Thursday, 23 April 2020
जयपाल सिंह मुंडा
जन्म : 03 जनवरी 1903
जन्म स्थान: टकरा पहानटोली, खूँटी, झारखण्ड
निधन: 20 मार्च 1970
मृत्यु स्थल : नई दिल्ली
पिता : आमरु पाहन मुंडा
माता : राधामुनि
जीवन परिचय - झारखण्ड के जाने माने राजनीतिज्ञ, सांसद, पत्रकार, लेखक, संपादक, शिक्षाविद्, मजदूर नेता और हॉकी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी प्रमोद पाहन उर्फ जयपाल सिंह मुंडा का जन्म खूंटी जिले के टकरा गांव में ट्राइबल परिवार में हुआ था । जयपाल सिंह अत्यंत प्रतिभाशाली थे । पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने अपनी कौशल का परिचय खेल में भी दिखाया । जयपाल सिंह ने अर्थशास्त्र (प्रतिष्ठा) की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की। इसके बाद वे इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस वर्तमान में आईएस) की परीक्षा में बैठे। उनसे पहले इस परीक्षा को पास करने वाले भारतीय धनी व आभिजात्य वर्ग से आते थे, जयपाल इनमें अपवाद थे। साक्षात्कार में सर्वाधिक अंक लेकर उन्होंने आईसीएस की परीक्षा पास की। इंग्लैंड में आईसीएस प्रोबेशनर के रूप में प्रशिक्षण लेने के दौरान उन्हें एम्स्टर्डम में होने वाले ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का न्योता मिला। उनसे कहा गया कि भारतीय दल का हिस्सा बनने के लिए वे तत्काल एम्स्टर्डम रवाना हो जाएं। लंदन स्थित इंडिया ऑफिस से संपर्क कर जयपाल ने एम्स्टर्डम जाने के लिए छुट्टी मांगी। पर उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। उनकी दुविधा थी – देश के लिए खेलें या फिर आईसीएस में बने रहें। पर उन्होंने देश के लिए खेलना पसंद किया।
भारत लौट कर जयपाल ने बर्मा शेल कंपनी में वरिष्ठ कार्यपालक पद पर नौकरी की। नौकरी के दौरान कलकत्ता में रहते हुए 15 जनवरी 1932 को उनका विवाह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी की पोती तारा विन्फ्रेड मजूमदार से हुई । हालांकि, दोनों की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी। 7 मई 1952 को जहाँआरा जयरत्नम के साथ दूसरा विवाह किया , जो बाद में 1958 को राज्यसभा सांसद और केन्द्र में कई बार मन्त्री भी बनी । इनके दो पुत्र बिरसा एवं जयंत और एक पुत्री जानकी हुई ।
उन्होने नौकरी छोड़ दी और अध्यापन कार्य में रम गए, असीमित प्रतिभा के धनी जयपाल 1934 में अध्यापन कार्य के लिए अचीमोता कॉलेज, गोल्ड कोस्ट, अफ्रीका चले गए । वर्ष 1937 में वे रायपुर में राजकुमार कॉलेज के प्राचार्य नियुक्त हुए। अपनी उत्कृष्ट शैक्षणिक योग्यता , खेल में उपलब्धियों, असीम सामर्थ्य और नेतृत्व की क्षमता के बावजूद जयपाल जातिगत भेदभाव और रंगभेद के शिकार हो गए । राजकुमार कॉलेज विशेषकर भारतीय रियासतों और सामंती परिवारों के युवाओं के लिए था। ये लोग यूरोपीय छात्रों की सोहबत में यहाँ रहते थे। इन युवाओं के माँ-बाप को एक ट्राइबल के अधीन अपने बच्चों को शिक्षा दिए जाने की बात पची नहीं। अंग्रेजों को भी यह नागवार गुजरा। इसलिए जयपाल वहाँ से हटा दिए गए । उनके जीवनकाल में कई दिलचस्प मोड़ आए । जब वे अफ्रीका से भारत लौटे तो उनको 1936 में बीकानेर राजघराने ने उपनिवेशन मंत्री और राजस्व आयुक्त नियुक्त किया। इस पद पर कार्य करने के दौरान उनकी काफी प्रशंसा हुई। उनको पदोन्नति देकर बीकानेर स्टेट का विदेश सचिव बना दिया गया।
खेल में योगदान- बचपन से ही जयपाल सिंह मुंडा को हॉकी खेलना पसंद था , उनकी प्रतिभा को एक अंग्रेज शिक्षक ने पहचाना और उन्हें 20 दिसम्बर 1918 को ऑक्सफोर्ड (इंग्लैंड) के सेंट जॉन्स कॉलेज में पढ़ने के लिए ले गये । इंग्लैंड में रहकर जयपाल सिंह ने उच्च शिक्षा प्राप्त की । ऑक्सफ़ोर्ड में रहते हुए खेल, विशेषकर हॉकी के स्तंभकार के रूप में उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आई। 1924 में वे द टाईम्स इत्यादि प्रमुख ब्रिटिश पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखने लगे। अपने आलेखों से वे पाठकों के पसंदीदा बन गए और उनको काफी सराहना मिली। 1925 में ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का खिताब पाने वाले हॉकी के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी जयपाल थे। 1928 में एम्सटर्डम (नीदरलैंड) में होनेवाले ओलिंपिक के लिए उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान नियुक्त किया गया । एम्स्टर्डम ओलम्पिक जाने वाली भारतीय हॉकी टीम में शामिल खिलाड़ी थे : जयपाल सिंह मुंडा (कप्तान), रिचर्ड एलेन, ध्यान चन्द, मौरिस गेटली, विलियम गुड-कुलेन, लेस्ली हैमोंड, फिरोज खान, जॉर्ज मर्थिंस, रेक्स नॉरिस, ब्रूम पिनिगेर (उप कप्तान), माइकल रोक, फ्रेडेरिक सीमैन, अली शौकत और सैयद यूसुफ़। उन्होंने इस सुनहरे मौके का लाभ उठाया और अपनी अगुआई में देश को पहली बार हॉकी में स्वर्ण पदक दिलवाया । फाइनल में भारत ने मेजबान नीदरलैंड को 3-0 से पराजित किया । हॉकी के मैदान में एक रक्षक के रूप में उनके खेल की खूबी थी अपने प्रतिद्वंद्वियों को गेंद पर काबू नहीं करने देना।
1929 में जयपाल ने मोहन बगान हॉकी टीम का गठन किया और बंगाल हॉकी एसोसिएशन के सचिव चुने गए । जयपाल इंडियन स्पोर्ट्स काउन्सिल के सदस्य भी रहे ।
1950 में जयपाल दिल्ली फ्लाइंग क्लब के अध्यक्ष बने, 1951 में ध्यानचंद हॉकी टूर्नामेंट के अध्यक्ष रहे । 1953 में पार्लियामेंट स्पोर्ट्स क्लब के मानद महासचिव बने । जयपाल छोटानागपुर हॉकी एसोसिएशन, दिल्ली हॉकी एसोसिएशन, दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन, दिल्ली फुटबॉल एसोसिएशन, दिल्ली फिशिंग क्लब, दिल्ली जिमखाना क्लब, दिल्ली गोल्फ क्लब, दार्जलिंग जिमखाना क्लब, ऑल इण्डिया काउन्सिल ऑफ स्पोर्ट्स, इण्डियन ओलम्पिक एसोसिएशन, नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इण्डिया, क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इण्डिया, इण्डियन ओलम्पिक कमिटी इत्यादि खेल संगठनो में विभिन्न पदों पर शोभायमान रहे । 1957 से 1961 तक इंटरनेशल ओलम्पिक कमिटी द्वारा देश में खेलों की स्थिति पर गठित तीन सदस्यीय जाँच समिति के सदस्य रहे ।
समाज विकास में योगदान - समय समय पर उन्हें अपने गाँव व वहाँ के ट्राइबल्स की बदहाली एवं शोषण की खबरें पहुँचा करती थी, वे चिन्तन करने लगे कि ट्राइबल समुदाय के उत्थान के लिए क्या किया जा सकता है । वे 1940 में सदाकत आश्रम, पटना जाकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद से भी मिले, किन्तु उनको कोई राह नहीं सूझी ।
उसी दरम्यान बिहार और उड़ीसा के गवर्नर सर मौरिस हॉलेट ने जयपाल को बिहार और उड़ीसा विधायी परिषद (लेजिस्लेटिव काउंसिल) का सदस्य बनने का आग्रह किया , पर उन्होंने इस प्रस्ताव को बहुत ही शालीनता से ठुकरा दिया। इसके बाद गवर्नर और मुख्य सचिव रोबर्ट रसेल दोनों ने जयपाल सिंह से ट्राइबल्स के हित मे कार्य करने व सुझाव देने को कहा ।
जयपाल सिंह मुंडा रांची पहुँचे, अपने ट्राइबल्स लोगों के साथ रहने लगे । वर्ष 1946 में वे बिहार के एक आम निर्वाचन क्षेत्र से संविधान सभा के लिए चुने गए। 296 सदस्यों वाली संविधान सभा को संविधान निर्माण का कार्य सौंपा गया था। जयपाल ने पहली बार 19 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होनें स्वयं को जंगली और आदिवासी कहते हुए अपना महान वक्तव्य प्रारम्भ किया -
- ‘’ As a jungli, as an Adibasi,” “I am not expected to understand the legal intricacies of the Resolution. But my common sense tells me that every one of us should march in that road to freedom and fight together. Sir, if there is any group of Indian people that has been shabbily treated it is my people. They have been disgracefully treated, neglected for the last 6,000 years. The history of the Indus Valley civilization, a child of which I am, shows quite clearly that it is the new comers — most of you here are intruders as far as I am concerned — it is the new comers who have driven away my people from the Indus Valley to the jungle fastness…The whole history of my people is one of continuous exploitation and dispossession by the non-aboriginals of India punctuated by rebellions and disorder.’’
अगस्त 1947 में जब अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों पर पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो उसमें केवल दलितों के लिए ही विशेष प्रावधान किए गए थे। दलित अधिकारों के लिए डॉ अंबेडकर बहुत ताकतवर नेता बन चुके थे, जिसका लाभ दलितों को तो मिलता दिख रहा था, लेकिन ट्राइबल्स को अनदेखा किया जा रहा था। ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा ने कड़े तेवर दिखाए और संविधान सभा में ज़ोरदार तरीके से अपना पक्ष रखा -
“आज़ादी की इस लड़ाई में हम सबको एक साथ चलना चाहिए। पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे ट्राइबल्स ही हैं। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया, लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए।”
स्वतंत्र भारत को स्वरूप देने और उसके निर्माण में महिलाओं की भागीदारी पर जोर देने वाले जयपाल सिंह संभवतः पहले व्यक्ति थे , उनहोने कहा - “महाशय, मेरा अभिप्राय सिर्फ ट्राइबल पुरुषों से ही नहीं बल्कि महिलाओं से भी है। संविधान सभा में जरूरत से ज्यादा पुरुष हैं। हम चाहते हैं ज्यादा महिलाएं यहाँ हों…”
“मैं एक और दृष्टांत दूंगा। छोटानागपुर में यह रिवाज है कि हर सात साल पर वहाँ ‘एरा सेन्द्रा’ (जनशिकार) का आयोजन होता है। हर सात साल पर महिलाएं पुरुष का वेष धारण करती हैं और जंगलों में शिकार करती हैं। गौर कीजिये, पुरुष वेष में ये महिलाएं होती हैं। ये वो अवसर होता है जब महिलाएं, जैसा कि स्वाभाविक है, पुरुष की तरह अपनी वीरता का प्रदर्शन करती हैं। वे पुरुषों की तरह तीर-कमान, लाठियों, भालों और इस तरह के अन्य हथियारों से लैश होती हैं। "
“मैं आदिवासियों के इलाकों में आदिवासियों के बीच काफी घूमा हूँ और पिछले 9 वर्षों में मैंने 1,14,000 मील की यात्रा की है। इससे मुझे यह पता लगा है कि आदिवासियों को किस बात की जरूरत है और इस सदन से उनके लिए क्या उम्मीद की जा सकती है। उन्होंने आग्रह किया कि आदिवासियों के हितों और उनकी खासियत को संरक्षित किए जाने और उनके देखभाल की जरूरत है।”
उन्होंने उरांव जनजाति का उदाहरण दिया - “इस असेंबली में सिर्फ एक ही उरांव सदस्य हैं। जबकि उरांव जनजाति भारत में चौथी सबसे ज्यादा जनसंख्या वाली जनजाति है।”
जयपाल सिंह के सशक्त हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा को ट्राइबल्स के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ा। इसका नतीजा यह निकला कि 400 ट्राइबल समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया। उस समय इनकी आबादी करीब 7 फीसदी आँकी गई थी। इस लिहाज से उनके लिए नौकरियों और लोकसभा-विधानसभाओं में उनके लिए 7.5% आरक्षण सुनिश्चित किया जा सका।
ट्राइबल्स हितों की रक्षा के लिए वर्ष 20 जनवरी1939 को जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी महासभा की अध्यक्षता की । 25 अप्रेल 1939 को झारखण्ड के ओड़िशा बार्डर पर सिमको नामक जगह पर अंग्रेजों ने सैकड़ों ट्राइबल्स को मार गिराया, जिसका पुरजोर विरोध प्रदर्शन जयपाल सिंह के नेतृत्व में आदिवासी महासभा ने किया । उन्होंने 1939 में 'आदिवासी सकम' नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ की । ट्राइबल मजदूरो को उनका हक दिलवाने के लिए 16 मार्च 1947 को झींकपानी में आदिवासी लेबर फेडरेशन के अध्यक्ष बने । 1 जनवरी 1948 को सराईकेला खरसावां जिले में हुए नरसंहार के विरोध में 11 जनवरी 1948 को चाईबासा में भारी जनप्रदर्शन किया ।
आदिवासी महासभा के राजनीतिक विंग के रूप में 1 जनवरी 1950 को झारखण्ड पार्टी का गठन किया । 1952 के चुनाव में झारखंड पार्टी को काफी सफलता मिली , उनके मुर्गा छाप पर 4 सांसद और 32 विधायक जीते थे। स्वयं जयपाल सिंह लगातार चार बार 1952,1957,1962 एवं 1967 खूँटी से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुँचे । जयपाल 3 सितम्बर 1963 को अल्पकाल के लिए उपमुख्यमन्त्री भी बने । बाद में झारखंड के नाम पर बनी तमाम पार्टियाँ इन्ही के विचारों से प्रेरित रही ।
वर्ष 1959 में जयपाल ने वर्ल्ड अफेयर्स काउन्सिल एवं यू एन ओ की बैठक को सम्बोधित किया, उसी वर्ष वे अमेरिका में ओकाहोंमा आदिवासी नेशन द्वारा सम्मानित भी किए गए ।
जयपाल सिंह मुंडा को ट्राइबल परम्पराओं और रहन सहन का अदभुत ज्ञान था, साथ ही वे वाकपटु और धाराप्रवाह वक्ता थे, अंग्रेजी, हिन्दी, बंग्ला, मुंडारी व संथाल कई भाषाओ पर उनकी पकड़ थी । भारत के संविधान में ट्राइबल्स को उनके अधिकार दिलवाने वाले जयपाल सिंह मुंडा को "मरङ गोमके" यानी महान नेता कहा जाता है। इनके विषय में लिखने के लिए जितना अध्ययन करता हूँ इनके विशाल व्यक्तित्व का एक नया अध्याय सामने आ जाता है । इन्हें खिलाड़ी कहूँ, या नेता, या पत्रकार, या स्वतंत्रता सेनानी, या झारखण्ड आंदोलनकारी, या अध्यापक, या मजदूर नेता, या कुशल वक्ता, या विद्वान लेखक - मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा के चरित्र को शब्दों में समेटना असम्भव है ।
सम्मान - 1978 में कचहरी रोड़, राँची में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम का निर्माण करवाया गया था , वर्ष 2004 में वहाँ उनकी प्रतिमा की स्थापना भी की गई है । उनके पैतृक गाँव टकरा , खूँटी में समाधिस्थल बना हुआ है ।
Wednesday, 22 April 2020
कोरोना ( Covid 19)
तुम्हारी मशीने
तुम्हारी गाड़ियाँ
तुम्हारी फैक्ट्रियां
कुछ भी तो काम ना आए ।
तुम्हारे ओवरब्रिज
तुम्हारे फ्लाईओवर
तुम्हारे मॉडल टाउन्स
सभी तुम्हें मुँह चिढ़ा रहे हैं ।
तुम्हारे कम्प्यूटर
तुम्हारे टैब लेपटॉप
तुम्हारे वाईफाई इंटरनेट
कोई तुम्हें कुछ ना बता पाए ।
तुम्हारा गूगल
तुम्हारी टेक्नोलॉजी
तुम्हारा इन्फॉर्मेशन सिस्टम
किसके भरोसे कूद रहे थे तुम ।
काल नहीं
मैं कालचक्र हूँ
भूल तुम्हें याद दिलाने आया हूँ
कोरोना बन प्रकृति समझाने आया हूँ।
संदीप मुरारका
तुम्हारी गाड़ियाँ
तुम्हारी फैक्ट्रियां
कुछ भी तो काम ना आए ।
तुम्हारे ओवरब्रिज
तुम्हारे फ्लाईओवर
तुम्हारे मॉडल टाउन्स
सभी तुम्हें मुँह चिढ़ा रहे हैं ।
तुम्हारे कम्प्यूटर
तुम्हारे टैब लेपटॉप
तुम्हारे वाईफाई इंटरनेट
कोई तुम्हें कुछ ना बता पाए ।
तुम्हारा गूगल
तुम्हारी टेक्नोलॉजी
तुम्हारा इन्फॉर्मेशन सिस्टम
किसके भरोसे कूद रहे थे तुम ।
काल नहीं
मैं कालचक्र हूँ
भूल तुम्हें याद दिलाने आया हूँ
कोरोना बन प्रकृति समझाने आया हूँ।
संदीप मुरारका
22/4/2020 Lockdown Period
बिरसा मुण्डा
जन्म : 15 नवम्बर 1875
जन्म स्थान: उलीहातू गाँव, राँची, झारखण्ड
निधन: 9 जून 1900
मृत्यु स्थल : राँची कारागार
पिता : सुगना मुंडा
माता : करमी हटू
जीवन परिचय - बिरसा मुंडा का जन्म छोटानागपुर पठार के जजातीय मुंडा परिवार में हुआ था । बिरसा का बचपन एक सामान्य वनवासी बालक की तरह घोर दरिद्रता में, जंगलों में घूमते और बकरियां चराते हुए ही बीता। मिशनरीज की सेवा, चिकित्सा और शिक्षा से प्रभावित होकर धर्मपरिवर्तन का दौर चल रहा था, गरीबी और भुखमरी से तंग आकर सुगना मुण्डा ने भी अपने पुत्र बिरसा सहित ईसाई धर्म अपना लिया। साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद बिरसा को चाईबासा के लूथर मिशन स्कूल में नामांकन करवा दिया गया, किन्तु वहाँ का रंगभेद व जातीय भेदभाव उनके मन को कचोटता रहता और उनके हृदय में अंदर ही अंदर एक आक्रोश पलने लगा । विद्यालय में रहकर बिरसा ने अंग्रेजों के कुचक्रों को समझा और विद्यालय छोड़ कर घर लौट आए ।
उन्होने ईसाई धर्म त्याग दिया , 1891 में एक वैष्णव आनन्द पाण्डे के सम्पर्क में आकर आयुर्वेद, पुराण, रामायण, महाभारत सहित वैदिक साहित्य का अध्ययन किया किन्तु बिरसा संतुष्ट नहीं हुए, वे भीषण भुखमरी और विपन्नता से घिरे ट्राइबल्स समुदाय पर होते अत्याचारों को देखकर चिंतित रहते । एक बार इसी चिन्ता में बारह-तेरह दिन वे भूखे-प्यासे जंगल में भटकते रहे। कहा जाता है कि इसी एकान्तवास में उन्हें परमसत्ता सिंङबोंगा से साक्षात्कार हुआ या यूँ कहें कि आत्मसाक्षात्कार हुआ । बिरसा मुण्डा अब धरती आबा बन चुके थे , धरती के भगवान । 1894 में पड़े भयंकर अकाल और महामारी में धरती आबा बिरसा ने गाँव में पूरे मनोयोग से ट्राइबल्स की सेवा की थी ।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान- बिरसा मुण्डा ने वर्ष 1895 में चालकाड़ में यह उद्घोष किया ' "अब वह दिन दूर नहीं जब अंग्रेज हमारे चरणों पर गिरकर अपने प्राणों की भीख मांगेंगे। आओ, हम एकजुट हों, अब हमारा राज्य आने वाला है।" अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज अर्थात अपने देश में अपना शासन ।
इसी के साथ बिरसा ने अंग्रेजों के खिलाफ उलगुलान की घोषणा करते हुए फसल बोने से ट्राइबल्स को रोक दिया ।इस विरोध की खबर मिलने पर अंग्रेज पुलिस 8 अगस्त, 1895 को बिरसा को पकड़ने चालकाड़ आई पर ट्राइबल्स के भीषण सशस्त्र प्रतिरोध के आगे वह बिरसा को छू तक न सकी। 23 अगस्त, 1895 को अंग्रेज पुलिस आयुक्त ने बिरसा और उसके आन्दोलन को कुचलने का आदेश दिया। इस बार रात के समय चुपके से पूरे गांव को घेर लिया गया और बिरसा को सोते हुए पकड़ कर रांची जेल में बन्द कर दिया गया। 19 नवम्बर, 1895 को बिरसा को दो वर्ष के कठोर कारावास और पचास रुपये जुर्माने की सजा सुना दी गई। 30 नवम्बर, 1897 को बिरसा को जेल से रिहा हुए ।
रिहाई के बाद बिरसा ने अंग्रेजों के साथ मुकाबला करने के लिए ट्राइबल सेना संगठित की, जिसका मुख्य केन्द्र खूंटी बनाया गया। 25 दिसम्बर, 1899 को बिरसा सेना ने सखादाग मिशन हाथे पर चढ़ाई कर दी। मिशन का परिसर जला दिया गया। दूसरी बार बिरसा ने अपनी सेना को कई टुकड़ियों में बांटकर पुलिस थानों पर हमला करने के आदेश दिए। बिरसा ने तीर कमानों से लैस चार सौ ट्राइबल वीरों के साथ खूँटी थाने पर धावा बोल दिया। तांगा नदी के किनारे उनकी भिड़ंत अंग्रेज सेना से हुई , उनकी जीत भी हुई लेकिन कई ट्राइबल्स की गिरफ़्तारियां हो गई । बिरसा और उनके आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज फौज खूंटी और डुम्बारी की पहाड़ियों की ओर कूच कर गई, पर उन्हें पकड़ने में अंग्रेज असफल रहे ।
इसके बाद बिरसा दुगने उत्साह से ट्राइबल्स को संगठित कर जंगल पर दावेदारी के लिए गोलबंद करने लगे । इस उलगुलान से महाजन, जमींदार और सामंत ही नहीं अंग्रेज अफसर भी भय से कांपने लगे। अंग्रेज सरकार ने उलगुलान को दबाने का हर संभव प्रयास किया , लेकिन ट्राइबल्स के गुरिल्ला युद्ध के समक्ष अंग्रेज असफल रहे। धरती आबा बिरसा का एक ही लक्ष्य था - “महारानी राज तुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना” यानी कि ‘ ब्रिटिश महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो’।
25 जनवरी 1900 में उलिहातू के समीप डोमबाड़ी पहाड़ी पर अंग्रेजो और सूदखोरों के विरुद्ध आयोजित एक जनसभा में बिरसा ट्राइबल्स को सम्बोधित कर रहे थे कि अचानक अंग्रेज सैनिकों ने हमला कर दिया, दोनोँ पक्षों मे जमकर संघर्ष हुआ, ट्राइबल्स के हाथों में तीर धनुष, भाला, कुल्हाड़ी, टंगीया इत्यादि थे, परन्तु दुश्मन की बंदूक-तोप का सामना पारंपरिक हथियार भला कब तक कर पाते, अंततः लगभग 400 लोग मारे गए, जिनमें औरतें और बच्चे भी थे । कई लोग गिरफ्तार कर लिए गए । बिरसा की गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया, उनपर रुपए 500/- का इनाम घोषित हुआ ।
बिरसा छिपते हुए अपने लोगों से मिलते मिलाते उलगुलान का प्रसार प्रचार करते हुए चक्रधरपुर पहुँचे, तारीख थी 3 मार्च 1900, अगली रणनीति पर चर्चा चल रही थी, रात हो चली थी, धरती आबा ने 'जम्कोपाई' जंगल में रात बिताने का निर्णय लिया, देर रात जब सबलोग सो रहे थे, किसी अपने ने ही धोखा किया और बिरसा को उनके 460 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया ।
बिरसा को खाट सहित बांध दिया गया था, भोर हो चली थी, बंदगांव के रास्ते उन्हें राँची जेल ले जाया जाय़ा गया, उस वक्त अपने उलगुलान को जिन्दा रखने के लिए धरती आबा ने जो शब्द कहे, उन्हे कागज पर उकेरा "अश्विन कुमार पंकज" ने - “मैं तुम्हें अपने शब्द दिये जा रहा हूं, उसे फेंक मत देना, अपने घर या आंगन में उसे संजोकर रखना। मेरा कहा कभी नहीं मरेगा। उलगुलान ! उलगुलान! और ये शब्द मिटाए न जा सकेंगे। ये बढ़ते जाएंगे। बरसात में बढ़ने वाले घास की तरह बढ़ेंगे। तुम सब कभी हिम्मत मत हारना। उलगुलान जारी है।”
अदालत में बैरिस्टर जैकब ने बिरसा की ओर से बहस की किन्तु पूर्वाग्रह से ग्रसित अंग्रेज जज ने सजा सुना दी । बिरसा राँची जेल में कैद थे किन्तु उनके द्वारा छेड़े गए उलगुलान से अंग्रेज अब भी भयभीत थे । कुनीति में माहिर अंग्रेजों ने यह अफवाह फैला दी कि धरती आबा को हैजा हो गया है जबकि उन्हें खाने में प्रतिदिन धीमा जहर दिया जाने लगा । 9 जून 1900 को धरती आबा बिरसा मुण्डा के शरीर का अन्त हुआ । किन्तु भगवान मरा नहीं करते, इस दृष्टिकोण से वे आज भी जीवित हैं और इस धरती के अन्त होने तक जीवित रहेगे, इसीलिए साहित्यकार हरीराम मीणा लिखते हैं-
" मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ,
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता,
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता ।
उलगुलान !
उलगुलान !!
उलगुलान !!! ’’
सम्मान - 16 अक्टूबर 1989 को संसद के केंद्रीय हॉल में बिरसा के चित्र का अनावरण तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने किया। 1988 में भारत सरकार द्वारा बिरसा मुंडा पर 60 पैसे की डाक टिकट जारी की गई । दिनांक 28 अगस्त 1998 को संसद परिसर में मूर्तिकार बी सी मोहंती द्वारा निर्मित 14 फीट की प्रतिमा का अनावरण राष्ट्रपति के आर नारायणन ने किया गया । झारखण्ड की राजधानी राँची के एयरपोर्ट का नाम बिरसा मुंडा विमानक्षेत्र है । 1 अप्रेल 2017 को गुजरात के नर्मदा जिले में बिरसा मुण्डा ट्राइबल यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई है , वहीँ राँची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना 26 जून 1981 को की गयी थी । झारखण्ड के बुंडू, सिंदरी, सरगरिया, बलियापुर, बोकारो, हरचंदा , चंदरा, सराईकेला, राँची, बेको, बालसोकडा, जमशेदपुर, धनबाद, गोड्डा, बिजुपाड़ा, धौनसर, बासदेवपुर, ओड़िशा के राउलकेला, पश्चिम बंगाल के गमारकुमरी, कानपुर इत्यादि स्थानो पर बिरसा के नाम पर विभिन्न विद्यालय संचालित हैं । रांची खेल परिसर में बिरसा मुण्डा एथेलेटिक्स स्टेडियम बना हुआ है , वहीँ चाईबासा, सराईकेला एवं चांडिल के छोटालाखा में बिरसा मुण्डा के नाम पर स्टेडियम बने हुए हैं । विभिन्न स्थानो पर कई अस्पताल एवं पार्क का नामकरण बिरसा मुण्डा के नाम पर हुआ है । उनकी जन्मस्थली अड़की प्रखंड के उलिहातू गांव में बिरसा स्मारक स्थल (बिरसा ओड़ा) है । बिहार, बंगाल, ओड़िशा और झारखण्ड में हजार से ज्यादा बिरसा की प्रतिमाएँ स्थापित है, सबसे बड़ी बात कि धरती आबा यहाँ के लोगों के दिल में अंकित हैं ।
जन्म स्थान: उलीहातू गाँव, राँची, झारखण्ड
निधन: 9 जून 1900
मृत्यु स्थल : राँची कारागार
पिता : सुगना मुंडा
माता : करमी हटू
जीवन परिचय - बिरसा मुंडा का जन्म छोटानागपुर पठार के जजातीय मुंडा परिवार में हुआ था । बिरसा का बचपन एक सामान्य वनवासी बालक की तरह घोर दरिद्रता में, जंगलों में घूमते और बकरियां चराते हुए ही बीता। मिशनरीज की सेवा, चिकित्सा और शिक्षा से प्रभावित होकर धर्मपरिवर्तन का दौर चल रहा था, गरीबी और भुखमरी से तंग आकर सुगना मुण्डा ने भी अपने पुत्र बिरसा सहित ईसाई धर्म अपना लिया। साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद बिरसा को चाईबासा के लूथर मिशन स्कूल में नामांकन करवा दिया गया, किन्तु वहाँ का रंगभेद व जातीय भेदभाव उनके मन को कचोटता रहता और उनके हृदय में अंदर ही अंदर एक आक्रोश पलने लगा । विद्यालय में रहकर बिरसा ने अंग्रेजों के कुचक्रों को समझा और विद्यालय छोड़ कर घर लौट आए ।
उन्होने ईसाई धर्म त्याग दिया , 1891 में एक वैष्णव आनन्द पाण्डे के सम्पर्क में आकर आयुर्वेद, पुराण, रामायण, महाभारत सहित वैदिक साहित्य का अध्ययन किया किन्तु बिरसा संतुष्ट नहीं हुए, वे भीषण भुखमरी और विपन्नता से घिरे ट्राइबल्स समुदाय पर होते अत्याचारों को देखकर चिंतित रहते । एक बार इसी चिन्ता में बारह-तेरह दिन वे भूखे-प्यासे जंगल में भटकते रहे। कहा जाता है कि इसी एकान्तवास में उन्हें परमसत्ता सिंङबोंगा से साक्षात्कार हुआ या यूँ कहें कि आत्मसाक्षात्कार हुआ । बिरसा मुण्डा अब धरती आबा बन चुके थे , धरती के भगवान । 1894 में पड़े भयंकर अकाल और महामारी में धरती आबा बिरसा ने गाँव में पूरे मनोयोग से ट्राइबल्स की सेवा की थी ।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान- बिरसा मुण्डा ने वर्ष 1895 में चालकाड़ में यह उद्घोष किया ' "अब वह दिन दूर नहीं जब अंग्रेज हमारे चरणों पर गिरकर अपने प्राणों की भीख मांगेंगे। आओ, हम एकजुट हों, अब हमारा राज्य आने वाला है।" अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज अर्थात अपने देश में अपना शासन ।
इसी के साथ बिरसा ने अंग्रेजों के खिलाफ उलगुलान की घोषणा करते हुए फसल बोने से ट्राइबल्स को रोक दिया ।इस विरोध की खबर मिलने पर अंग्रेज पुलिस 8 अगस्त, 1895 को बिरसा को पकड़ने चालकाड़ आई पर ट्राइबल्स के भीषण सशस्त्र प्रतिरोध के आगे वह बिरसा को छू तक न सकी। 23 अगस्त, 1895 को अंग्रेज पुलिस आयुक्त ने बिरसा और उसके आन्दोलन को कुचलने का आदेश दिया। इस बार रात के समय चुपके से पूरे गांव को घेर लिया गया और बिरसा को सोते हुए पकड़ कर रांची जेल में बन्द कर दिया गया। 19 नवम्बर, 1895 को बिरसा को दो वर्ष के कठोर कारावास और पचास रुपये जुर्माने की सजा सुना दी गई। 30 नवम्बर, 1897 को बिरसा को जेल से रिहा हुए ।
रिहाई के बाद बिरसा ने अंग्रेजों के साथ मुकाबला करने के लिए ट्राइबल सेना संगठित की, जिसका मुख्य केन्द्र खूंटी बनाया गया। 25 दिसम्बर, 1899 को बिरसा सेना ने सखादाग मिशन हाथे पर चढ़ाई कर दी। मिशन का परिसर जला दिया गया। दूसरी बार बिरसा ने अपनी सेना को कई टुकड़ियों में बांटकर पुलिस थानों पर हमला करने के आदेश दिए। बिरसा ने तीर कमानों से लैस चार सौ ट्राइबल वीरों के साथ खूँटी थाने पर धावा बोल दिया। तांगा नदी के किनारे उनकी भिड़ंत अंग्रेज सेना से हुई , उनकी जीत भी हुई लेकिन कई ट्राइबल्स की गिरफ़्तारियां हो गई । बिरसा और उनके आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज फौज खूंटी और डुम्बारी की पहाड़ियों की ओर कूच कर गई, पर उन्हें पकड़ने में अंग्रेज असफल रहे ।
इसके बाद बिरसा दुगने उत्साह से ट्राइबल्स को संगठित कर जंगल पर दावेदारी के लिए गोलबंद करने लगे । इस उलगुलान से महाजन, जमींदार और सामंत ही नहीं अंग्रेज अफसर भी भय से कांपने लगे। अंग्रेज सरकार ने उलगुलान को दबाने का हर संभव प्रयास किया , लेकिन ट्राइबल्स के गुरिल्ला युद्ध के समक्ष अंग्रेज असफल रहे। धरती आबा बिरसा का एक ही लक्ष्य था - “महारानी राज तुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना” यानी कि ‘ ब्रिटिश महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो’।
25 जनवरी 1900 में उलिहातू के समीप डोमबाड़ी पहाड़ी पर अंग्रेजो और सूदखोरों के विरुद्ध आयोजित एक जनसभा में बिरसा ट्राइबल्स को सम्बोधित कर रहे थे कि अचानक अंग्रेज सैनिकों ने हमला कर दिया, दोनोँ पक्षों मे जमकर संघर्ष हुआ, ट्राइबल्स के हाथों में तीर धनुष, भाला, कुल्हाड़ी, टंगीया इत्यादि थे, परन्तु दुश्मन की बंदूक-तोप का सामना पारंपरिक हथियार भला कब तक कर पाते, अंततः लगभग 400 लोग मारे गए, जिनमें औरतें और बच्चे भी थे । कई लोग गिरफ्तार कर लिए गए । बिरसा की गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया, उनपर रुपए 500/- का इनाम घोषित हुआ ।
बिरसा छिपते हुए अपने लोगों से मिलते मिलाते उलगुलान का प्रसार प्रचार करते हुए चक्रधरपुर पहुँचे, तारीख थी 3 मार्च 1900, अगली रणनीति पर चर्चा चल रही थी, रात हो चली थी, धरती आबा ने 'जम्कोपाई' जंगल में रात बिताने का निर्णय लिया, देर रात जब सबलोग सो रहे थे, किसी अपने ने ही धोखा किया और बिरसा को उनके 460 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया ।
बिरसा को खाट सहित बांध दिया गया था, भोर हो चली थी, बंदगांव के रास्ते उन्हें राँची जेल ले जाया जाय़ा गया, उस वक्त अपने उलगुलान को जिन्दा रखने के लिए धरती आबा ने जो शब्द कहे, उन्हे कागज पर उकेरा "अश्विन कुमार पंकज" ने - “मैं तुम्हें अपने शब्द दिये जा रहा हूं, उसे फेंक मत देना, अपने घर या आंगन में उसे संजोकर रखना। मेरा कहा कभी नहीं मरेगा। उलगुलान ! उलगुलान! और ये शब्द मिटाए न जा सकेंगे। ये बढ़ते जाएंगे। बरसात में बढ़ने वाले घास की तरह बढ़ेंगे। तुम सब कभी हिम्मत मत हारना। उलगुलान जारी है।”
अदालत में बैरिस्टर जैकब ने बिरसा की ओर से बहस की किन्तु पूर्वाग्रह से ग्रसित अंग्रेज जज ने सजा सुना दी । बिरसा राँची जेल में कैद थे किन्तु उनके द्वारा छेड़े गए उलगुलान से अंग्रेज अब भी भयभीत थे । कुनीति में माहिर अंग्रेजों ने यह अफवाह फैला दी कि धरती आबा को हैजा हो गया है जबकि उन्हें खाने में प्रतिदिन धीमा जहर दिया जाने लगा । 9 जून 1900 को धरती आबा बिरसा मुण्डा के शरीर का अन्त हुआ । किन्तु भगवान मरा नहीं करते, इस दृष्टिकोण से वे आज भी जीवित हैं और इस धरती के अन्त होने तक जीवित रहेगे, इसीलिए साहित्यकार हरीराम मीणा लिखते हैं-
" मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ,
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता,
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता ।
उलगुलान !
उलगुलान !!
उलगुलान !!! ’’
सम्मान - 16 अक्टूबर 1989 को संसद के केंद्रीय हॉल में बिरसा के चित्र का अनावरण तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने किया। 1988 में भारत सरकार द्वारा बिरसा मुंडा पर 60 पैसे की डाक टिकट जारी की गई । दिनांक 28 अगस्त 1998 को संसद परिसर में मूर्तिकार बी सी मोहंती द्वारा निर्मित 14 फीट की प्रतिमा का अनावरण राष्ट्रपति के आर नारायणन ने किया गया । झारखण्ड की राजधानी राँची के एयरपोर्ट का नाम बिरसा मुंडा विमानक्षेत्र है । 1 अप्रेल 2017 को गुजरात के नर्मदा जिले में बिरसा मुण्डा ट्राइबल यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई है , वहीँ राँची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना 26 जून 1981 को की गयी थी । झारखण्ड के बुंडू, सिंदरी, सरगरिया, बलियापुर, बोकारो, हरचंदा , चंदरा, सराईकेला, राँची, बेको, बालसोकडा, जमशेदपुर, धनबाद, गोड्डा, बिजुपाड़ा, धौनसर, बासदेवपुर, ओड़िशा के राउलकेला, पश्चिम बंगाल के गमारकुमरी, कानपुर इत्यादि स्थानो पर बिरसा के नाम पर विभिन्न विद्यालय संचालित हैं । रांची खेल परिसर में बिरसा मुण्डा एथेलेटिक्स स्टेडियम बना हुआ है , वहीँ चाईबासा, सराईकेला एवं चांडिल के छोटालाखा में बिरसा मुण्डा के नाम पर स्टेडियम बने हुए हैं । विभिन्न स्थानो पर कई अस्पताल एवं पार्क का नामकरण बिरसा मुण्डा के नाम पर हुआ है । उनकी जन्मस्थली अड़की प्रखंड के उलिहातू गांव में बिरसा स्मारक स्थल (बिरसा ओड़ा) है । बिहार, बंगाल, ओड़िशा और झारखण्ड में हजार से ज्यादा बिरसा की प्रतिमाएँ स्थापित है, सबसे बड़ी बात कि धरती आबा यहाँ के लोगों के दिल में अंकित हैं ।
Tuesday, 21 April 2020
ओत् गुरु कोल लाको बोदरा
ओत् गुरु कोल लाको बोदरा
जन्म : 19 सितम्बर 1919
जन्म स्थान : पासेया गाँव ,खूंटपानी प्रखण्ड, जिला पश्चिमी सिंहभूम, झारखण्ड
निधन: 29 जून 1986
मृत्यु स्थल : जमशेदपुर
पिता : लेबेया बोदरा
माता : जानो कुई
जीवन परिचय - लाको बोदरा हो भाषा के साहित्यकार थे। हो भाषा-साहित्य में ओत् गुरू कोल "लाको बोदरा" का वही स्थान है जो संताली भाषा में रघुनाथ मुर्मू का है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के खुंटपानी ब्लॉक में स्थित पासेया गाँव में जन्में लाको बोदरा होमियोपैथी चिकित्सक भी थे । उनकी आरम्भिक शिक्षा बड्चोम हातु प्राथमिक विद्यालय एवं पुरुईयां प्राथमिक विद्यालय में हुई। कक्षा 9 की पढ़ाई उन्होने चक्रधरपुर स्थित एंग्लो इंडियन ग्रामर हाई स्कूल में की और चाईबासा के ज़िला उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होने फादर डिजाडिन से अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान प्राप्त किया, इसके बाद उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा के सहयोग से पंजाब के जालंधर सिटी कॉलेज से होम्योपैथी की डिग्री प्राप्त की। उन्होने नोवामुंडी के पास डोंगापोसी में रेलवे में लिपिक के रूप में अपना योगदान दिया । लोको बोदरा ने सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से दो बार चुनाव भी लड़ा । काफी समय तक आकाशवाणी राँची से जुड़े रहे साथ ही राँची विश्वविद्यालय के जनजाति एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के परामर्शदातृ समिति के सदस्य भी रहे । लाको बोदरा एक मधुर बाँसुरी वादक भी थे ।
साहित्यिक परिचय - ओत् गुरू (विश्व गुरु) कोल "लाको बोदरा" ने 1940 के दशक में हो भाषा के लिए ह्वारङ क्षिति ( वारंगचिति) नामक लिपि की खोज की व उसे प्रचलित किया। उसके प्रचार-प्रसार के लिए ‘आदि संस्कृति एवं विज्ञान संस्थान’ (एटे:ए तुर्तुङ सुल्ल पीटिका अक्हड़ा) की स्थापना भी की। यह संस्थान आज भी हो भाषा-साहित्य,संस्कृति के विकास में संलग्न है। "ह्वारङ क्षिति" में उन्होंने ‘हो’ भाषा का एक वृहद् शब्दकोश भी तैयार किया जो अप्रकाशित है। वारंगचिति में मूल अक्षर सहित 32 वर्ण हैं। जो छोटे और बड़े अक्षर के रुप में प्रयोग होते हैं। वारगंचिति को बाएं से दाएं, दाएं से बाएं, ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर और सांकेतिक रुप में भी लिखा-पढ़ा जाता है। गैर सरकारी तौर पर हो भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु बढ़ावा देने में टाटा स्टील के कॉरपोरट सोशल रिस्पोंसिबिलिटी विभाग द्वारा संचालित केन्द्रों में भी पढ़ाया जाता है।
लाको बोदरा विद्यार्थियों को "वारंगचिति" लिपि की शिक्षा देने के साथ-साथ धर्म विज्ञान का उपदेश भी देते थे । जोड़ापोखर, झींकपानी में एक आवासीय सह-शिक्षा विद्यालय की स्थापना की गई , इसके अलावा आदि समाज (दुपुब होदा) द्वारा लोटा खूंटपानी प्रखंड , गुडासाई मनोहरपुर, टुंटाकटा मझगाँव, दाईगोड़ा घाटशिला, बड़ानन्दा एवं डोंगुआपोसी जगन्नाथपुर, जमशेदपुर, क्योंझर, सुकिन्दा ओड़िशा, इत्यादि कई स्थानों पर "वारंगचिति" लिपि प्रशिक्षण का केंद्र खोला गया । इन केन्द्रों में व्यवहारिक शिक्षा यथा जड़ीबूटी, सिलाई कढा़ई, बुनाई, बागवानी, बढ़ई, लोहार इत्यादि ।
नई लिपि में लिखी गई पुस्तकों का मुद्रण झींकपानी की अड़ो: इप्पिल माला मुद्रा प्रेस में हुआ । गुरु लोको बोदरा ने समाज में फैली बुराईयों, कुरीतियों, बलीप्रथा, अंधविश्वास एवं रूढ़िवादीता पर भी कड़ी चोट की । उन्होने आदि समाज मे राजी खुशी (प्रेम विवाह) के स्थान पर आन्दी विवाह (माता पिता की स्वीकृति से विवाह) को प्रोत्साहित किया । उनके देउरी (पुजारी) कर्मकांड तथा हवन हिन्दू विवाह के सदृश्य सम्पन्न कराते हैं। पुरूष जनेऊ तथा विवाहित महिलाऐं हिन्दू महिलाओं जैसा मांग में सिन्दूर लगाती हैं तथा लौह की चूड़ी धारण करती है। लाको बोदरा ने हिन्दू धर्म ग्रन्थ वेद, रामायण तथा महाभारत के साथ साथ कुरान व बाइबल का भी अध्ययन किया । उन्होने ट्राइबल समुदाय के विवाह संस्कार एवं मृत्यु संस्कार में भी संशोधन किए, इसलिए उन्हें 'बोदरा बोरोम' भी कहा जाता है ।
कृतियाँ - सहार होड़ा (स्वर्ग के रास्ते) , बोंगा होड़ा (बोंगा की राह), एला ओल इतू उटा, षड़ा पुड़ा सांगेन, ब्ह बूरू-बोडंगा बूरु, षार होरा, पोम्पो (अक्षर विज्ञान) , रघुवंश, शिशु हलं, होरा बारा, कोल रूल, एनी , हो बाकणा (हो व्याकरण), हसे हयम पहम पुति , बड़ा बुड़ा सगेन, हलं हलपुड, पार होरा, आईदा होडोअ सेबा षड़ा गोवरि,
सम्मान एवं पुरस्कार - गुरु लोको की कई पुस्तकें झारखण्ड के विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों के पाठ्क्रमों में शामिल की गई हैं । टाटा स्टील द्वारा
पश्चिमी सिंहभूम जिला के खूंटपानी प्रखंड में कोल गुरु लाको बोदरा का पैतृक गांव पासेया में स्मारक बनवाया गया है । जमशेदपुर के मानगो शंकोसाई रोड नंबर 5 , सीतारामडेरा, ट्राइबल कल्चरल सेंटर सोनारी , डुमरिया के स्वर्गछिड़ा में ओत् गुरु की प्रतिमाएँ स्थापित हैं । वर्ष 1976 में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था ।
एक रचना-
नोकोया नपिरयन सिर्फ चाङइते
नोकोया सेनो:यन सिर्फ दिङगते
नोकोया नोयारेमन दोरेया तलाते
नोकोया नोवारेयन द:डनो तलाते
दिषुम रेको ! निमिन जके ते
गिति: कन गे हपह कते
मेडेम मेडेपे में मेटो: पे सनमते
विरिड बेरेड पे बिरइतो आते ॥
इन प्रेरक पंक्तियों का हिन्दी अनुवाद- आज के युग में कोई सुदूर आकाश में चाँद पर जा रहा है, तो कोई सूरज की ओर गतिमान है । कोई तैरकर विशाल सागर को पार कर रहा है तो कोई समुद्र की अतल गहराई में जाकर अनुसंधान कर रहा है । हे देशवासियों, तुम अभी भी अज्ञानता की चिरनिद्रा में सोये हुए हो और मूकदर्शक बन कर मौन हो । अब जाग जाओ और आँखे खोलकर संसार को, संसार की प्रगति को देखो । तुम खुद जगो और अन्य को भी जगाओ ।
जन्म : 19 सितम्बर 1919
जन्म स्थान : पासेया गाँव ,खूंटपानी प्रखण्ड, जिला पश्चिमी सिंहभूम, झारखण्ड
निधन: 29 जून 1986
मृत्यु स्थल : जमशेदपुर
पिता : लेबेया बोदरा
माता : जानो कुई
जीवन परिचय - लाको बोदरा हो भाषा के साहित्यकार थे। हो भाषा-साहित्य में ओत् गुरू कोल "लाको बोदरा" का वही स्थान है जो संताली भाषा में रघुनाथ मुर्मू का है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के खुंटपानी ब्लॉक में स्थित पासेया गाँव में जन्में लाको बोदरा होमियोपैथी चिकित्सक भी थे । उनकी आरम्भिक शिक्षा बड्चोम हातु प्राथमिक विद्यालय एवं पुरुईयां प्राथमिक विद्यालय में हुई। कक्षा 9 की पढ़ाई उन्होने चक्रधरपुर स्थित एंग्लो इंडियन ग्रामर हाई स्कूल में की और चाईबासा के ज़िला उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होने फादर डिजाडिन से अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान प्राप्त किया, इसके बाद उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा के सहयोग से पंजाब के जालंधर सिटी कॉलेज से होम्योपैथी की डिग्री प्राप्त की। उन्होने नोवामुंडी के पास डोंगापोसी में रेलवे में लिपिक के रूप में अपना योगदान दिया । लोको बोदरा ने सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से दो बार चुनाव भी लड़ा । काफी समय तक आकाशवाणी राँची से जुड़े रहे साथ ही राँची विश्वविद्यालय के जनजाति एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के परामर्शदातृ समिति के सदस्य भी रहे । लाको बोदरा एक मधुर बाँसुरी वादक भी थे ।
साहित्यिक परिचय - ओत् गुरू (विश्व गुरु) कोल "लाको बोदरा" ने 1940 के दशक में हो भाषा के लिए ह्वारङ क्षिति ( वारंगचिति) नामक लिपि की खोज की व उसे प्रचलित किया। उसके प्रचार-प्रसार के लिए ‘आदि संस्कृति एवं विज्ञान संस्थान’ (एटे:ए तुर्तुङ सुल्ल पीटिका अक्हड़ा) की स्थापना भी की। यह संस्थान आज भी हो भाषा-साहित्य,संस्कृति के विकास में संलग्न है। "ह्वारङ क्षिति" में उन्होंने ‘हो’ भाषा का एक वृहद् शब्दकोश भी तैयार किया जो अप्रकाशित है। वारंगचिति में मूल अक्षर सहित 32 वर्ण हैं। जो छोटे और बड़े अक्षर के रुप में प्रयोग होते हैं। वारगंचिति को बाएं से दाएं, दाएं से बाएं, ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर और सांकेतिक रुप में भी लिखा-पढ़ा जाता है। गैर सरकारी तौर पर हो भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु बढ़ावा देने में टाटा स्टील के कॉरपोरट सोशल रिस्पोंसिबिलिटी विभाग द्वारा संचालित केन्द्रों में भी पढ़ाया जाता है।
लाको बोदरा विद्यार्थियों को "वारंगचिति" लिपि की शिक्षा देने के साथ-साथ धर्म विज्ञान का उपदेश भी देते थे । जोड़ापोखर, झींकपानी में एक आवासीय सह-शिक्षा विद्यालय की स्थापना की गई , इसके अलावा आदि समाज (दुपुब होदा) द्वारा लोटा खूंटपानी प्रखंड , गुडासाई मनोहरपुर, टुंटाकटा मझगाँव, दाईगोड़ा घाटशिला, बड़ानन्दा एवं डोंगुआपोसी जगन्नाथपुर, जमशेदपुर, क्योंझर, सुकिन्दा ओड़िशा, इत्यादि कई स्थानों पर "वारंगचिति" लिपि प्रशिक्षण का केंद्र खोला गया । इन केन्द्रों में व्यवहारिक शिक्षा यथा जड़ीबूटी, सिलाई कढा़ई, बुनाई, बागवानी, बढ़ई, लोहार इत्यादि ।
नई लिपि में लिखी गई पुस्तकों का मुद्रण झींकपानी की अड़ो: इप्पिल माला मुद्रा प्रेस में हुआ । गुरु लोको बोदरा ने समाज में फैली बुराईयों, कुरीतियों, बलीप्रथा, अंधविश्वास एवं रूढ़िवादीता पर भी कड़ी चोट की । उन्होने आदि समाज मे राजी खुशी (प्रेम विवाह) के स्थान पर आन्दी विवाह (माता पिता की स्वीकृति से विवाह) को प्रोत्साहित किया । उनके देउरी (पुजारी) कर्मकांड तथा हवन हिन्दू विवाह के सदृश्य सम्पन्न कराते हैं। पुरूष जनेऊ तथा विवाहित महिलाऐं हिन्दू महिलाओं जैसा मांग में सिन्दूर लगाती हैं तथा लौह की चूड़ी धारण करती है। लाको बोदरा ने हिन्दू धर्म ग्रन्थ वेद, रामायण तथा महाभारत के साथ साथ कुरान व बाइबल का भी अध्ययन किया । उन्होने ट्राइबल समुदाय के विवाह संस्कार एवं मृत्यु संस्कार में भी संशोधन किए, इसलिए उन्हें 'बोदरा बोरोम' भी कहा जाता है ।
कृतियाँ - सहार होड़ा (स्वर्ग के रास्ते) , बोंगा होड़ा (बोंगा की राह), एला ओल इतू उटा, षड़ा पुड़ा सांगेन, ब्ह बूरू-बोडंगा बूरु, षार होरा, पोम्पो (अक्षर विज्ञान) , रघुवंश, शिशु हलं, होरा बारा, कोल रूल, एनी , हो बाकणा (हो व्याकरण), हसे हयम पहम पुति , बड़ा बुड़ा सगेन, हलं हलपुड, पार होरा, आईदा होडोअ सेबा षड़ा गोवरि,
सम्मान एवं पुरस्कार - गुरु लोको की कई पुस्तकें झारखण्ड के विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों के पाठ्क्रमों में शामिल की गई हैं । टाटा स्टील द्वारा
पश्चिमी सिंहभूम जिला के खूंटपानी प्रखंड में कोल गुरु लाको बोदरा का पैतृक गांव पासेया में स्मारक बनवाया गया है । जमशेदपुर के मानगो शंकोसाई रोड नंबर 5 , सीतारामडेरा, ट्राइबल कल्चरल सेंटर सोनारी , डुमरिया के स्वर्गछिड़ा में ओत् गुरु की प्रतिमाएँ स्थापित हैं । वर्ष 1976 में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था ।
एक रचना-
नोकोया नपिरयन सिर्फ चाङइते
नोकोया सेनो:यन सिर्फ दिङगते
नोकोया नोयारेमन दोरेया तलाते
नोकोया नोवारेयन द:डनो तलाते
दिषुम रेको ! निमिन जके ते
गिति: कन गे हपह कते
मेडेम मेडेपे में मेटो: पे सनमते
विरिड बेरेड पे बिरइतो आते ॥
इन प्रेरक पंक्तियों का हिन्दी अनुवाद- आज के युग में कोई सुदूर आकाश में चाँद पर जा रहा है, तो कोई सूरज की ओर गतिमान है । कोई तैरकर विशाल सागर को पार कर रहा है तो कोई समुद्र की अतल गहराई में जाकर अनुसंधान कर रहा है । हे देशवासियों, तुम अभी भी अज्ञानता की चिरनिद्रा में सोये हुए हो और मूकदर्शक बन कर मौन हो । अब जाग जाओ और आँखे खोलकर संसार को, संसार की प्रगति को देखो । तुम खुद जगो और अन्य को भी जगाओ ।
संदीप मुरारका
21 अप्रेल 2020
Monday, 20 April 2020
सिदो कान्हु - हूल विद्रोह के नायक
जन्म : सिदो 1825 कान्हु 1830
जन्म स्थान: संथाल परगना बरहेट प्रखण्ड के भगनाडीह गांव, झारखण्ड
निधन: 26 जुलाई 1855 को फाँसी दी गई
मृत्यु स्थल : पंचकठीया, बरहेट प्रखंड, साहेबगंज
पिता : चुन्नी मांझी
जीवन परिचय - सिदो-कान्हू मुर्मू का जन्म भोगनाडीह नामक गाँव में एक ट्राइबल संथाल परिवार में हुआ था। संथाल विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाले ये 6 भाई बहन थे , जिनके नाम चाँद मुर्मू ,भैरव मुर्मू , फुलो मुर्मू एवं झानो मुर्मू थे।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान -सिदो-कान्हू ने 1855 मे ब्रिटिश सत्ता, साहुकारो व जमींदारो के खिलाफ एक विद्रोह की शुरूआत की थी, जिसे 'संथाल विद्रोह या हूल आन्दोलन' के नाम से जाना जाता है। संथाल हूल विद्रोह का नारा था 'अंग्रेजो हमारी माटी छोड़ो' । कार्ल मार्क्स ने इस विद्रोह को ‘भारत की प्रथम जनक्रांति’ कहा था।वर्ष1820 में बिहार के भागलपुर जिले के कलेक्टर ‘ऑगस्टस क्विसलेण्ड’ के आदेश पर ईस्ट इण्डिया कंपनी का एक अधिकारी ‘फ्रांसिस बुकानन’ राजमहल की पहाड़ियों को पार करके ट्राइबल गाँवो में नियुक्त हुआ ।उस समय वहां के ट्राइबल्स जंगल से लकड़ियाँ लाकर बाजार में बेचने एवं खेती द्वारा अपनी जीविका चलाते थे । किन्तु व्यवस्थित खेती के नाम पर ‘फ्रांसिस बुकानन' ने क्षेत्र में स्थायी बंदोबस्ती को लागू कर दिया, जिसका वहां के मूलवासियों पर प्रतिकूल असर पड़ा । इसके अनुसार ट्राइबल्स पर जंगल से कोई भी संसाधन निकालने और शिकार पर रोक लगा दी गयी । सिदो कान्हू अंग्रेजों की नीतियों से आक्रोशित थे ।
फसल अच्छी नहीं हो पाने पर भी किसानों को लगान देना पड़ता था , ऐसी स्थिति में कई बार कर्ज़ लेकर लगान चुकाना पड़ता था, कर्ज लौटाने की शर्ते ऊंची हुआ करती थी, साहूकार सादे कागज़ पर ट्राइबल्स के अंगूठे के निशान लगवा लिया करते थे । वसूली के लिए महाजनों के गुर्गे ट्राइबल्स व उनके घर की महिलाओ के साथ दुर्व्यवहार किया करते थे और अंग्रेज प्रशासन भी उनकी ही ओर खड़ा दिखता ।
महाजन साहूकारों की बर्बरता का एक खास साथी पंचकठीया तहसील का थानेदार महेश लाल दत्त था, जो औरतों के साथ उत्पीड़न के मामले में वह सबसे आगे रहता था. यही नहीं आदिवासी जब भी ‘पंचकठीया’ बाजार में अपने रोजमर्रा की चीजें खरीदने-बेचने जाते, तो उन्हें महेश लाल दत्त के आतंक का सामना करना पड़ता।
सिदो - कान्हू ने हूल आन्दोलन को सफल बनाने के लिए धर्म का सहारा लिया। देवता मरांग बूरू और देवी जाहेर एस के दर्शन और अबुआ राज स्थापित करने की बात को प्रचारित कर लोगों की भावना को उभारा। ट्राइबल्स के हर घर में 'सखुआ डाली' भेज कर लोगों को आमंत्रित किया कि मुख्य देवी देवता का आशीर्वाद लेने के लिए 30 जून को भगनाडीह में जमा होना है। फलस्वरूप आहूत सभा में लगभग साठ हजार ट्राइबल्स तीर कमान, दरांती, भाले और फरसा जैसे परंपरागत हथियारों के साथ एकत्रित हो गये। उस सभा में सिदो को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को प्रशासक और भैरव को सेनापति मनोनीत कर नये संथाल राज्य के गठन की घोषणा कर दी गई । सभा ने संकल्प लिया गया कि गाँवो से महाजन, पुलिस, जमींदार, सरकारी कर्मचारी एवं नीलहे गोरों को मार भगाना है और ना लगान ही देना है ना कोई सरकारी आदेश मानना है । इस विद्रोह की खबर आग की तरह सारे क्षेत्र में फैल गई.
इसी कड़ी में दारोगा महेश लाल दत्त को खबर लगी, तो वह कलेक्टर क्विसलेण्ड के आदेश पर सिदो कान्हु को गिरफ्तार करने उपरोक्त सभास्थल पर पहुंचा , जहाँ एकत्रित ट्राल्बल्स उग्र हो गए । उन्होंने दरोगा महेश लाल की हत्या कर दी और इसी के साथ प्रारंभ हुआ ‘सन्थाल हूल आन्दोलन’ । इतने पर भी उग्र भीड़ रुकी नहीं, उन्होने महाजनों के घरों पर हमला कर कर्ज के दस्तावेजों को जला दिया ।
इधर महेश लाल की सूचना मिलने पर के बाद अंग्रेज कलेक्टर क्विसलेण्ड कप्तान मर्टीलो के साथ भागलपुर से सेना सहित संथाल विद्रोह को दबाने आया। पाकुड़ जिले के संग्रामपुर नामक स्थान पर सिदो कान्हु की सेना के साथ क्विसलेण्ड की सेना का भीषण युद्ध हुआ । एक ओर ट्राइबल्स के जोश, उत्साह, पारम्परिक हथियार थे तो दूसरी ओर आधुनिक हथियार और तकनीक से लैस कुशल नेतृत्व वाली अंग्रेज़ सेना ।
शुरुआती लड़ाई में ट्राइबल्स ही भारी पड़े, क्योंकि नेतृत्व कर्ता सिदो कान्हू जंगल और पहाड़ियों में लड़े जाने वाले ‘गुरिल्ला युद्ध’ में पारंगत थे ,उन्होने अंग्रेज़ी सेना का जमकर नुकसान पहुंचाया । कैप्टेन मर्टीलो ने उनकी ताक़त व कमजोरी को आँक लिया और नई रणनीति के तहत संथाल विद्रोहियों को मैदानी इलाके में उतरने पर मजबूर किया । जैसे ही ये विद्रोही पहाड़ों से उतरे,अंग्रेज़ी सेना इन पर हावी हो गई । भारी संख्या में ट्राइबल लड़ाके मारे गए , 9 जुलाई 1855 को सिदो कान्हू के छोटे भाई चाँद और भैरव भी मारे गए ।
सिदो कान्हु के द्वारा आगाज हूल आन्दोलन व्यापक पैमाने पर फैलने लगा और झारखंड के पाकुड़ प्रमंडल के अलावा बंगाल का मुर्शिदाबाद और पुरुलिया इलाका भी इसके प्रभाव में आ गया । किन्तु सिदो कान्हु की सेना के पास खाने का समान तक नहीं था, आगे की रणनीति व रसद की व्यवस्था करने दोनोँ भाई 26 जुलाई 1855 की रात को अपने साथियों के साथ गांव पहुँचे। तभी किसी मुख़बिर की सूचना पर अचानक धावा बोलकर अंग्रेज़ सिपाहियों ने दोनों भाइयों को गिरफ़्तार कर लिया , उन्हें घोड़े से बांधकर घसीटते हुए पंचकठीया ले जाया गया और वहीं बरगद के एक पेड़ से लटकाकर उन वीरों को फाँसी दे दी गई ।
संथाल विद्रोह के वक्त अग्रेजों द्वारा रातों-रात मार्टिलो टावर का निर्माण करवाया गया था, इस टावर में 52 छेद हैं, जिनसे अंग्रेजों ने फायरिंग की और हजारों क्रांतिकारी शहीद हुए ,पाकुड़ में अवस्थित यह मर्टीलो टॉवर आज भी सिदो कान्हु की शौर्यगाथा गाता है ।
सम्मान - सिदो कान्हु के नाम पर वर्ष 1992 में दुमका में सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय की स्थापना की गई । 6 अप्रेल 2002 को भारत सरकार द्वारा सिदो कान्हु पर 4 रुपए की डाकटिकट जारी की गई । मई 2016 में प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिदो कान्हू मुर्मू सेतु का उदघाटन किया । एक ही नदी पर बना यह पुल दुनिया का सबसे लम्बा सड़क पुल है, इसकी लम्बाई 6,000 मीटर है , यह साहेबगंज से मनिहारी को जोड़ने वाले गंगा नदी पर उत्तर-दक्षिण की दिशा में बना है । लखीकुंडी, दुमका एवं फागूटोला, पाकुड़ में सिदो-कान्हू के नाम पर पार्क बने हुए हैं । 18 अप्रेल 2018 को हजारीबाग के बड़कागांव के उरीमारी में सिदो कान्हु की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई हैं, भोगनाडीह साहेबगंज, दुमका सिदो कान्हु यूनिवर्सिटी, जमशेदपुर के भुइयांडीह, चंद्रपुरा इत्यादि झारखण्ड के कई स्थानों पर सिदो कान्हु की प्रतिमा स्थापित है । प्रत्येक वर्ष 30 जून को हूल दिवस के रूप में मनाया जाता है , झारखण्ड सरकार द्वारा इस दिन अवकाश घोषित किया गया है ।
Sunday, 19 April 2020
निलाम्बर पीताम्बर
निलाम्बर पीताम्बर

जन्म : 10 जनवरी 1823
जन्म स्थान: भंडरिया प्रखंड के चेमू-सनेया ग्राम , गढ़वा जिला, झारखण्ड
निधन: 28 मार्च 1859 में फाँसी दी गई
मृत्यु स्थल : लेस्लीगंज , पलामू
पिता : चेमू सिंह
जीवन परिचय - पीताम्बर साही और नीलाम्बर साही का जन्म झारखंड राज्य के गढवा जिला के चेमो-सनेया गांव में खरवार की उपजाति भोक्ता जाति में हुआ था। इनके पिता चेमू सिंह पराक्रमी जागीरदार थे। उनको व खरवार जाति को शांत रखा जा सके इसलिए अंग्रेजो ने उन्हें दो जागीर दी हुई थी , किन्तु चेमू सिंह का सम्बन्ध अंग्रेज सरकार से सदैव कड़वाहट भरा रहा । यहीं घर से ही दोनोँ भाइयों के मन में अंग्रेजो के विरुद्ध बीज पनपने लगा । नीलाम्बर के किशोरावस्था में पहुँचते-पहुँचते पिता चेमू सिंह की मृत्यु हो गयी थी और नीलाम्बर ने ही पीताम्बर को पाला । कुशाग्रबुद्धि के साथ साथ दोनोँ भाई पराक्रमी वीर एवं गुरिल्ला युद्ध’ में निपुण थे ।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान- 1857 के विद्रोह के समय पीताम्बर रांची में थे, उन्होंने आन्दोलन को नजदीक से देखा और पलामू लौटकर अपने भाई निलाम्बर से देश की स्थिति पर गहन विमर्श किया । निलाम्बर पीताम्बर भाईयों ने पलामू में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की योजना तैयार की और उसी क्रम में स्थानीय खरवार, चेरो तथा भोगता समुदाय की जनजातियों को बड़े पैमाने पर संगठित किया । दोनोँ भाइयों के नेतृत्व में 21 अक्टूबर 1857 को चैनपुर, शाहपुर तथा लेस्लीगंज स्थित अंग्रेजों के कैंप पर आक्रमण कर दिया गया। इन्होंने नवम्बर, 1857 को ‘राजहरा कोयला कम्पनी’ पर हमला कर दिया, जिसके कारण अंग्रेज़ों को बहुत क्षति पहुँची। इनका संपर्क रांची के प्रमुख क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ शाही एवं पांडेय गणपत राय तथा बिहार के बाबू कुंवर सिंह से भी था । जिससे घबराकर कमिश्नर डाल्टन मद्रास इंफेंट्री के 140 सैनिक, रामगढ़ घुड़सवार की छाेटी टुकड़ी तथा कुछ बंदुकचीयो के साथ 16 जनवरी 1858 काे पलामू आ गए एवं इनके आन्दोलन को कुचलने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया । परन्तु निलाम्बर पीताम्बर के नेतृत्व में ट्राइबल्स आंदोलनकारियों ने कर्नल डाल्टन जैसे दमनकारी अंग्रेज को छक्के छुड़ा दिए । डाल्टन ने 12 फरवरी काे चेमू-सेनया स्थित नीलांबर-पीतांबर के गढ़ सहित पूरे गांव में लूट-पाट कर सभी घराें काे जला दिया, इनके संपत्ति, मवेशियाें तथा जागीराें काे जब्त कर लिया और लाेहरदगा के तरफ बढ़ गया । जनवरी 1859 में कप्तान नेशन और लेफ्टीनेंट ग्राहम पलामू विद्रोह को दबाने में सक्रिय हो गए , साथ साथ ब्रिगेडियर डाेग्लाज एवं शाहाबाद की सीमा पर कर्नल टर्नर सक्रिय थे । अंग्रेज खरवार एवं चेरवा समुदाय के बीच फूट डालने में सफल रहे, लगातार चौतरफा हमलों से निलाम्बर पीताम्बर की शक्ति घटती चली गयी । जासूसाें की सूचना पर अंगरेजी सेना ने पलामू में आंदाेलन के सूत्रधार नीलांबर-पीतांबर काे एक संबंधी के यहां से गिरफ्तार कर लिया , फिर बिना मुकदमा चलाये ही 28 मार्च 1859 काे लेस्लीगंज में इन्हें सरेआम पहाड़ी गुफा के सामने आम के पेड़ पर फाँसी दे दी गयी ।
सम्मान - वर्ष 2009 में इनके नाम पर झारखण्ड सरकार ने मेदिनीनगर डालटेनगंज में नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविद्यालय की स्थापना की है । झारखंड के रामगढ़ जिले के दुलमी प्रखंड इलाके में आसना टांड माथागोड़ा में , रांची के मोरहाबादी मैदान में , खलारी प्रखण्ड के बड़काटांड ,लातेहार जिला में सदर थाना के कोने गांव एवं अन्य कई स्थानों पर अमर शहीद वीर नीलाम्बर-पीताम्बर की प्रतिमा स्थापित की गई है ।

जन्म : 10 जनवरी 1823
जन्म स्थान: भंडरिया प्रखंड के चेमू-सनेया ग्राम , गढ़वा जिला, झारखण्ड
निधन: 28 मार्च 1859 में फाँसी दी गई
मृत्यु स्थल : लेस्लीगंज , पलामू
पिता : चेमू सिंह
जीवन परिचय - पीताम्बर साही और नीलाम्बर साही का जन्म झारखंड राज्य के गढवा जिला के चेमो-सनेया गांव में खरवार की उपजाति भोक्ता जाति में हुआ था। इनके पिता चेमू सिंह पराक्रमी जागीरदार थे। उनको व खरवार जाति को शांत रखा जा सके इसलिए अंग्रेजो ने उन्हें दो जागीर दी हुई थी , किन्तु चेमू सिंह का सम्बन्ध अंग्रेज सरकार से सदैव कड़वाहट भरा रहा । यहीं घर से ही दोनोँ भाइयों के मन में अंग्रेजो के विरुद्ध बीज पनपने लगा । नीलाम्बर के किशोरावस्था में पहुँचते-पहुँचते पिता चेमू सिंह की मृत्यु हो गयी थी और नीलाम्बर ने ही पीताम्बर को पाला । कुशाग्रबुद्धि के साथ साथ दोनोँ भाई पराक्रमी वीर एवं गुरिल्ला युद्ध’ में निपुण थे ।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान- 1857 के विद्रोह के समय पीताम्बर रांची में थे, उन्होंने आन्दोलन को नजदीक से देखा और पलामू लौटकर अपने भाई निलाम्बर से देश की स्थिति पर गहन विमर्श किया । निलाम्बर पीताम्बर भाईयों ने पलामू में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की योजना तैयार की और उसी क्रम में स्थानीय खरवार, चेरो तथा भोगता समुदाय की जनजातियों को बड़े पैमाने पर संगठित किया । दोनोँ भाइयों के नेतृत्व में 21 अक्टूबर 1857 को चैनपुर, शाहपुर तथा लेस्लीगंज स्थित अंग्रेजों के कैंप पर आक्रमण कर दिया गया। इन्होंने नवम्बर, 1857 को ‘राजहरा कोयला कम्पनी’ पर हमला कर दिया, जिसके कारण अंग्रेज़ों को बहुत क्षति पहुँची। इनका संपर्क रांची के प्रमुख क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ शाही एवं पांडेय गणपत राय तथा बिहार के बाबू कुंवर सिंह से भी था । जिससे घबराकर कमिश्नर डाल्टन मद्रास इंफेंट्री के 140 सैनिक, रामगढ़ घुड़सवार की छाेटी टुकड़ी तथा कुछ बंदुकचीयो के साथ 16 जनवरी 1858 काे पलामू आ गए एवं इनके आन्दोलन को कुचलने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया । परन्तु निलाम्बर पीताम्बर के नेतृत्व में ट्राइबल्स आंदोलनकारियों ने कर्नल डाल्टन जैसे दमनकारी अंग्रेज को छक्के छुड़ा दिए । डाल्टन ने 12 फरवरी काे चेमू-सेनया स्थित नीलांबर-पीतांबर के गढ़ सहित पूरे गांव में लूट-पाट कर सभी घराें काे जला दिया, इनके संपत्ति, मवेशियाें तथा जागीराें काे जब्त कर लिया और लाेहरदगा के तरफ बढ़ गया । जनवरी 1859 में कप्तान नेशन और लेफ्टीनेंट ग्राहम पलामू विद्रोह को दबाने में सक्रिय हो गए , साथ साथ ब्रिगेडियर डाेग्लाज एवं शाहाबाद की सीमा पर कर्नल टर्नर सक्रिय थे । अंग्रेज खरवार एवं चेरवा समुदाय के बीच फूट डालने में सफल रहे, लगातार चौतरफा हमलों से निलाम्बर पीताम्बर की शक्ति घटती चली गयी । जासूसाें की सूचना पर अंगरेजी सेना ने पलामू में आंदाेलन के सूत्रधार नीलांबर-पीतांबर काे एक संबंधी के यहां से गिरफ्तार कर लिया , फिर बिना मुकदमा चलाये ही 28 मार्च 1859 काे लेस्लीगंज में इन्हें सरेआम पहाड़ी गुफा के सामने आम के पेड़ पर फाँसी दे दी गयी ।
सम्मान - वर्ष 2009 में इनके नाम पर झारखण्ड सरकार ने मेदिनीनगर डालटेनगंज में नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविद्यालय की स्थापना की है । झारखंड के रामगढ़ जिले के दुलमी प्रखंड इलाके में आसना टांड माथागोड़ा में , रांची के मोरहाबादी मैदान में , खलारी प्रखण्ड के बड़काटांड ,लातेहार जिला में सदर थाना के कोने गांव एवं अन्य कई स्थानों पर अमर शहीद वीर नीलाम्बर-पीताम्बर की प्रतिमा स्थापित की गई है ।
पंडित रघुनाथ मुर्मू
पंडित रघुनाथ मुर्मू
जन्म: 5 मई 1905
जन्म स्थान: मयूरभंज ज़िले के डांडबूश गाँव, ओड़िशा
निधन: 1 फरवरी 1982
जीवन परिचय - पारसी सिञ्ज चांदो (संथाली भाषा के सूरज) ' पंडित रघुनाथ मुर्मू ' संथाली भाषा की लिपि ओल चिकी के जन्मदाता थे । प्रो. मार्टिन उराँव ने अपनी पुस्तक ‘दी संताल - ए ट्राईब इन सर्च ऑफ दी ग्रेट ट्रेडिशन’ में ऑलचिकी की प्रशंसा करते हुए उन्हें संतालियों का महान गुरु कह कर संबोधित किया। गुरु गोमके ने भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक एकता के लिए लिपि के द्वारा जो आंदोलन चलाया वह ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा - "अगर आप अपनी भाषा - संस्कृती , लिपि और धर्म भूल जायेंगे तो आपका अस्तित्व भी ख़त्म हो जाएगा ! " उन्होंने बोडोतोलिया हाई स्कूल में अध्यापन का कार्य किया और 1977 में झाड़ग्राम के बेताकुन्दरीडाही ग्राम में एक संताली विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया था । इनकी धर्मपत्नी का नाम नेहा बास्के था । इन्होने 1964 में ' आदिवासी सोशीयो एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोशिएसन' आस्का की स्थापना की । इनके बचपन का नाम चुन्नू था, इनकी प्राथमिक शिक्षा अपने गाँव से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित गम्हरिया यू.पी. स्कूल में और मिडिल स्कूल की पढ़ाई गाँव से 12 किलोमीटर दूर स्थित बहड़दा एम्.ई.स्कूल में हुई । इन्होंने हाई स्कूल की पढ़ाई माराज कृष्णा चंद्र हाई स्कूल , बारीपदा से करते हुए 1928 में द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्होंने 1929-30 के दौरान कुछ समय के लिए अप्रेंटिस किया और फिर बारीपदा के ही कपड़ा बुनाई के कारखाने में भर्ती हो गए। बाद में औद्योगिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और पूर्णचंद्र औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र बारीपदा में बतौर प्रशिक्षक सेवाएं भी दी । 1933 में इन्हे बादाम ताड़िया मॉडल स्कूल में औद्योगिक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया, जहाँ अध्यापन कार्य के दौरान स्कूल में ही लकड़ी की छपाई मशीन प्रारम्भ की , जिसे देखकर सभी आश्चर्यचकित हो जाया करते थे , 1939 में बारीपदा की प्रदर्शनी उस लकड़ी की छापा मशीन को प्रदर्शित किया गया तो जितनी प्रशंसा उस मशीन की हुई, उससे ज्यादा प्रशंसा उससे छपे गुरु गोमके के इन शब्दों की हुई -
"जानाम आयोय रेन्गेज रेंहो
ऊनिगेय हाग-राहा
जानाम रोड़ दो निधान रेंहो
ओना तेगे माग-रांग-आ"
हिन्दी में भावार्थ है, “जन्म देने वाली माँ गरीब होने पर भी वही परवरिश करती है। मातृभाषा का निधन होने पर भी उसी से महान बना जा सकता है।"
गुरु गोमके ने रायरंगपुर गवर्नमेंट हाईस्कूल में प्रधान शिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दी ।
साहित्यिक परिचय - गुरु गोमके के नाम से प्रसिद्ध पंडित रघुनाथ ने महसूस किया कि उनके समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपरा के साथ ही उनकी भाषा को बनाए रखने और बढ़ावा देने के लिए एक अलग लिपि की जरूरत है । इसलिए उन्होंने संथाली लिखने के लिए ओल चिकी लिपि की खोज के काम को प्रारम्भ किया जो 1925 में पूर्ण हुआ। ओलचिकी लिपि गढ़ते समय प. रघुनाथ असमंजस में थे कि वर्णों कोे कैसे और किस आधार पर बनाया जाए। उनसे पहले किसी ने संथाली लिखने के लिए कोई आधार तैयार नहीं किया था। ऐसे में उन्होने सबकुछ प्रकृति का सहारा लिया, ट्राइबल्स सदैव से ही प्रकृति के उपासक रहे हैं , वे पेड़-पौधे, नदी-तालाब, धरती-आसमान, आग-पानी का स्मरण करने लगे। पक्षियों की आवाज समझने लगे। घंटों नदी-आग के पास बैठकर चिंतन करने लगे। फिर पहला अक्षर धरती के स्वरूप जैसा ओत-(0) और दूसरा आग पर बनाया, लिपि में 6 स्वर और 24 व्यंजन हैं । उपरोक्त लिपि का उपयोग करते हुए उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जैसे कि व्याकरण, उपन्यास, नाटक, कविता और सांताली में विषयों की एक विस्तृत श्रेणी को कवर किया, जिसमें सांलक समुदाय को सांस्कृतिक रूप से उन्नयन के लिए अपने व्यापक कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में ओल चिकी का उपयोग किया गया। 22 दिसम्बर 2003 को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में संथाली भाषा को शामिल किए जाने में गुरु गोमके का योगदान अविस्मरणीय रहेगा ।
कृतियाँ - गुरु गोमके की पहली पुस्तक ‘नेल जोंग लागिद ऑल’ का प्रकाशन जमशेदपुर में मुनिराम बास्के की प्रिंटिंग प्रेस में हुआ था ।
उपन्यास - बिदु चंदन
संथाली नाटक - दाड़े गे धोन , खेरवाड़ बीर , सिदो कान्हू संथाल हूल
व्याकरण - रोणोड़
बाल साहित्य - ऑल चेमेद , ऐलखा ,ऑल उपुरुम, पारसी पोहा , पारसी ईतुन, पारसी आपद
धार्मिक पुस्तक - हीताल और बांखेड़
गीत - लाक्चर सेरे्ज और होड़ सेरेंग
अन्य - खरगोश बीर , दरेज धन, सिद्धु-कान्हू
सम्मान एवं पुरस्कार - बिहार , पश्चिम बंगाल और उड़ीसा सरकार के अलावा, उड़ीसा साहित्य अकादमी सहित कई अन्य संगठनों ने उन्हें सम्मानित किया, रांची विश्वविद्यालय द्वारा माननीय डी लिट की उपाधी से उन्हें सम्मानित किया गया। वर्ष 2017 मेँ ओडिशा सरकार ने इनके नाम पर बारीपदा में पंडित रघुनाथ मुर्मू मेडिकल काँलेज एवं हास्पिटल की स्थापना की है । झारखण्ड के चांडिल स्थित एन०एच०-33 स्थित कान्दरबेड़ा दोमुहानी चौक में, ओड़िशा के मयूरभंज जिले के डांडपोस में प्रस्तावित आदिवासी संस्कृति केन्द्र स्थल पर एवं ओडिशा ट्राइबल डेवेलपमेंट सोसाईटी, भुबनेश्वर में गुरु गोमके की प्रतिमा स्थापित की गई है । रायरंगपुर के डांडबुश-डाहारडीह गांव में पंडित रघुनाथ मुर्मू का समाधि स्थल है । पश्चिम बंगाल राज्य में संथाली भाषा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा एक त्रिभाषी (संथाली-अंग्रेजी-बंगाली) शब्दकोश प्रकाशित किया गया है।
जन्म: 5 मई 1905
जन्म स्थान: मयूरभंज ज़िले के डांडबूश गाँव, ओड़िशा
निधन: 1 फरवरी 1982
पिता : नंदलाल मुर्मू
जीवन परिचय - पारसी सिञ्ज चांदो (संथाली भाषा के सूरज) ' पंडित रघुनाथ मुर्मू ' संथाली भाषा की लिपि ओल चिकी के जन्मदाता थे । प्रो. मार्टिन उराँव ने अपनी पुस्तक ‘दी संताल - ए ट्राईब इन सर्च ऑफ दी ग्रेट ट्रेडिशन’ में ऑलचिकी की प्रशंसा करते हुए उन्हें संतालियों का महान गुरु कह कर संबोधित किया। गुरु गोमके ने भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक एकता के लिए लिपि के द्वारा जो आंदोलन चलाया वह ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा - "अगर आप अपनी भाषा - संस्कृती , लिपि और धर्म भूल जायेंगे तो आपका अस्तित्व भी ख़त्म हो जाएगा ! " उन्होंने बोडोतोलिया हाई स्कूल में अध्यापन का कार्य किया और 1977 में झाड़ग्राम के बेताकुन्दरीडाही ग्राम में एक संताली विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया था । इनकी धर्मपत्नी का नाम नेहा बास्के था । इन्होने 1964 में ' आदिवासी सोशीयो एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोशिएसन' आस्का की स्थापना की । इनके बचपन का नाम चुन्नू था, इनकी प्राथमिक शिक्षा अपने गाँव से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित गम्हरिया यू.पी. स्कूल में और मिडिल स्कूल की पढ़ाई गाँव से 12 किलोमीटर दूर स्थित बहड़दा एम्.ई.स्कूल में हुई । इन्होंने हाई स्कूल की पढ़ाई माराज कृष्णा चंद्र हाई स्कूल , बारीपदा से करते हुए 1928 में द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्होंने 1929-30 के दौरान कुछ समय के लिए अप्रेंटिस किया और फिर बारीपदा के ही कपड़ा बुनाई के कारखाने में भर्ती हो गए। बाद में औद्योगिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और पूर्णचंद्र औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र बारीपदा में बतौर प्रशिक्षक सेवाएं भी दी । 1933 में इन्हे बादाम ताड़िया मॉडल स्कूल में औद्योगिक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया, जहाँ अध्यापन कार्य के दौरान स्कूल में ही लकड़ी की छपाई मशीन प्रारम्भ की , जिसे देखकर सभी आश्चर्यचकित हो जाया करते थे , 1939 में बारीपदा की प्रदर्शनी उस लकड़ी की छापा मशीन को प्रदर्शित किया गया तो जितनी प्रशंसा उस मशीन की हुई, उससे ज्यादा प्रशंसा उससे छपे गुरु गोमके के इन शब्दों की हुई -
"जानाम आयोय रेन्गेज रेंहो
ऊनिगेय हाग-राहा
जानाम रोड़ दो निधान रेंहो
ओना तेगे माग-रांग-आ"
हिन्दी में भावार्थ है, “जन्म देने वाली माँ गरीब होने पर भी वही परवरिश करती है। मातृभाषा का निधन होने पर भी उसी से महान बना जा सकता है।"
गुरु गोमके ने रायरंगपुर गवर्नमेंट हाईस्कूल में प्रधान शिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दी ।
साहित्यिक परिचय - गुरु गोमके के नाम से प्रसिद्ध पंडित रघुनाथ ने महसूस किया कि उनके समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपरा के साथ ही उनकी भाषा को बनाए रखने और बढ़ावा देने के लिए एक अलग लिपि की जरूरत है । इसलिए उन्होंने संथाली लिखने के लिए ओल चिकी लिपि की खोज के काम को प्रारम्भ किया जो 1925 में पूर्ण हुआ। ओलचिकी लिपि गढ़ते समय प. रघुनाथ असमंजस में थे कि वर्णों कोे कैसे और किस आधार पर बनाया जाए। उनसे पहले किसी ने संथाली लिखने के लिए कोई आधार तैयार नहीं किया था। ऐसे में उन्होने सबकुछ प्रकृति का सहारा लिया, ट्राइबल्स सदैव से ही प्रकृति के उपासक रहे हैं , वे पेड़-पौधे, नदी-तालाब, धरती-आसमान, आग-पानी का स्मरण करने लगे। पक्षियों की आवाज समझने लगे। घंटों नदी-आग के पास बैठकर चिंतन करने लगे। फिर पहला अक्षर धरती के स्वरूप जैसा ओत-(0) और दूसरा आग पर बनाया, लिपि में 6 स्वर और 24 व्यंजन हैं । उपरोक्त लिपि का उपयोग करते हुए उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जैसे कि व्याकरण, उपन्यास, नाटक, कविता और सांताली में विषयों की एक विस्तृत श्रेणी को कवर किया, जिसमें सांलक समुदाय को सांस्कृतिक रूप से उन्नयन के लिए अपने व्यापक कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में ओल चिकी का उपयोग किया गया। 22 दिसम्बर 2003 को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में संथाली भाषा को शामिल किए जाने में गुरु गोमके का योगदान अविस्मरणीय रहेगा ।
कृतियाँ - गुरु गोमके की पहली पुस्तक ‘नेल जोंग लागिद ऑल’ का प्रकाशन जमशेदपुर में मुनिराम बास्के की प्रिंटिंग प्रेस में हुआ था ।
उपन्यास - बिदु चंदन
संथाली नाटक - दाड़े गे धोन , खेरवाड़ बीर , सिदो कान्हू संथाल हूल
व्याकरण - रोणोड़
बाल साहित्य - ऑल चेमेद , ऐलखा ,ऑल उपुरुम, पारसी पोहा , पारसी ईतुन, पारसी आपद
धार्मिक पुस्तक - हीताल और बांखेड़
गीत - लाक्चर सेरे्ज और होड़ सेरेंग
अन्य - खरगोश बीर , दरेज धन, सिद्धु-कान्हू
सम्मान एवं पुरस्कार - बिहार , पश्चिम बंगाल और उड़ीसा सरकार के अलावा, उड़ीसा साहित्य अकादमी सहित कई अन्य संगठनों ने उन्हें सम्मानित किया, रांची विश्वविद्यालय द्वारा माननीय डी लिट की उपाधी से उन्हें सम्मानित किया गया। वर्ष 2017 मेँ ओडिशा सरकार ने इनके नाम पर बारीपदा में पंडित रघुनाथ मुर्मू मेडिकल काँलेज एवं हास्पिटल की स्थापना की है । झारखण्ड के चांडिल स्थित एन०एच०-33 स्थित कान्दरबेड़ा दोमुहानी चौक में, ओड़िशा के मयूरभंज जिले के डांडपोस में प्रस्तावित आदिवासी संस्कृति केन्द्र स्थल पर एवं ओडिशा ट्राइबल डेवेलपमेंट सोसाईटी, भुबनेश्वर में गुरु गोमके की प्रतिमा स्थापित की गई है । रायरंगपुर के डांडबुश-डाहारडीह गांव में पंडित रघुनाथ मुर्मू का समाधि स्थल है । पश्चिम बंगाल राज्य में संथाली भाषा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा एक त्रिभाषी (संथाली-अंग्रेजी-बंगाली) शब्दकोश प्रकाशित किया गया है।
एक रचना-
सिबिलामाँञ्ज गातेञ्ज सिबिलामा
ओत मुचाद गातेञ्ज सेरमा मुचाद
बिन ईल ते गातेञ्ज ओबोर बुरुय उडाग लेका
बिन जाड़ी ते गाते रोहोड़ गाडा लालेग लेका
सिबिलामाँञ्ज गातेञ्ज सिबिलामा
ओत मुचाद गातेञ्ज सेरमा मुचाद
गहरे और पवित्र प्यार को व्यक्त करने वाली पंक्तियों का हिन्दी अनुवाद-
प्यार करूंगा प्यारी प्यार करूंगा ,
धरती के अंत तक प्यारी आसमान के अंत तक,
बिन पंख के भारी पहाड़ उड़ने के जैसा,
बिन वर्षा के प्यारी सूखी नदी में बाढ़ होने के जैसा।
प्यार करूंगा प्यारी प्यार करूंगा,
धरती के अंत तक प्यारी आसमान के अंत तक।
सिबिलामाँञ्ज गातेञ्ज सिबिलामा
ओत मुचाद गातेञ्ज सेरमा मुचाद
बिन ईल ते गातेञ्ज ओबोर बुरुय उडाग लेका
बिन जाड़ी ते गाते रोहोड़ गाडा लालेग लेका
सिबिलामाँञ्ज गातेञ्ज सिबिलामा
ओत मुचाद गातेञ्ज सेरमा मुचाद
गहरे और पवित्र प्यार को व्यक्त करने वाली पंक्तियों का हिन्दी अनुवाद-
प्यार करूंगा प्यारी प्यार करूंगा ,
धरती के अंत तक प्यारी आसमान के अंत तक,
बिन पंख के भारी पहाड़ उड़ने के जैसा,
बिन वर्षा के प्यारी सूखी नदी में बाढ़ होने के जैसा।
प्यार करूंगा प्यारी प्यार करूंगा,
धरती के अंत तक प्यारी आसमान के अंत तक।
- संदीप मुरारका
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