 80 से ज्यादा साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं और कई ऑडियो एलबम रिलीज हुए। भारतीय साहित्य को समृद्ध करने वाले
गौड़ालु जनजाति के विख्यात फिल्मी गीतकार डॉ. डोड्डारंगे गौड़ा को वर्ष 2018 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

जनजातीय संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध भारतवर्ष में
हर विषय पर गीत हैं, जन्म से लेकर शादी तक, सालगिरह से लेकर मृत्यु तक, हर त्योहारों पर, रोजमर्रा के कामों में जैसे पानी लाना हो या जलावन की लकड़ी, खेतो में काम करने के दौरान, यानि हर अवसर पर गीत गाये जाते हैं। इस विरासत को संभाल कर अगली पीढ़ी को सौंपने के अप्रतिम कार्य में जुटी हैं हल्लाकी जनजाति की लोक गायिका सुकरी बोंमागौड़ा, जो स्वयं में एक गीत बैंक है। खेतों में मजदूरी करने वाली सुकरी बोंमागौड़ा सुर कोकिला सुकरी अज्जी के नाम से विख्यात हैं। वर्ष 2017 में उनको पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

केरल -
कहते हैं कि भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास उतना ही पुरातन है जितनी स्वयं प्रकृति, हमारे पौराणिक ग्रंथों एवं वेदों में भी चिकित्सा और सर्जरी के जिक्र हैं। इन्हीं पुरातन विरासतों को आज भी किसी ने सहेज कर रखा है तो वे हैं जनजातीय समुदाय के लोग। केरल के तिरुवनंतपुरम के कल्लार जंगलों में रहने वाली कानीकर जनजाति की लक्ष्मीकुट्टी वहां 'वनमुथास्सी' के नाम से विख्यात है, इस मलयालम शब्द का हिंदी अर्थ है - 'जंगल की दादी'। लुप्तप्राय होती जा रही पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की ज्ञाता लक्ष्मीकुट्टी अपने झोंपडे में 500 से ज्यादा तरह की हर्बल दवाईयां तैयार करती हैं। सांप काटने के बाद उपयोग की जाने वाली दवाई बनाने में तो उनको महारत हासिल है। उनके चमत्कारिक चिकित्सकीय ज्ञान का लाभ लेने विदेशी भी कल्लार पहुंचते हैं। 'पॉइजन हीलर' लक्ष्मीकुट्टी ने वनों में छिपी प्राकृतिक संपदा के औषधीय मूल्यों पर एक पुस्तक भी लिखी है। वर्ष 2018 में उनको देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से विभूषित किया गया।

मणिपुर -
भारत के कोने कोने में सांस्कृतिक विरासतें बिखरी पड़ी हैं, कुछ नष्ट हो चुकी हैं, कुछ नष्ट होने के कगार पर है। किंतु यदि कहीं कोई इन विरासतों को सहेजने में सजग है तो वो है आदिवासी समुदाय। इसी क्रम में मणिपुर की तांगखुल जनजाति की संगीत परंपरा के अंतर्गत एक विशेष नागा वाद्ययंत्र 'यंगकहुई' बजाया जाता है, जिसमें चार छेद होते हैं। बांस द्वारा निर्मित यह पारंपरिक बांसुरी लगभग तीन फीट लंबी एवं बहुत पतली होती है और उसमें घोड़े की पूंछ के बालों से बने तार होते हैं। इस परंपरा को पुनर्जीवित करने वाले गुरु रेवबेन माशंग्वा एक प्रतिभाशाली गायक एवं संगीतकार होने के साथ साथ लोक संगीत शोधकर्ता और वाद्ययंत्र निर्माता भी हैं। विदेशी संगीत की तर्ज पर उन्होंने ब्लूज और बल्लाड रिदम पर आधारित कई नागा आदिवासी लोकगीत तैयार किए हैं। वर्ष 2021 में तांगखुल नागा जनजाति के विख्यात लोक गायक व संगीतज्ञ गुरु रेवबेन माशंग्वा को पद्मश्री से अलंकृत किया गया।

ये तो कुछेक उदाहरण हैं, ऐसे हजारों महान जनजातीय लोगों से हमारा देश का कोना कोना पटा पड़ा है, जो ना केवल देश की विरासत और परंपराओं को सहेजे हुये हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सौंपने हेतु प्रयासरत हैं।  स्वदेशी संस्कृति और विरासत को मजबूत करने में जो भूमिका जनजातीय समुदाय अदा कर रहा है, उसका अंश मात्र भी राज्य सरकारें नहीं कर पा रही हैं। जनजातीय समुदाय के गीत संगीत, लोकनृत्य, औषधीय ज्ञान, प्रकृति प्रेम का ही नतीजा है कि हमारा भारतवर्ष संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध है।

संदर्भ सूची :
1. व्यक्तिगत साक्षात्कार
2. आलेख में अंकित पात्रों के क्षेत्र के स्थानीय निवासियों से वार्तालाप के आधार पर
3. आलेख में अंकित पात्रों के सोशल मीडिया पृष्ठ
4. यूट्यूब पर उपलब्ध संबंधित पात्र के इंटरव्यूज
5. भारत सरकार की वेबसाईट
क. www.padmaawards.gov.in
ख. गृह मंत्रालय की वेबसाईट
ग. विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों की वेबसाईट
घ. विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों/राज्यपालों के सोशल मीडिया पृष्ठ एवं राज्यों की ऑफिशियल वेबसाईट

Key Words - जनजातीय समुदाय, जनजाति, पद्मश्री, आदिवासी संस्कृति, जनजातीय परंपरा, जनजातीय लोककला

लेखक संदीप मुरारका जनजातीय समुदाय के सकारात्मक पहलुओं पर लिखनेवाले कलमकार एवं शोधकर्ता हैं।