Monday, 13 March 2017

होली

होली के रंग में रंगा है कोई ,
कोई नशे में ही मशगूल है ।

चढ़ा नशा किसी को भंग का ,
कोई सत्ता के नशे में चूर है ।

हो रहा दहन गोबर के उपलों काठ का ,
पर राक्षसी होलिका अब जलती नहीँ ।

ना प्रह्लाद जैसे भक्त बच पाते है ,
ना ही नरसिंह अब बचाने आते हैं ।

अब अबीर गुलाल कम उड़ते हैं ,
ताश पत्तों के दौर ज्यादा चलते हैं ।

अब ठंडाई नहीँ पीसवायी जाती है ,
शराब की बोतलें खुलवाई जाती है ।

मिलन का रहा नहीँ अब त्योहार ,
बजाने गाने का बढ़ गया कारोबार ।

ढप चंग गीतों की मस्ती हुई धूमिल ,
इवेंट वालों की सजती फूहड़ महफिल ।

उपाधी वितरण से लोग ऊबने लगे ,
फेसबुक पर ही सबको विश करने लगे ।

महामूर्ख सम्मेलन में अब कोई जाता नहीँ ,
कवि सम्मेलन में दूसरा दौर आता ही नहीँ ।*

त्योहार नहीँ ये अब केवल सेलिब्रेसन है ,
किसी का हॉलिडे, किसी का सीजन है ।

दौर चला है अब पानी बचाने का ,
याद आता दौर वो ड्रम में डूबाने का ।

काश वो दिन फ़िर लौट आते ,
फटते कपड़े, पर दिल जुड़ जाते ।

उछलता कीचड़ भले सड़कों पर ,
पर मैल दिल के सारे मिट जाते ॥

संदीप मुरारका
दिनांक 12 मार्च 2017 रविवार
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 2073

*पहले दो दौर कवितायें पढी जाती थी , जिसमे केवल गम्भीर श्रोता रुकते थे एवम कवि अपनी श्रेष्ठ रचनओं का पाठ करते थे ।

Wednesday, 11 January 2017

चाँद

लोग कहते हैं कि वो रोज़ आया करता था ,
पर मैंने नहीँ देखा उसे काफी दिनो से ,

सच्ची ! या तो वो किसी डर से छिप जाया करता था,
   या मेरी छत छोड़ बाकियों के आया करता था ।

सच में पिछली कई रातें मैंने अँधेरों में बीता दी ,
उसके इंतजार में अपनी आँखे भी सुज़ा ली ।

पर हाँ , कल मिला वो ,
अब कोई शिकायत नहीँ मुझे ।
कहा उसने मुझे , अब रोज़ मिला करेगा ।

खुली महफिल में भी ,
साथ कभी कभी दिया करेगा ।

कह दिया मैंने भी उससे ,
ए चाँद ! यूँ ना रुठा कर ।
हो शिकायत कोई तुम्हे ,
तो सीधे मुझसे कहा कर ।
मिल बैठ बातो को हम सुलटा लिया करेंगे ।

समझौता हो चुका हमदोनो में अब ।
ए मयंक ,
माना कि प्रतिनिधि है तू समय का ।
पर दोस्ती का भी लिहाज कर लिया कर ।

ए निशापति ,
दोस्ती बचपन में खीर वाली याद कर लिया कर ।

माना कि तोड़े मैंने अनुशासन कई तेरे ।
पर तोड़ी थी उस समय प्यालियाँ कई तूने मेरी भी ।

ए शशि ,
उन अपराधों को तू भी तो दिल पे धरा कर ।

चल हटा , अब न रूठना ना मैं तुझको भुलुँगा ।
पर यार , मेरी ही खिड़की पर नहीँ ,
सबकी पर एक बार तू दिख जाया कर ।

सच तेरे बिना 'रात' बहुत काली होती है ।
अरे अमावस में तो , तैयारियाँ रहती है दिये की ।
पर बिन बताये ना आने से तेरे ,
रातें नरक सी मालूम होती है ॥

संदीप मुरारका
दिनांक 11 जनवरी 2017 बुधवार
सम्वत 2073 पौष शुक्ल चतुर्दशी

Friday, 6 January 2017

ठकुरानी

विचित्र ये दुनिया , विचित्र है ये संसार ,
अप्रतिम सौंदर्य की मूर्ति थे श्रीकृष्ण ,
स्वयं भगवान श्री विष्णु के अवतार ।

बावजूद करना पड़ा प्रभु को अपहरण ,
करने रुक्मणि के साथ विवाह संस्कार ॥

सत्यभामा , सत्या , कालिंदी और मित्रविंदा,
बनी पटरानी लक्ष्मणा, जाम्बवन्ती औ' भद्रा ॥

भय मुक्त करने पृथ्वी को , किया नरकासुर का संहार , मुक्त हुई उसके बंधन से राजकुमारियाँ सोलह हजार ,
देकर स्थान पत्नी का, किया केशव ने सबका उद्धार ॥

अलग अलग महल हर रानी का , अलग अलग ठाट ,
गोविंद की लीलाओं से , द्वारका नगरी थी बाग बाग ।

खुश थी सभी रानियाँ, जनता की भी खुशियाँ अपार ,
रोज़ मनाते होली दिवाली , राजा प्रजा और रिश्तेदार ॥

द्वारका में मनता था उत्सव रोज़ , संगीत साज शृंगार ,
इधर रोती ब्रज की गोपियाँ, लूट गया था जिनका प्यार ॥

इधर गोपियाँ, उधर रानियां एक सौ आठ सोलह हजार ,
फ़िर भी अतृप्त मन , टूटा दिल, ह्रदय में शून्य आकार ।

कौन थी वो ? छिन लिया जिसने गोविंद का चैन ,
फीकी फीकी रहती जिसके बिना गिरधर की रैन ।

किया नहीँ विवाह उससे , दिया नहीँ अपना नाम ,
पर हर मंदिर में आज उसी के साथ दिखते श्याम ।

अधूरी है उसके बिना, गिरधर मुरारी की हर मूरत ,
सूना है हर मंदिर, जहाँ न हो उस प्रेयसी की सूरत ।

अजी! ठकुरानी थी वो बरसाने की, राधा उसका नाम ,
दुनिया दीवानी घनश्याम की , राधा के दीवाने श्याम ॥

संदीप मुरारका
दिनांक 7 जनवरी'2017 शनिवार
सम्वत 2073, पौष शुक्ल नवमी

Thursday, 5 January 2017

विशुद्ध प्रेम

नाना उग्रसेन के मथुरा नगरी की शोभा आपार ,
थी बड़ी बड़ी हवेलियाँ औ' ऊँचे ऊँचे तोरण द्वार ।

वृंदावन था ठेठ गाँव, केवल गौएँ बाछे और ग्वाल,
रोज़ वही माखन, वही दही, वही चावल और दाल ।

मथुरा में तो हाय वासुदेव जी के ठाट ही निराले थे,
गहने तो गहने , वहाँ के तो कपड़े भी चमक वाले थे ।

यहाँ वृंदावन में वन वन भटकती गँवार ग्वालन गोपियाँ,
गले तुलसी, माथे मोरपंख, हाथ में बाँसुरी वाले कन्हैया ।

मथुरा नगर की सजी धजी सुंदर सुंदर नवयौवनाएँ,
वृंदावन में रहा करती थी बँजारिनो सी गोप बालायें ।

मथुरा की गलियों में, इत्र लगा युवतियाँ फिरा करती थी,
पर बाँसुरी कृष्ण की तो वृंदावन में ही बजा करती थी ।

कर ले सोलह शृंगार , भले मथुरा की कन्यायें,
रास लीला तो वृंदावन जी में ही हुआ करती थी ।

कपड़े , तन, खूबसूरती या पैसा जहाँ, वहाँ प्रेम कैसा ?
मन,समर्पण औ त्याग जहाँ, मिले प्रेम वहाँ कृष्ण जैसा ॥

संदीप मुरारका
दिनांक 5 जनवरी'2017 गुरुवार
सम्वत 2073, पौष शुक्ल सप्तमी

नववर्ष अभिनंदन

बीत गये वर्ष बहुत सारे
कई आशायें बदली निराशा में

बदला बहुत कुछ
कहीँ रिश्ते बदले तो कहीँ नाते

कोई मित्र दगा दे गया
और कोई हँसने का मौका

बड़े अजीब थे वो कुछ महीने जब
आईना पहचानने से इन्कार करने लगा था

तब कुछ बढे थे कुछ हाथ इस ओर
यादों को सहेजे हुए पार हुआ साल

उम्मीदों को जगाते हुए
नई रोशनी नई किरण लाते हुए

आया फ़िर एक नया साल
लेकर नई सीख , नई मुस्कुराहट

स्वागत पूरे ह्रदय से ए नववर्ष तेरा
अभिनंदन वन्दन स्वीकार करो मेरा ॥

दिनांक 5 जनवरी 2017

Saturday, 19 November 2016

श्री विष्णु अवतार वंदन

आओ करें  वंदन श्री हरि के अवतार की ,
भगवान श्री विष्णु के रूपों की,आकार की ।

कराह उठी धरती जब, भक्त जब पुकार  पड़े ,
तुरंत दौडे चले आये नारायण स्वयं खड़े खड़े ।

सॄष्टि की रचना करने ,  ब्रह्मा जब उद्धत हुए ,
"सनकादि ऋषियों" के रुप में आप प्रकट हुए ।1

दिया मोक्ष हिरण्याक्ष कॊ , पृथ्वी का उद्धार किया ,
"वराह" रुप में  प्रभू  श्री हरि ने दूजा अवतार लिया ।2

लोक कल्याण के लिये रुप धरा "देवर्षि श्री नारद" का ,3
"नर नारायण" रुप में किया संकल्प धर्म स्थापन का ।4

सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हुये "कपिल" मुनी भगवान ,5
देवी अनुसूइया के गर्भ से जन्मे "दत्तात्रेय" भगवान ।6

आकूति पुत्र "यज्ञ" रुप श्री हरि ने सातवां अवतार लिया , 7
"ऋषभदेव" स्वरूप में प्रभु ने क्या क्या नहीँ सहन किया ?8

नास्तिक वेन के यहाँ "पृथु" रुप में श्री हरि अवतरित हुए  ,9
प्रलय से बचाने पृथ्वी को, "मत्स्य" रुप में प्रभु प्रकट हुए  ।10

"कच्छप" अवतार के रुप में प्रभु ने करवाया समुद्र मंथन,11
फ़िर प्रकट हुए भगवान "धन्वंतरि" लेकर अमृत कलशं ।12

"मोहिनी" अवतार में प्रभु ने देवताओं को कराया अमृतपान , हिरण्यकश्यपु मरे "नृसिंह" द्वारा,मिला प्रह्लाद को अभयदान ।

13 मोहिनी , 14 नृसिंह

"वामन" के आशीर्वाद से मिला राज़ सुतललोक का बलि को ,
"हयग्रीव" अवतार में श्री विष्णु रसातल से ले आये वेदों को  ।

15 वामन , 16 हयग्रीव

भगवान "श्री हरि" ने ग्राह को मार गज को तार लिया,17
"परशुराम" रुप  में प्रभु ने क्षत्रियों का सर्वनाश किया । 18

"महर्षि वेदव्यास" रुप में स्वयं महाभारत की रचना की , 19
ब्रह्मा की सभा में "हंस " अवतार में मोक्ष की व्याख्या दी ।20

अयोध्या में माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिये "श्री राम" 21
देवकी यशोदा के दुलारे मोर मुकुट  वाले "कृष्ण" घनश्याम 22

बुद्ध अवतार में जीव हिंसा से दूर रहने का दिया संदेश, 23
धर्म की पुनः स्थापना को आयेंगे "कल्कि" रुप में देवेश । 24

आते रहे हैं श्री हरि , करने धरा का उद्धार व  उपकार,
गौ अग्नि ब्राह्मण की हो सेवा ,लेंगे प्रभु फ़िर अवतार ॥

संदीप मुरारका
दिनांक 19 नवम्बर 2016' शनिवार
सम्वत 2073, कार्तिक कृष्ण पंचमी

 

Tuesday, 15 November 2016

कृष्ण की विवशता

कलियुग के कृष्ण विवश हो उठे ,
करुणावश रुदन स्वर वो बोल  उठे ॥

सखा भाई शिष्य भक्त तुम प्रियवर ,
हे अर्जुन , कहो कहाँ बैठे हो छिपकर ॥

माना यहाँ कोई कुरुक्षेत्र नहीँ है ,
माना महाभारत का उद्घोष नही है ॥

ना पन्चाली का उपहास हुआ है ,
ना कुंती पुत्रों का अपमान हुआ है ॥

फ़िर खड़े क्यों ये लिये बिष बुझे तीर ,
न भीष्म न द्रोण न शकुनी अबकी अधीर  ॥

सुशासन सुयोधन युधिष्ठिर नहीँ गरजेगें ,
ना ही महाबली कर्ण अब शस्त्र उठायेगें ॥

ना अभिमन्यु का रुधिर बहेगा ,
ना ही अश्वत्थामा मारा जायेगा ॥

लेटने कॊ तीर शय्या पर ,कोई भीष्म तैयार नहीँ ,
अंधा बनकर जीना गांधारी कॊ अब स्वीकार नहीँ ॥

अरे कौन पूछेगा संजय तुमको ,
बर्बरीक विदुर की अब पहचान नहीँ ॥

कहो फ़िर क्यों करूँ पाठ मैं गीता का ,
हे गांडीवधारी, जब तुम हो ही नहीँ मैदान में ॥

क्यों दिखाउँ रुप अपना भयँकर मनोहर ,
अन्याय अधर्म के विरूद्ध कहो किसको उकसाऊँ ॥

सारथी बनाने कॊ जब तुम ही तैयार नहीँ ,
हे धनंजय , कहो किसके लिये सुदर्शन उठाउँ ॥

धरती भारत तुलसी गंगा और गीता ,
मातायें सभी फूट फूट कर रो रही हैं ॥

देख अवस्था पृथ्वी की अब रहा नहीँ जाता ,
भार शेषनाग देव से भी अब सहा नहीँ जाता ॥

धुर्व प्रह्लाद विदुर विभीषण द्रौपदी मीरा रहे नहीँ ,
अब तो अजामील के द्वारा भी मैं पुकारा नहीँ जाता ॥

हूँ जहाँ मैं , वहाँ कोई आता नहीँ ,
भीड़ लगी है जहाँ , वहाँ मैं जाता नहीँ ॥

गौ अग्नि ब्राह्मण तीनों के कण्ठ सूखे पड़े ,
इत्र गुलाब और रातों की जाग मुझको भाती नहीँ ॥

व्यासपीठ भी हुई दूषित कलंकित ,
कहो सव्यसाची अब मैं क्या करूँ ॥

कर रहा महसूस असहाय मजबूर लाचार ,
हे श्वेतवाहन , हो दूर विवशता ऐसा उपाय करो ॥

संदीप मुरारका
15 नवम्बर 2016 मंगलवार
सम्वत 2073 कार्तिक कृष्णा 1