महाभारत की NextGen स्त्री : हिडिंबा
आठ मार्च की सुबह थी. मैं चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अख़बार के पन्ने पलट रहा था. आज के समाचार पत्र में चार पृष्ठों का एक विशेष परिशिष्ट ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेषांक’ संलग्न था.
तभी मेरी छोटी बेटी अक्षिता, जो इन दिनों दसवीं की परीक्षा दे रही है, अपनी दादी के पास आकर बैठ गई. उसने अखबार की ओर इशारा करते हुए पूछा — दादी, आज की युवतियाँ संघर्ष की मिसाल कही जाती हैं. उनका जीवन अनुभव प्रेरणाओं से भरा होता है. क्या आपके रामायण या महाभारत में भी कोई ऐसी स्त्री थी जिसने अपना जीवन स्वयं चुना हो? जो केवल किसी की पत्नी या माँ बनकर न रह गई हो? जिसने अपने मूल्य अगली पीढ़ी को सौंपे हों, जिनका संघर्ष सीख देता हो?
मेरी माँ मुस्कराईं. वे समझ गईं कि उनकी पोती तुलनात्मक भाव में है. यदि वे मौन रहीं तो अक्षिता यही मानेगी कि स्त्री-चेतना का विकास पिछले चार-पाँच दशकों में ही हुआ है, मानो “NextGen स्त्री” का जन्म आधुनिक पाठ्यपुस्तकों के साथ हुआ हो.
उनकी आँखों में वर्षों की स्मृतियाँ तैर गईं. वे गंभीर स्वर में बोलीं — हाँ! हर काल में ऐसी स्त्रियाँ रही हैं, जो व्यक्ति से ऊपर उठकर चेतना बन जाती हैं. वे अपने समय से आगे की दिशा तय करती हैं.
जैसे? अक्षिता ने तुरंत पूछा
दादी ने कहा — रामायण में राम की माता कैकेयी हों, लवकुश की माता सीता हो… और महाभारत में जनजातीय चेतना की प्रतीक हिडिंबा.
अक्षिता थोड़ा मुस्कराई — राम की माँ कैकेयी और लव-कुश की माता सीता, इस अनूठे परिचय पर फिर कभी बात करुँगी, क्योंकि इनके बारे में तो थोड़ा-बहुत जानती हूँ. पर यह हिडिंबा कौन थीं? और आप उन्हें स्त्री-आत्मनिर्णय और स्वायत्तता की प्रतीक कैसे कह सकती हैं?
कमरे का वातावरण गंभीर हो गया. मैंने भी अख़बार एक ओर रख दिया. सविता भी अपनी चाय लेकर आ गई और वहीं बैठ गई. लगता था आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की गोष्ठी हमारे घर पर ही होने वाली है.
दादी ने धीमे स्वर में कहा — हिडिंबा! जिसे वेदव्यास ने ‘असुर’ लिखा, और इतिहास ने उसे ‘राक्षसी’ पढ़ लिया.
कुछ क्षणों का मौन छा गया. दादी ने फिर कहा — अच्छा, गूगल पर देखो, झारखंड में कितनी जनजातियाँ अधिसूचित हैं?
अक्षिता ने दो मिनट का समय लिया और मोबाइल पर उँगलियाँ दौड़ाते हुए उत्तर दिया —बत्तीस.
और क्या उनमें ‘असुर’ नाम की भी कोई जनजाति है?—
दादी ने फिर पूछा.
अक्षिता चौंकी — हाँ, दादी…है.
दादी की आँखों में चमक थी — तो फिर सोचो, जिसे ग्रंथों ने ‘असुर’ कहा, क्या वह वास्तव में राक्षसी थी? या वह उस समाज की स्त्री थी जिसे मुख्यधारा ने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की?
दादी ने आगे कहना शुरू किया — असल में ‘असुर’ शब्द को समझे बिना हम हिडिंबा को समझ ही नहीं सकते. आज भी ‘असुर’ नाम की यह जनजाति झारखंड में अधिसूचित है. पलामू, लातेहार, गुमला और लोहरदगा में इनकी आबादी अधिक है. पश्चिमी सिंहभूम में भी इनकी उपस्थिति है. झींकपानी प्रखंड में ‘असुरा’ नाम का एक गाँव तक है.
अब सोचो, यदि ‘असुर’ एक वास्तविक जनजातीय समुदाय है, तो महाभारत में प्रयुक्त यह शब्द क्या केवल राक्षसी अर्थ में लिया जाना चाहिए? या यह किसी भिन्न सांस्कृतिक समुदाय का संकेत हो सकता है?
हम सभी ध्यान से सुन रहे थे.
दादी ने धीमे स्वर में कहा — संभव है कि वेदव्यास ने हिडिंबा का संदर्भ किसी वनवासी, जनजातीय समुदाय के रूप में दिया हो. पर बाद की व्याख्याओं ने ‘असुर’ को सीधे ‘राक्षस’ मान लिया. इतिहास कई बार शब्दों को सरल करना चाहता है, किंतु उसका अर्थ और जटिल हो जाता है.
वे थोड़ी देर रुकीं, फिर बोलीं — यह ठीक वैसा ही है जैसे पुराणों में ‘दक्षिण’ शब्द का उल्लेख आते ही कुछ इतिहासकार उसे वर्तमान दक्षिण भारत से जोड़ देते हैं, जबकि उस समय भौगोलिक अवधारणाएँ भिन्न थीं.
दादी ने धीमे स्वर में कहा — महाभारत के आदिपर्व के हिडिंबवध प्रसंग के पहले ही श्लोक में हिडिंब का उल्लेख आता है. जो वन में, शालवृक्ष के समीप निवास करता है.
अब यह सोचो कि सारंडा का जंगल आज भी घने साल वृक्षों से आच्छादित है. महादेवशाल भी कभी उसी वन-क्षेत्र का हिस्सा रहा होगा. शब्द, स्थल और स्मृतियाँ समय के साथ बदलती हैं, पर संकेत बचे रहते हैं.
कमरे में सन्नाटा था. अक्षिता ने धीरे से पूछा — तो दादी… क्या इसका मतलब हिडिंबा महादेवशाल की असुर जनजाति से रही होंगी? वे कोई राक्षसी नहीं थीं?
दादी मुस्कराईं — इतिहास में ‘मतलब’ इतनी जल्दी नहीं निकाले जाते, बेटी. हम इतना कह सकते हैं कि महाभारत का वर्णन एक वनवासी समुदाय की ओर संकेत करता है. ‘असुर’ शब्द आज भी एक जनजाति के रूप में जीवित है.
पर किसी कथा को किसी विशेष भूगोल से जोड़ना शोध का विषय है, निष्कर्ष का नहीं.
हिडिंबा को राक्षसी कहना जितना सरल है, उसे एक वनवासी स्त्री के रूप में समझना उतना ही गहरा.
अक्षिता अभी भी सोच में थी—तो दादी… फिर हिडिंबा ने क्या किया ऐसा, जिससे आप उन्हें स्त्री-आत्मनिर्णय की प्रतीक मानती हैं?
माँ सीधी होकर बैठ गई, जैसे कोई पुरानी कथा को फिर से जीवित करने जा रही हो. उन्होंने कहना शुरू किया —
जब पांडव वन में थे, तब हिडिंबा ने सबसे पहले भीम को देखा. उसने भीम को ‘चुना’. उसका स्वयंवर नहीं हुआ, उसके पिता ने उसका हाथ नहीं सौंपा. उसने स्वयं अपने मन की बात कही.
अक्षिता ने तुरंत पूछा — मतलब उसने प्रपोज किया?
दादी हँसीं — हाँ, अगर आज की भाषा में कहो तो वही.
उसने अपने भाई हिडिंब की आज्ञा के विरुद्ध जाकर भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा. यह केवल प्रेम नहीं था. यह सामाजिक संरचना के विरुद्ध खड़ा होना भी था.
मैंने देखा, अक्षिता की आँखों में जिज्ञासा चमक रही थी. और माँ की आँखों में दृढ़ विश्वास.
दादी आगे बोलीं — सोचो, एक जनजातीय स्त्री, जो अपनी भूमि की स्वामिनी है, अपने ही समुदाय की सत्ता के विरुद्ध जाकर एक क्षत्रिय राजकुमार को चुनती है. यह केवल अंतरजातीय विवाह नहीं था, यह सांस्कृतिक सीमाओं को पार करना था.
फिर क्या वह भीम के साथ हस्तिनापुर चली गई? अक्षिता ने पूछा.
दादी ने सिर हिलाया — नहीं! यही तो सबसे बड़ा निर्णय था. उसने विवाह किया, पर अपनी भूमि नहीं छोड़ी। वह अपने वन में रही, अपनी परंपराओं के साथ. उसने स्वयं को पति की पहचान में विलीन नहीं किया.
दादी ने फिर कहा — और जब भीम वनयात्रा में आगे बढ़ गया, तब हिडिंबा ने विलाप नहीं किया. उसने पुत्र घटोत्कच को जन्म दिया, उसे पाला, प्रशिक्षित किया. वह एक सिंगल मदर थी, जिसने अपने पुत्र को नायक बनाया.
अक्षिता अब गंभीर थी. उसने धीरे से कहा — यानी, वे किसी की छाया नहीं बनी?
दादी ने उत्तर दिया — बिल्कुल सही! वह स्वयं एक वृक्ष बनी, जिसकी छाया में अगली पीढ़ी खड़ी हुई.
अक्षिता ने पूछा — दादी… जब भीम चले गए, तब हिडिंबा ने क्या किया? क्या वह अकेली रह गई?
दादी ने कहा — अकेली? नहीं! वह अकेली नहीं हुई, बल्कि वह संपूर्ण हुई.
उसने घटोत्कच को जन्म दिया. सोचो, एक स्त्री जिसने प्रेम भी स्वयं चुना और मातृत्व भी स्वयं जिया. न कोई राजमहल, न कोई साम्राज्य, न कोई पति का संरक्षण. वन उसका घर था और वही उसका संसार.
दादी ने आगे कहा — सिंगल मदर होना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं होता. यह जिम्मेदारी का वह संपूर्ण वृत है जिसमें माँ ही पिता है, गुरु है, संरक्षक है और दिशा-निर्धारक भी. हिडिंबा ने घटोत्कच को केवल पाला नहीं, उसे प्रशिक्षित किया. उसे अपनी जड़ों से जोड़े रखा. उसे यह नहीं सिखाया कि वह किसी राजवंश की छाया है, बल्कि यह सिखाया कि वह स्वयं अपनी शक्ति है.
मैंने देखा, अक्षिता की आँखें गंभीर हो गई थीं. दादी ने कहा — आज जब हम सिंगल मदर शब्द सुनते हैं, तो हमें आधुनिक समाज का संदर्भ दिखता है. पर हिडिंबा ने उस समय एकल मातृत्व जिया, जब स्त्री की पहचान प्रायः पति से जुड़ी मानी जाती थी.
उसने भीम के जाने को अपनी नियति का अंत नहीं बनने दिया. उसने अपने पुत्र को इतना सक्षम बनाया कि महाभारत के युद्ध में वही घटोत्कच पांडवों की सबसे बड़ी शक्ति बना.
अक्षिता ने कहा — मतलब, उसने अपने बेटे को सिर्फ बड़ा नहीं किया, उसे नायक बनाया.
दादी मुस्कराईं — हाँ! और यही सिंगल मदर की सबसे बड़ी पहचान है. वह अगली पीढ़ी को केवल जीवित नहीं रखती, उसे नेतृत्व के योग्य बनाती है.
हिडिंबा ने अपने पुत्र को पिता की अनुपस्थिति का बोझ नहीं दिया. उसने उसे अपनी जनजातीय वन चेतना, अपनी स्वतंत्रता और अपनी जड़ों का गर्व दिया.
कमरे में एक गहरा मौन था. फिर माँ ने जोरदार वाक्य कहा — और यही तो ‘NextGen स्त्री’ की पहचान है कि वह टूटती नहीं, वह निर्माण करती है.
अक्षिता अब पूरी तरह कहानी में डूब चुकी थी. और फिर दादी?” उसने पूछा.
दादी ने धीमे स्वर में कहा — हिडिंबा ने केवल घटोत्कच को नायक नहीं बनाया. उसके पुत्र घटोत्कच और पुत्रवधू मोरवी ने एक ऐसी संतान को जन्म दिया बर्बरीक, जिन्हें आज बाबा श्याम के रूप में पूजा जाता है. सोचो, यह केवल वंश की निरंतरता नहीं है. यह मूल्य, दीक्षा और शिक्षा की निरंतरता है.
दादी आगे बोलीं —हिडिंबा ने अपने पुत्र को जो आत्मबल, स्वतंत्रता और जड़ों से जुड़ाव दिया, वही चेतना आगे चलकर बर्बरीक के भीतर भी दिखाई देती है. वह योद्धा जिसने धर्म की अपनी व्याख्या की, जिसने शक्ति का अर्थ अलग ढंग से समझा. यह केवल रक्त-संबंध नहीं था, यह संस्कार-संबंध था.
यही तो पीढ़ियों का हस्तांतरण है. जब एक स्त्री अपने निर्णय से शुरू हुई चेतना को अगली पीढ़ियों तक पहुँचा देती है. और तब वह केवल माँ नहीं रहती, वह दिशा बन जाती है.
दादी ने कहा — यही थी भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाली दीक्षा और शिक्षा. हिडिंबा ने केवल एक पुत्र नहीं पाला, उसने एक परंपरा गढ़ी.
अक्षिता अब चुप थी. अब उसकी आँखों में प्रश्न नहीं, विचार थे. कुछ क्षण बाद उसने धीमे स्वर में कहा — तो दादी… ‘NextGen स्त्री’ कोई नई खोज नहीं है?
दादी मुस्कराईं. नहीं बेटी. नई केवल परिस्थितियाँ होती हैं, चेतना नहीं. हर युग में ऐसी स्त्रियाँ रही हैं जिन्होंने अपने समय की सीमाओं को लांघा है. फर्क सिर्फ इतना है कि आज हम उन्हें नए शब्दों में पुकारते हैं — ‘स्वायत्त’, ‘आत्मनिर्णयी’, ‘सिंगल मदर’, ‘इंटरकास्ट मैरिज’, ‘इंडिपेंडेंट वुमन’…इत्यादि. पर इन शब्दों से पहले भी वे थीं.
मैंने देखा, अक्षिता की आँखों में एक नई चमक थी. दादी ने आगे कहा —हिडिंबा कोई एक पात्र नहीं है. वह एक चेतना है. वह वह स्त्री है, जो प्रेम स्वयं चुनती है, जो विवाह के बाद अपनी पहचान नहीं खोती, जो अकेले मातृत्व निभाती है, जो अपने पुत्र को केवल बड़ा नहीं करती, उसे मूल्य देती है, दिशा देती है. वह अतीत की जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की दिशा निर्धारित करती है.
कमरे में सुबह की धूप अब और साफ होने लगी थी. अक्षिता ने मुस्कराकर कहा — तो दादी… असली ‘NextGen स्त्री’ वही है, जो हर पीढ़ी में अपनी शर्तों पर जीती है?
दादी ने सिर हिलाया — हाँ! और याद रखना, NextGen स्त्री कोई एक चेहरा नहीं होती, वह एक सतत विकसित होती चेतना है. वह अतीत को अस्वीकार नहीं करती, उससे शक्ति लेती है, वर्तमान में अपनी पहचान गढ़ती है और भविष्य की दिशा स्वयं निर्धारित करती है.
मैंने अख़बार के उस विशेषांक की ओर देखा और मन ही मन सोचा, शायद स्त्री-चेतना की कहानी उतनी नई नहीं, जितनी हम समझते हैं. कुछ कहानियाँ इतिहास में लिखी जाती हैं, कुछ पुनर्पाठ में जीवित होती हैं. और हिडिंबा, एक राक्षसी नहीं थी, वह महाभारत काल की एक ऐसी स्त्री थी,
जिसकी चेतना आज भी अगली पीढ़ियों को दिशा दे सकती है.
इतने में ही कॉलबेल बज उठी. सविता दरवाज़ा खोलने उठी और मैं भी अपने कमरे की ओर बढ़ गया. शायद तैयार होने के लिए, शायद इस सुबह को भीतर समेट लेने के लिए.
घर की वह छोटी-सी बातचीत अनायास ही एक गोष्ठी में बदल चुकी थी. कोई मंच नहीं था, कोई श्रोतागण नहीं,
पर विचारों का आदान-प्रदान उतना ही गंभीर था, जितना किसी सभागार में होता है.
अक्षिता अपनी किताबें समेट रही थी, पर उसके चेहरे पर अब केवल परीक्षा की चिंता नहीं थी, विचारों की चमक थी.
मैंने मन ही मन सोचा — शायद “NextGen स्त्री” पर होने वाली सबसे सशक्त गोष्ठियाँ अखबारों के पन्नों पर नहीं, घरों की बैठक में जन्म लेती हैं. आज की सुबह केवल महिला दिवस नहीं था, बल्कि वह पीढ़ियों के बीच चेतना का हस्तांतरण था.
संदीप मुरारका
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