*झारखंड : महाभारत की जीवित स्मृतियाँ*
झारखंड को केवल खनिज संपदा और प्राकृतिक वनों की धरती के रूप में जाना जाता है, किंतु इसकी सांस्कृतिक परतें इससे कहीं अधिक गहरी हैं. महाभारत की कथाओं और लोकविश्वासों के आधार पर पांडवों का इस भूभाग में दो बार आगमन हुआ. पहली बार, जब वे लाक्षागृह से बचकर गुप्त रूप से छुपते-छुपाते आए और झारखंड होते हुए एकचक्र नगरी, अर्थात वर्तमान आरा (बिहार) पहुँचे, जहाँ से वे पांचाल देश की राजधानी काम्पिल्य (वर्तमान फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश) की ओर अग्रसर हुए. इस यात्रा में माता कुंती उनके साथ थीं। इसी यात्रा के दौरान भीम का विवाह हिडिंबा के साथ हुआ.
दूसरी बार वे तेरह वर्षीय वनवास के दौरान पुनः झारखंड पहुँचे. इस बार द्रौपदी उनके साथ थीं. वनवास काल में जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के अपहरण का प्रसंग और घटोत्कच की सहायता इस क्षेत्र की लोककथाओं में आज भी जीवित है.
ये दोनों कथाएँ सर्वविदित हैं, किंतु महाभारत के मूल ग्रंथ में वन-यात्रा का सटीक भूगोल स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं मिलता. तथापि लोक परंपरा मार्ग की संभावित रेखा को प्रतिलक्षित करती है. स्कन्दपुराण एवं अन्य ग्रंथों में कड़ियों को जोड़ने पर मार्ग की रूपरेखा क्रमशः स्पष्ट होती प्रतीत होती है.
पौराणिक काल में राम का वनवास हो या पांडवों की वनयात्रा — ये प्रायः नदियों के किनारों पर संपन्न हुईं. इसके पीछे अनेक कारण थे. प्राचीन समय में यात्रा के दौरान पेयजल, भोजन और नित्यक्रिया के लिए जल स्रोतों के समीप रहना आवश्यक था. नदियाँ प्राकृतिक दिशासूचक का कार्य करती थीं, जिससे यात्रा अपेक्षाकृत सरल हो जाती थी. नदी तटों पर ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम स्थित थे, जहाँ पांडव विश्राम करते और संतों से सत्संग तथा आशीर्वाद प्राप्त करते थे.
वनवास यात्रा के दौरान पांडवों ने अनेक छोटी नदियाँ पार कीं तथा बड़ी नदियों के तटों के सहारे आगे बढ़ते रहे. उन्होंने मुख्यतः जंगलों, पर्वतीय क्षेत्रों और उपजाऊ मैदानों के मार्ग से यात्रा की. कुछ ऐसे स्थल भी रहे जहाँ नदियों का अभाव था. वहाँ विशेषकर घने जंगलों में झरनों, जलप्रपातों, छोटे सरोवरों, झीलों और प्राकृतिक जलधाराओं के सहारे यात्रा सुगम होती गई. जहाँ-जहाँ ऋषि-मुनियों के आश्रम थे, वहाँ उनके द्वारा निर्मित कुंड विद्यमान थे. अनेक स्थानों पर पांडवों द्वारा भी कुंड निर्माण के प्रमाण स्थानीय जनश्रुतियों में मिलते हैं. ऐसे जल स्रोतों के सहारे वे आगे बढ़ते रहे.
*लाक्षागृह (वर्तमान बागपत, उत्तर प्रदेश) से झारखंड की ओर*
लाक्षागृह की घटना के बाद पांडव दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर बढ़े. चित्रकूट से होते हुए वे सोनभद्र, रेनूकूट और दुद्धी तक पहुँचे. दुद्धी उत्तर प्रदेश का अंतिम बड़ा पड़ाव माना जाता है, जहाँ से उन्होंने कनहर नदी पार कर वर्तमान झारखंड की सीमा में प्रवेश किया.
*भीम चूल्हा, पलामू : मौन साक्षी*
कनहर नदी पार करने के बाद पांडव वर्तमान पलामू जिले के मोहम्मदगंज क्षेत्र में पहुँचे. यहाँ स्थित “भीम चूल्हा” पांडवों की उपस्थिति का प्रतीक एवं पर्यटकों के मध्य आकर्षण का केंद्र है.
दुद्धी से मोहम्मदगंज की दूरी लगभग 60–70 कि.मी. है, जो पैदल वनयात्रा के लिए एक स्वाभाविक पड़ाव हो सकता है. यह क्षेत्र कोयल नदी के तट पर स्थित है, जहाँ पांडवों की वनयात्रा से संबंधित अनेक जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं. मोहम्मदगंज का प्राचीन नाम स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, किंतु यह स्थान 'झारखंड पांडव पथ' का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है.
*कौलेश्वरी पर्वत : पांडवों की पूजा-स्थली*
जिला चतरा के हंटरगंज प्रखंड में अवस्थित कौलेश्वरी पर्वत को स्थानीय जनश्रुतियों में पांडवों की पूजा-स्थली के रूप में स्मरण किया जाता है.
उस काल में वर्तमान पलामू, गढ़वा, लातेहार और चतरा का क्षेत्र घने वनों से आच्छादित तथा आदिवासी-बहुल था. इन वनों में ऋषियों की पर्याप्त उपस्थिति और अनेक तपोवन स्थित थे. इन जिलों के मध्य उत्तर कोयल, कनहर, औरंगा, अमानत, हिरनी तथा माथन जैसी नदियों का जाल विस्तृत है, जो प्राचीन वनमार्गों की प्राकृतिक दिशा निर्धारित करते रहे होंगे. भूगोल-आधारित शोध संकेत करते हैं कि पांडवों की यात्रा सोन नदी तटवर्ती क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए कनहर नदी पार कर गढ़वा अंचल में पहुँची होगी. इसके पश्चात वे उत्तर कोयल नदी के तटों के सहारे लातेहार और पलामू के घने वनों से गुज़रे होंगे. तत्पश्चात चतरा जिले में प्रवेश कर हिरनी और माथन जैसी स्थानीय नदियों को पार करते हुए कौलेश्वरी धाम पहुँचे होंगे. कौलेश्वरी धाम आज भी पांडवों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ माना जाता है.
चतरा के हंटरगंज प्रखंड स्थित कौलेश्वरी पहाड़ की झारखंड में एक विशिष्ट पहचान है. यहाँ पहुँचने के लिए हंटरगंज से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी तय कर पर्वत की तलहटी तक पहुँचना पड़ता है. इसके बाद लगभग 1,575 फीट की ऊँचाई पैदल चढ़कर पर्वत शिखर पर स्थित माँ कौलेश्वरी मंदिर तक पहुँचा जा सकता है.
आज भी इस मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि देवी कुंती अपने पाँच पुत्रों के साथ यहाँ आई थीं और माँ कौलेश्वरी का पूजन किया था.
*धार्मिक संगम का अद्वितीय स्थल*
कौलेश्वरी पर्वत को हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों के संगम-स्थल के रूप में भी देखा जाता है. बौद्ध परंपरा में यह स्थल भगवान बुद्ध की तपोभूमि से संबंधित माना जाता है तथा मोक्ष-प्राप्ति के पवित्र स्थान के रूप में प्रतिष्ठित है. यहाँ स्थित “मड़वा मड़ई” नामक स्थल पर कुछ बौद्ध अनुयायी प्रतीकात्मक रूप से बाल और नाखून अर्पित करते हैं तथा जीवित अवस्था में ही अंतिम संस्कार-सदृश अनुष्ठान संपन्न करते हैं.
जैन परंपरा के अनुसार, कौलेश्वरी पहाड़ दसवें तीर्थंकर स्वामी शीतलनाथ की तपोभूमि माना जाता है. जैन धर्मावलंबियों ने पर्वत की चोटी पर एक मंदिर का निर्माण भी कराया है, जहाँ भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं.
*गिरिडीह के झारखंडधाम में है अर्जुन द्वारा स्थापित शिवलिंग*
कौलेश्वरी पर्वत से दक्षिण-पूर्व दिशा में बढ़ते हुए पांडवों ने संभवतः बराकर नदी तंत्र का अनुसरण किया होगा. इन नदी-मार्गों के सहारे गिरिडीह अंचल में प्रवेश कर वे अरण्यांचलों—बगोदर, कुंदर, बेंगाबाद और देवरी प्रखंड के वनवासी क्षेत्रों से गुजरते हुए वेबरियाडीह गाँव स्थित झारखंड धाम पहुँचे.
यह स्थल अपनी विशिष्ट पौराणिक महत्ता के लिए जाना जाता है. स्थानीय मान्यता है कि यहाँ स्थित दो शिवलिंगों में से एक की स्थापना भगवान श्रीराम द्वारा तथा दूसरे की अर्जुन द्वारा की गई थी. यह विश्वास किया जाता है कि वनयात्रा के कठिन दिनों में पांडवों ने इस स्थल पर विश्राम किया और शिव आराधना की.
इस यात्रा के दौरान उन्होंने उसरी नदी के तटवर्ती क्षेत्र में भी समय बिताया होगा. कौलेश्वरी से झारखंड धाम तक की यह यात्रा वर्तमान मानचित्र के अनुसार लगभग 95–110 किलोमीटर की है, जो प्राचीन वनपथों, नदी तटों और पर्वतीय अंचलों से होकर गुजरी होगी. उस समय मार्ग प्राकृतिक भू-आकृति के अनुरूप निर्धारित होते थे, अतः वास्तविक पैदल दूरी आधुनिक सड़क दूरी से अधिक या कम दोनों हो सकती है.
*दुमका में है पांडेश्वरनाथ पहाड़ और मंदिर*
झारखंड धाम से दक्षिण-पूर्व दिशा में बढ़ता संभावित वनमार्ग उसरी, बराकर और मयूराक्षी नदी तंत्र के सहारे विकसित होता प्रतीत होता है. जलस्रोतों के समानांतर चलना प्राचीन यात्राओं का स्वाभाविक नियम था. नदियाँ दिशा भी देती थीं और जीवन भी. इन्हीं नदी-तटों, वनों और पहाड़ी ढालों के सहारे एक ऐसी पूर्वी धुरी उभरती है, जो आगे चलकर शिव-आराधना के प्रमुख केंद्रों से जुड़ती दिखाई देती है.
सबसे पहले यह मार्ग पहुँचता है देवघर, जहाँ बाबा बैद्यनाथ धाम केवल झारखंड ही नहीं, समूचे भारतवर्ष में श्रद्धा का केंद्र है. भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित यह तीर्थ प्राचीन काल से साधकों, संतों और यात्रियों को आकर्षित करता रहा है. महाभारत में पांडवों के यहाँ आगमन का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, किंतु वनमार्ग और शिव-उपासना की परंपरा को देखते हुए यह मानना असंगत नहीं कि इस क्षेत्र से गुजरते समय उन्होंने इस पवित्र धाम के दर्शन किए हों. लाक्षागृह की घटना के पश्चात वे अपनी पहचान छिपाए हुए थे. ऐसे में संभव है कि उन्होंने छोटे समूहों में, दो-दो करके बाबाधाम में ज्योतिर्लिंग पर जलार्पण किया होगा और शक्तिपीठ माता पार्वती का दर्शन किया होगा. पांडव उस वन-यात्रा पर थे, जहाँ पहचान छुपाना और धर्म निभाना, दोनों ही एक साथ अनिवार्य थे. माता कुंती की दृष्टि से वनों में स्थित किसी भी देवी-देवता का मंदिर ओझल नहीं हो पाता था, क्योंकि मार्ग जितना कठिन था, आस्था उतनी ही दृढ़.
देवघर से पूर्व दिशा में बढ़ते हुए मार्ग पहुँचता है बासुकीनाथ मंदिर. स्थानीय मान्यता है कि देवघर में जल अर्पित करने के पश्चात बासुकीनाथ में पूजा किए बिना तीर्थ अधूरा रहता है. यह परंपरा संकेत करती है कि यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राचीन काल से शिव-धुरी के रूप में विकसित रहा होगा.
फिर यह मार्ग आगे बढ़ता है दुमका अंचल में पांडेश्वरनाथ मंदिर की ओर, जो बासुकीनाथ से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर प्रकृति की शांत छाया में अवस्थित है. ‘पांडेश्वरनाथ’ नाम ही दर्शाता है—पांडवों द्वारा प्रतिष्ठित, मंदिर परिसर में स्थित शिवलिंग को स्थानीय परंपरा पांडव-स्थापित मानती है. पांडवों के नाम से जुड़े पाँच तालाबों और पहाड़ के पश्चिमी छोर पर स्थित प्राचीन गुफा को आज भी श्रद्धा से देखा जाता है. पांडेश्वरनाथ मंदिर के गर्भगृह एवं प्रांगण में स्थित प्राचीन काल के भग्नावशेषो, प्रतिमाओं
और प्रस्तर कलाकृतियाँ पर्यटकों को आकर्षित करती हैं.
लोकस्मृति इस पर्वत को पांडवों के विश्राम और आराधना-स्थल के रूप में जीवित रखे हुए है.
इस प्रकार झारखंड धाम से लेकर देवघर, बासुकीनाथ और पांडेश्वरनाथ तक एक पूर्वी शिव-धुरी निर्मित होती है, जो नदियों के सहारे, वनों के बीच और लोकविश्वास की स्मृतियों में आज भी प्रवाहित है. वर्तमान मानचित्र के अनुसार झारखंड धाम से देवघर होते हुए पांडेश्वरनाथ तक की कुल दूरी लगभग 145–160 किलोमीटर बैठती है.
*निरसा के समीप पांड्रा गाँव में स्थित है कपिलेश्वर मंदिर*
दुमका अंचल के पांडेश्वरनाथ पर्वत से आगे बढ़ती पांडवों की संभावित पदयात्रा मानो जलधाराओं के साथ-साथ चलती हुई पश्चिम की ओर मुड़ती है. यह वह भूभाग है जहाँ पहाड़ियाँ धीरे-धीरे समतल मैदानों को स्थान देती हैं और नदियाँ दिशा का संकेत बन जाती हैं.
दुमका क्षेत्र की जीवनरेखा रही मयूराक्षी नदी के तटों से आगे बढ़ता वनमार्ग संभवतः दक्षिण-पश्चिम की ओर झुकता है.
आगे बढ़ते हुए यह जल-तंत्र बराकर नदी से जुड़ता है, जो निरसा अंचल के निकट बहती है. बराकर आगे चलकर दामोदर नदी में मिलती है. वही दामोदर, जिसने कोयलांचल धनबाद की धरती को आकार दिया. इस प्रकार दुमका से धनबाद की ओर बढ़ती यह यात्रा जलधाराओं के सहारे स्वाभाविक रूप से विकसित होती प्रतीत होती है.
इसी नदी-आधारित धुरी पर निरसा के समीप पांड्रा गाँव में स्थित है कपिलेश्वर मंदिर.
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, मंदिर परिसर में स्थापित पाँच शिवलिंगों को पाँचों पांडवों से जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि युधिष्ठिर ने बाबा कपिलेश्वर, भीम ने बाबा बनेश्वर, अर्जुन ने भुवनेश्वर, नकुल ने तारकेश्वर तथा सहदेव ने बाबा मनकेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी. साथ ही यह भी माना जाता है कि माता कुंती ने यहाँ माँ पार्वती की प्रतिष्ठा की.
लोकविश्वास यह भी कहता है कि माता कुंती ने यहाँ जिस चूल्हे पर भोजन बनाया था, वह आज भी विद्यमान है, और उसी स्मृति में महाभोग तैयार किया जाता है. कुछ लोग इसे ‘द्रौपदी का चूल्हा’ भी कहते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि संभवतः पांडवों का यहाँ दो बार आगमन हुआ — पहली बार लाक्षागृह की घटना के पश्चात माता कुंती के साथ और दूसरी बार वनवास के दौरान द्रौपदी के साथ.
मान्यता यह भी है कि इस गाँव का नामकरण प्राचीनकाल में पांडवों के नाम पर हुआ था. लोकपरंपरा के अनुसार इसका प्रारंभिक नाम ‘पांडु-रा’ रहा होगा, जिसका आशय पांडवों के प्रवास से जुड़ा माना जाता है. कालांतर में भाषा और उच्चारण के परिवर्तन के साथ यह नाम परिवर्तित होकर ‘पांडरा’ या ‘पांड्रा’ हो गया, यह भाषाई व्याख्या लोकपरंपरा पर आधारित है. दुमका से निरसा की वर्तमान दूरी लगभग 110–120 किलोमीटर है.
*चंदनकियारी में भैरव धाम (पांडव स्थान) एवं जलकुंड*
पांड्रा (निरसा) से दक्षिण दिशा में दामोदर नदी तंत्र का अनुसरण करते हुए पांडवों की संभावित यात्रा चंदनकियारी की ओर बढ़ी. बराकर नदी से दामोदर तंत्र में प्रवेश कर यह मार्ग लगभग 40–50 किलोमीटर की पैदल दूरी में वन, जलधाराओं और नदी-तटों के सहारे विकसित होता प्रतीत होता है.
चंदनकियारी प्रखंड मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर उत्तर तथा भोजूडीह रेलवे स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण, इजरी नदी के तट पर पोलकिटी गाँव में स्थित ‘भैरव धाम’ स्थानीय आस्था का केंद्र है. स्थानीय जनमानस इसे प्रेमपूर्वक ‘पांडव स्थान’ भी कहता है. जनश्रुति है कि महाभारतकाल में पांडव यहाँ ठहरे थे. कहा जाता है कि जलसंकट के समय अर्जुन ने अपने बाण से धरती पर प्रहार किया और उसी स्थान से एक पवित्र कुंड का उद्भव हुआ.
स्थानीय विश्वास के अनुसार उस कुंड का जल शीतल तथा औषधीय गुणों से युक्त है. श्रद्धालु इसे पवित्र मानते हैं और आज भी अनेक लोग स्वास्थ्य-लाभ की कामना से इसका सेवन करते हैं. इस कुंड के बीच में पत्थर के दो चक्रकार गोले है जिनके विषय में यह किंवदंती है कि शिवरात्रि के अवसर पर ये घूमते है.
*राजनगर में भीमखांदा : श्री श्री पांडेश्वर महादेव*
चंदनकियारी से आगे बढ़ती पांडवों की यात्रा राँची के नगड़ी अंचल की ओर मुड़ती है, जहाँ स्वर्णरेखा नदी के उद्गम स्थल रानीचुआँ की कथाएं प्रसिद्ध है. वहाँ से यह वनमार्ग स्वर्णरेखा नदी तंत्र के सहारे क्रमशः आगे बढ़ते हुए सरायकेला-खरसावाँ क्षेत्र में प्रवेश करता है.
इन्हीं जलधाराओं के बीच राजनगर प्रखंड में बोंबोगा (बंगबंगा) नदी के तट पर स्थित है भीमखंदा, जिसे स्थानीय लोकस्मृति पांडव-प्रवास से जोड़ती है. जनश्रुतियों के अनुसार पांडवों ने यहाँ रात्रि विश्राम किया था. बोंबोगा नदी के किनारे एक समतल शिला पर अंकित दो छिद्रों वाली आकृति को ‘पांडवों की रसोई’ कहा जाता है. संताली परंपरा में इसे ‘मोंगरीछांदा’ नाम से जाना जाता है. कुछ कथाएँ इस स्थल को माता कुंती से जोड़ती हैं, तो कुछ द्रौपदी के वनवास-कालीन प्रसंगों से.
स्थानीय विश्वास के अनुसार समीप स्थित कुछ शिलाओं को द्रौपदी के ‘बाल सुखाने का आसन’ के रूप में देखा जाता है. एक विशाल प्रस्तर-खंड पर उकेरे गए पदचिह्नों को ग्रामीण भीम के पाँव का चिह्न मानते हैं, जबकि निकट ही एक पेड़ को अर्जुन के तीर से जोड़ा जाता है. वहीं एक शिवलिंग ‘पांडेश्वर महादेव’ के रूप में पूजित है, जिसे लोकपरंपरा भीम द्वारा स्थापित मानती है.
*महादेवशाल : बाबा श्याम की जन्मस्थली*
राजनगर के भीमखंदा में एक रात्रि विश्राम के उपरांत पांडवों की वनयात्रा दक्षिण-पश्चिम दिशा में खूँटी के कर्रा क्षेत्र की ओर अग्रसर हुई. यहाँ से मार्ग क्रमशः शंख और दक्षिण कोयल नदी तंत्र के निकट पहुँचता है. जिनके मध्य पश्चिमी सिंहभूम जिले का गोइलकेरा क्षेत्र स्थित है, जहाँ सारंडा का विराट साल वन आज भी प्रकृति की मौन सत्ता का परिचायक है. इसी अंचल में अवस्थित है महादेवशाल — एक ऐसा स्थल, जिसे स्थानीय परंपरा ‘हिडिंब वन’ से जोड़ती है.
लाक्षागृह से बच निकलने के पश्चात भीम का विवाह इसी वनप्रदेश में हिडिंबा से हुआ. आगे चलकर इसी वनभूमि में घटोत्कच का जन्म हुआ, वह महायोद्धा, जिसने महाभारत युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई.
इन्हीं घटोत्कच और उनकी पत्नी मोरवी के पुत्र के रूप में जन्मे बर्बरीक, जिन्हें आज बाबा श्याम के नाम से पूजा जाता है, लोकभक्ति की परंपरा में वीरता और त्याग के प्रतीक माने जाते हैं. इस प्रकार वन की यह कथा केवल पांडवों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे चलकर भक्तिभाव की धारा में परिवर्तित हो जाती है.
झारखंड की धरती ऐसे अनेक पौराणिक स्थलों की स्मृतियों को संजोए हुए है. लोहरदगा का आंजनेयधाम, जहाँ भगवान हनुमान का जन्मस्थान माना जाता है; गुमला का टांगीनाथ, जहाँ भगवान परशुराम के फरसे से जुड़ी मान्यता प्रचलित है; तथा दुमका का देवाकीधाम, जहाँ यह विश्वास किया जाता है कि भगवान कृष्ण ने शंखनाद कर महाभारत युद्ध की समाप्ति की घोषणा की थी.
यद्यपि महाभारत के मूल ग्रंथ में इन घटनाओं का सटीक भौगोलिक निर्धारण स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, तथापि लोकमान्यताएँ इस समूचे अंचल को विशिष्ट सांस्कृतिक गहराई प्रदान करती हैं. यहाँ इतिहास शिलालेखों से कम और स्मृतियों से अधिक जीवित है.
संदीप मुरारका
झारखंड की धरती पर बिखरे महाभारत और रामायण के पदचिह्नों के अनवरत अन्वेषक एवं संवेदनशील दस्तावेजकर्ता
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